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और उसकी माँ प्रसिद्ध मंगोल चंगेज खाँ की चौदहवीं वंशज थी।
उसके जीवन पर इन दो महान
व्यक्तियों के आदेर्शों एवं उद्देश्यों का प्रभाव पूर्णरूपेण था।
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समय मध्य एशिया की राजनीतिक दशा चित्रित भी थी। सभी आपस में एक दूसरे
से ईर्ष्या करते थे। तैमूरी शासक उजबेगों, मंगोलो और ईरानियों से घिरे हुए थे।
फिर भी वे निरन्तर आपस में लड़ते रहे। इनमें से बाबर का पिता उमरशेख मिर्जा
भी महत्वाकांक्षीं और झगड़ालू था।
और उसके भाई, दूसरी ओर मंगोल और अबुल खैर का वंशज शैबानी खाँ, सभी
एक दूसरे के विरुद्ध घात लगाये बैठे हुये थे। ऐसी विषम परिस्थितियों ने बाबर
को अधिक जागरूक, संघर्षशील एवं महत्वाकांक्षी बना दिया।
बाबर का संक्षिप्त परिचय
| नाम | जहीरूद्दीन मुहम्मद बाबर |
| राजकाल | 1529-30 ई .तक |
| जन्म स्थान | फरगना में रूसी तुर्किस्तान का करीब 80,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र |
| पिता | उमर शेख मिर्जा, 1494 ई. में एक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी, |
| नाना | यूनस खां |
| चाचा | सुल्तान मुहम्मद मिर्जा |
| भाई | जहाँगीर मिर्जा, छोटा भाई नासिर मिर्जा |
| पत्नी | चाचा सुल्तान मुहम्मद मिर्जा की पुत्री आयशा बेगम |
| मृत्यु | 26 दिसम्बर, 1530 ई. (आगरा) 48 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई। |
| उत्तराधिकारी | हुमायूं, |
| युद्ध | पानीपत’ खानवा और घाघरा जैसी विजयों ने उसे सुरक्षा और स्थायित्व प्रदान किया। |
| प्रधानमंत्री | निजामुद्दीन अली खलीफा |
भारतवर्ष आगमन के पूर्व बाबर का काबुल राज्य उत्तर में हिन्दूकुश की
पहाड़ियों से लेकर पश्चिम में खुरासन की सीमाओं तक, और पूर्व में आबे-इस्तादह
के मैदानों से लेकर दक्षि१ण में चगन सराय तक फैला हुआ था। काबुल पर
अधिकार करने के पूर्व बाबर कभी भी स्थिर नहीं रह सका था, उसे समकन्द,
अन्दजान, खीजन्द एवं फरगना आदि स्थानों पर अनेक जातियों जैसे हिन्दू तथा
अफगानी विद्रोहियों को चुनौती देनी पड़ी थी, साथ ही शाही परिवार के सदस्यों
तथा स्थानीय जनता के द्वारा किये गये विद्रोहों का भी सामना करना पड़ा था।
सन् 1494 ई0 में मुगल राजकुमार सुल्तान महमूद के द्वारा उत्तर की तरफ
से और सुल्तान अहमद ने पूर्व की तरफ से फरगना पर आक्रमण। दुर्भाग्यवश
उसी समय 1494 ई0 में बाबर के पिता उमर शेख मिर्जा की एक दुर्घटना में मृत्यु
हो गयी, उस समय उमर शेख मिर्जा का बड़ा पुत्र बाबर जिसने भारत में मुगल
साम्राज्य की स्थापना की थी, बारह वर्ष का था।
बाबर का पिता उमर शेख मिर्जा फरगना के छोटे राज्य का शासक था, जो
आधुनिक समय में रूसी तुर्किस्तान का करीब 80,000 वर्ग कि.मी. क्षेत्र का एक छोटा सूबा है। इतनी अल्पावस्था में बाबर तैमूरियों की गद्दी पर बैठा, जिसके लिए
सम्भवत: भाग्यशाली परिस्थितियाँ ही उत्तरदायी थीं क्योंकि फरगना का यह
अल्पवयस्क शासक चारों तरफ से प्रबल शत्रुओं से घिरा हुआ था। ये शत्रु उसके
प्रिय बन्धु ही थे जो प्रबल महत्वाकांक्षाओं से सशक्त थे और परिस्थितियों का लाभ
उठाना चाहते थे।
इसके साथ ही उजबेग सरदार शैबानी खाँ से अपने अस्तित्व की रक्षा के
लिए लड़ना पड़ा। बाबर में तैमूर एव चंगेज के वंशजों का रक्त प्रवाहित था जो
अत्यधिक महत्वाकांक्षी और सम्पूर्ण विश्व के केन्द्रीयकरण में विश्वास करते थे।
अत: सम्पूर्ण समस्याओं से जूझते हुए भी बाबर ने एक बार पुन: अपनी इस इच्छा
को पूर्ण करना चाहता था। अवस्था में बहुत छोटें होते हुए भी बाबर ने अमीर तैमूर
की राजधानी ‘समरकन्द’ को जीतने तथा तैमूर की गद्दी पर बैठने का निश्चय कर
लिया।
बाबर के आक्रमण के समय भारत की स्थिति
सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में अर्थात् बाबर के आक्रमण के समय
भारतवर्ष की राजनीतिक अवस्था बहुत ही सोचनीय एवं दयनीय थी। कोई
भी ऐसा शक्तिशाली केन्द्रीय राज्य नहीं था जो समस्त भारत पर अपनी
प्रभुसत्ता स्थापित कर सके। दिल्ली के शासक सुल्तान इब्राहीम लोदी के
शासन का प्रभाव क्षेत्र केवल दिल्ली तथा उसके आस-पास के प्रदेशों तक
ही सीमित था। देश कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो चुका था; जो
प्राय: आपस में लड़ते झगड़ते रहते थे। इन राज्यों के शासक परस्पर
ईर्ष्या, राग, द्वेष रखते थे। उनमें राष्ट्रीय एकता का सर्वथा अभाव था। कई
शासकों के बीच आपसी शत्रुता इतनी तीव्र थी कि वे अपने शत्रु का
सर्वनाश करने के लिए विदेशी आक्रमणकारी को आमंत्रित करने में भी नही
हिचकिचाते थे। इससे भी बढ़कर दुर्भाग्य की बात यह थी कि दिल्ली के
सुल्तान इब्राहीम लोदी ने उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रान्त की सुरक्षा की ओर
कोई ध्यान नहीं दिया था।
तत्कालीन दयनीय अवस्था का उल्लेख करते हुए कहा है कि सोलहवीं
शताब्दी के प्रारम्भ में भारत कई राज्यों का संग्रह बन गया था। कोई भी
विजेता जिसमें इच्छाशक्ति और दृढ़ निश्चय हो, आसानी से यह उसके
आक्रमण का शिकार हो सकता था और सफलता अर्जित कर सकता था।
बाबर के आक्रमण के समय हिन्दुस्तान का अधिकांश भाग दिल्ली
साम्राज्य के अधिकार में था, परंतु देश में अन्य कई स्वतंत्र और
शक्तिशाली राजा भी थे। बाबर ने स्वयं लिखा है कि उसके आक्रमण के
समय भारत में पाँच प्रमुख मुस्लिम राज्य (दिल्ली, बंगाल, मालवा, गुजरात
तथा दक्षिण का बहमनी राज्य) तथा दो काफिर (हिन्दू) शासकों (चित्तौड़
तथा विजयनगर) का राज्य था। 1 वैसे तो पहाड़ी और जंगली प्रदेशों में
अनेक छोटे-छोटे राजा और रईस थे, परन्तु बड़े और प्रधान राज्य ये ही
थे।
1. उत्तरी भारत के राज्य –
उत्तरी भारत में उस समय दिल्ली, पंजाब,
सिंध, कश्मीर, मालवा, गुजरात, बंगाल, बिहार, उड़ीसा, मेवाड़ (राजस्थान)
आदि प्रमुख राज्य थे। इन राज्यों की राजनीतिक अवस्था इस प्रकार
थी-
1. दिल्ली – बाबर के आक्रमण के समय दिल्ली पर लोदी वंश के
शासक इब्राहीम लोदी का आधिपत्य था। वह एक अयोग्य और उग्र स्वभाव
का व्यक्ति था। उसके दुव्यर्वहार के कारण कई स्थानों पर विद्रोह होने
लगे। बाबर ने इब्राहीम लोदी के बारे में लिखा है कि वह एक अनुभवहीन
व्यक्ति था तथा अपने कार्यों के प्रति लापरवाह था। वह बिना किसी
योजना के आगे बढ़ जाता, रूक जाता और पीछे लौट जाता था। युद्ध
क्षेत्र में भी वह अदूरदर्शिता से लड़ता था। वह अभिमानी तथा निर्दयी था।
उसने अपनी कठोर नीति और दुर्व्यवहार के कारण अपने अमीरों और
सरदारों को रूष्ट कर दिया था।
खां लोदी ने अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर दिया और इब्राहीम के
विरूद्ध षड्यंत्र रचने के लिये बाबर की सहायता प्राप्त करने का प्रयत्न
किया। दरिया खां लोदी बिहार में स्वतंत्र शासक बन बैठा था और उसके
पुत्र बहादुर खां ने बहुत से प्रदेश विजय कर लिए थे।
दिल्ली की तत्कालीन स्थिति के परिप्रेक्ष्य में एर्सकिन महोदय ने
अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि दिल्ली का लोदी साम्राज्य थोड़ी
सी स्वतंत्र राज्य जागीरों तथा प्रान्तों का बना हुआ था। अत: इसका
शासन-प्रबन्ध वंश-परंपरागत सरदारों, जमींदारों तथा दिल्ली के
प्रतिनिधियों के हाथों में था। वहाँ की जनता अपने गवर्नर को, जो वहाँ का
एक मात्र शासक था और जिसके हाथ में जनता को सुखी या दु:खी रहना
था। फलत: उसे ज्यादा मानती थी, क्योंकि सुल्तान उनसे बहुत दूर था।
व्यक्ति का शासन था और नियमों का कोई महत्त्व न था।
यद्यपि वैसे तो दिल्ली का साम्राज्य बहराह से बिहार तक फैला हुआ
था। इब्राहीम के पास साधन भी बहुत थे, सेना भी शक्तिशाली थी, परंतु
अपनी कुनीतियों के कारण वह इन सबका लाभ नहीं उठा सका। कहने
को तो उसका शासन क्षेत्र बहुत विस्तृत था परंतु वास्तव में वह
अव्यवस्थित ही था। एर्सकिन ने लिखा है कि दिल्ली के राज्य छोटे-छोटे
स्वतंत्र नगरों, जागीरों अथवा प्रांतों का समूह था जिन पर विभिन्न वंशों के
उत्तराधिकारियों, जागीरदारों अथवा दिल्ली के प्रतिनिधियों का शासन था। जनता गवर्नर को ही अपना स्वामी मानती थी। सुल्तान का जनता से कोई
सीधा सम्बन्ध नहीं था।
इस प्रकार की परिस्थितियों में कोई भी सामन्त या सरदार सुल्तान
का भक्त नहीं रह गया था, जबकि दिल्ली सल्तनत में सामंतशाही व्यवस्था
ही साम्राजय की रीढ की हड्डी मानी जाती थी। सुल्तान की मान प्रतिष्ठा
में बहुत कमी हो गई थी। दिल्ली का साम्राज्य दुर्बल, अव्यवस्थित एवं
दीनहीन हो गया था। विरोधियों का प्रतिरोध उत्तरोत्तर बढ़ता चला जा रहा
था। अतएव बाबर जैसे शक्तिशाली और महत्त्वाकांक्षी आक्रमणकारी, जिसके
पास विजय प्राप्त करने के लिए इच्छा शक्ति और संकल्प दोनों ही
विद्यमान थे, का सामना करना इब्राहीम जैसे शासक के लिए संभव नहीं
था। बाबर ने उसे पानीपत के युद्ध में पराजित कर दिल्ली पर अपनी
प्रभुसत्ता स्थापित की।
2. पंजाब – यद्यपि पंजाब दिल्ली साम्राज्य का ही एक अंग था, लेकिन
इब्राहीम लोदी का प्रभाव इस पर नाममात्र के लिए रह गया था।
व्यवहारिक रूप में पंजाब लगभग स्वतंत्र राज्य था। इस समय पंजाब का
गवर्नर दौलत खां लोदी था। दौलत खां लोदी और इब्राहीम लोदी के बीच
मनमुटाव एवं शत्रुता चल रही थी। वह इब्राहीम के व्यवहार से असंतुष्ट
था। इब्राहीम ने दौलत खां को दण्डित करने के लिए दिल्ली बुलाया,
लेकिन उसने अपने स्थान पर अपने पुत्र दिलावर खां को भेज दिया।
इब्राहीम ने उसके पुत्र के साथ ऐसा दुव्र्यवहार किया, जिसके कारण दौलत
खां उसका और भी अधिक कट्टर शत्रु बन गया। इसी समय इब्राहीम का
चाचा आलमखां लोदी भी पंजाब के आसपास घूम रहा था। वह भी इब्राहीम से राज्य छीनना चाहता था।
दौलत खां ने लाभ उठाया। उसने अपने आपको स्वतंत्र शासक घोषित कर
दिया। साथ ही दौलत खां ने इब्राहीम से अपने अस्तित्व तथा नवजात
स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए उसके विरूद्ध युद्ध की तैयारियां प्रारम्भ
कर दी। उसने बाबर से भी सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया, क्योंकि
बाबर स्वयं दिल्ली का सुल्तान बनने के लिए महत्त्वाकांक्षी था। बाबर तो
ऐसे ही अवसर की खोज में था। इसलिए तत्कालीन परिस्थितियों का लाभ
उठाते हुए उसने शीघ्र ही भारतवर्ष पर आक्रमण कर दिया।
3. गुजरात – सन् 1401 ई. में गुजरात दिल्ली साम्राज्य से अलग हो
गया था। गुजरात में प्रथम स्वतंत्र सुल्तान जफरखां, मुजफ्फर शाह के
नाम से गद्दी पर बैठा। इस राजवंश का सबसे अधिक योग्य व प्रतिभा
सम्पन्न शासक महमूद बेगड़ा था। बाबर के आक्रमण के समय यहां का
शासक मुजफ्फर शाह द्वितीय था। उसने 1511 से 1526 ई. तक शासन
किया। उसने अपने शत्रुओं से निरन्तर संघर्ष किया, परन्तु मेवाड़ के राणा
सांगा ने उसे पराजित किया। वह एक विद्वान् शासक था। उसे हदीस
पढ़ने का बड़ा शौक था। वह सदैव कुरान शरीफ पढ़ने में लगा रहता था।
कुछ समय पहले ही वह इस संसार से सदैव के लिए विदा हो गया।
उसकी मृत्यु के बाद गुजरात राज्य की शक्ति बहुत कमजोर हो गयी थी।
4. मालवा – खानदेश के उत्तर में मालवा का राज्य स्थित था। तैमूर
के आक्रमण के बाद जब अशांति फैल गयी थी उस समय 1401 ईस्वी में दिलावर खां गौरी ने मालवा में स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली। परन्तु
1435 ईस्वी में महमूद खिलजी ने मालवा के इस स्वतंत्र राज्य को समाप्त
करके खिलजी राज्य की स्थापना की। वह वीर, योग्य और महत्त्वाकांक्षी
शासक था। बाबर के आक्रमण के समय मालवा का शासक महमूद द्वितीय
था। उसकी राजधानी माण्डू थी। मालवा के शासकों का गुजरात तथा
मेवाड़ के साथ निरन्तर संघर्ष चलता रहा। महमूद द्वितीय के शासन काल
में मालवा पर राजपूतों का अधिकार हो गया था।
राज्य प्राप्त करने के लिए चंदेरी के मेदिनीराय से सहायता प्राप्त की
जिसके कारण मालवा पर मेदिनीराय का अत्यधिक प्रभाव कायम हो गया
था। महमूद ने मेदिनीराय को अपना प्रधानमंत्री भी नियुक्त किया। फरिश्ता
ने महमूद खिलजी की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि सुल्तान नम्र, वीर,
न्यायी तथा योग्य था और उसके शासन काल में हिन्दू और मुस्लिम दोनों
ही प्रसन्न थे तथा परस्पर मित्रता का व्यवहार करते थे, परंतु महमूद
खिलजी मेदिनीराय के हाथों का कठपुतली बन गया था।
5. खानदेश – खानदेश ताप्ती नदी की घाटी में बसा हुआ है। पहले
यह भी दिल्ली राज्य का एक अंग था परंतु 14वीं शताब्दी के अंतिम दशक
में यह देश स्वतंत्र हो चुका था। मलिक राजा फारूकी ने खानदेश में एक
स्वतंत्र राज्यवंश की स्थापना की। उसने 1388 से 1399 तक खानदेश पर
शासन किया परंतु प्रारम्भ से ही गुजरात का सुल्तान खानदेश पर अपना
प्रभाव स्थापित करने का अवसर देख रहा था। इसी कारण से गुजरात
और खानदेश के बीच बराबर संघर्ष चलता रहा।
सुल्तान वानुदखां की मृत्यु हो जाने से उसके दो उत्तराधिकारियों के बीच सिंहासन प्राप्त करने के लिए गृहयुद्ध छिड़ गया, वहाँ पर राजनीतिक
संकट उपस्थित हो गया। एक का समर्थन अहमदनगर कर रहा था और
दूसरे का गुजरात। अन्त में गुजरात के शासक महमूद बेगड़ा की सहायता
से आदिलखां खानदेश का सिंहासन प्राप्त करने में सफल हुआ।
ने 1520 तक यहां शासन किया। इसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र
मीरनमहमूद खानदेश के सिंहासन पर बैठा परन्तु यह देश दिल्ली से दूर
था और इसकी आन्तरिक स्थिति भी ठीक नहीं थी। इसी कारण खानदेश
का तत्कालीन राजनीति में कोई भी महत्त्वपूणर् स्थान नहीं था।
6. बंगाल – फिरोज तुगलक के शासन काल में भी बंगाल दिल्ली
सल्तनत से स्वतंत्र राज्य बन गया था। यहां हुसैनी वंश का शासन था।
इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक अलाउद्दीन हुसैन था जिसका
शासन काल 1493 ई. से 1519 तक का था। उसके शासन काल में
बंगाल राज्य की सीमा आसाम में कूच बिहार तक फैल गयी थी। बाबर का
समकालीन शासक नुसरतशाह था। उसने तिरहुत पर अधिकार किया और
बाबर के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बढ़ाये। वह कला तथा साहित्य प्रेमी और
सहिष्णु शासक था। उसके शासन काल में प्रजा सुखी और सम्पन्न थी। बाबर ने भी उसकी प्रशंसा की है और उसे एक विशेष महत्त्वपूर्ण शासक
बताया है।
दिल्ली से दूर होने के कारण बंगाल की राजनीति का भारतीय राजनीतिक
जीवन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। डॉ. पी. शरण का मन्तव्य है कि घाघरा युद्ध के पश्चात् बाबर ने नुसरतशाह के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध
स्थापित किये और एक अस्थायी सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर भी किये।
7. सिंध – मुहम्मद तुगलक के शासन काल के पश्चात् सिंध का प्रान्त
स्वतंत्र हो गया था। सन् 1516 ई. में शाहबेग आरगन ने सिंध में सुमरावंश
के शासक को पराजित करके अपना राजवंश स्थापित कर लिया। बाबर के
आक्रमण के समय शाह हुसैन आरगन राज्य कर रहा था। उसने मुलतान
को भी अपने अधिकार में कर लिया। उसने अपने शासन काल में सिंध की
शासन व्यवस्था को सुव्यवस्थित और संगठित कर दिया था।
यह राज्य अपनी प्रगति की चरम सीमा पर था, परंतु दिल्ली से दूर होने
के कारण इस प्रान्त की राजनीति का कोई विशेष प्रभाव दिल्ली की
राजनीति पर नहीं पड़ा। एस.एल. नागोरी एवं प्रणवदेव का अभिमत है कि
सिंध में समा वंश तथा अफगान वंश में संघर्ष चल रहा था।
8. जौनपुर – इब्राहीम लोदी की शक्तिहीनता और अव्यवस्था का लाभ
उठाकर मरफ फारमूली तथा नासिर खां लौहानी के नेतृत्व में जौनपुर में
अफगान सामन्तों ने विद्रोह कर दिया व जौनपुर को स्वतंत्र राज्य घोषित
कर दिया। यह उच्च शिक्षा एवं संस्कृति का विशेष समृद्ध राज्य था।
9. कश्मीर – बाबर के आक्रमण के समय इस प्रदेश में मुस्लिम शासक
मुहम्मद शाह पदासीन था। सरदारों और अमीरों के अत्यधिक प्रभाव के
कारण राज्य में गृह कलह और संघर्ष होते रहते थे। परिणामस्वरूप राज्य
में अशांति और अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो गई तथा शासक अमीरों
के हाथों में कठपुतली बन गया। मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद उसका वजीर काजी चक स्वयं शासक बन गया। इसी मध्य बाबर की सेना ने
काश्मीर में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया और काजी चक को अपदस्थ
कर दिया, किन्तु काश्मीर के सामन्तों और अमीरों ने संगठित होकर मुगलों
को वापस खदेड़ दिया।
10 राजस्थान – 16वीं शताब्दी के प्रारम्भ में राजस्थान भी अपने
इतिहास में सबसे अधिक संगठित और सुव्यवस्थित इकाई के रूप में
विद्यमान था। यद्यपि जितने भी महत्त्वपूर्ण राज्य यहां स्थापित हुए, वे सब
सुव्यवस्थित रूप से अपना राज्य स्थापित कर चुके थे और इन राजवंशों
का अस्तित्व भारतवर्ष की स्वतंत्रता पर्यन्त तक बना रहा। 15वीं शताब्दी में
राजनीतिक दृष्टिकोण से राजस्थान में भी अव्यवस्था फैली हुई थी। परंतु
16वीं शताब्दी राजस्थान के लिए पुनर्निर्माण का काल था। यहां पर
बड़े-बड़े साम्राज्यों की स्थापना इस समय प्रारम्भ हो चुकी थी। अव्यवस्था
के स्थान पर व्यवस्था का काल प्रारम्भ हो चुका था। इतना ही नहीं
राजस्थान में भी भारत के अन्य भागों की भांति राजनीतिक परिवर्तन हाने े
लगे थे। इस प्रकार राजनीतिक दृष्टि से 16वीं शताब्दी का प्रारम्भ
राजस्थान के लिए पूर्णरूपेण व्यवस्था का काल था। राजस्थान के राज्यों
में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण राज्य मेवाड़ था।
11. मेवाड़ – मेवाड़ का प्राचीन नाम मेदपाट था। इसका राजनीतिक
इतिहास बहुत ही प्राचीन है परन्तु गौरीचन्द हीराचन्द ओझा के अनुसार
गुहिलौत वंश (सिसोदिया) का राज्य यहां पर छठी शताब्दी से प्रारम्भ होता
है। इस वंश का संस्थापक गुहिल था लेकिन मेवाड़ के साम्राज्य का
विस्तार काल राणा हमीर से प्रारम्भ हुआ। राणा हमीर ने अपने राज्य की
सीमा का विस्तार अजमेर, माण्डलगढ़ और जहाजपुर तक कर लिया था
परंतु मेवाड़ एक सर्वशक्तिमान राज्य के रूप में महाराणा कुंभा के शासन
काल में प्रकट होता है।
महाराणा कुंभा एक महान् शासक था। उसने लगभग 35 वर्ष तक
मेवाड़ का शासन सूत्र पूर्णतया अपने हाथ में रखा। उस समय मालवा और
गुजरात प्रभावशाली राज्य थे, किन्तु इन राज्यों से मेवाड़ को पूर्णतया
सुरक्षित रखा। कुछ इतिहासकारों की तो यह भी मान्यता है कि कुंभा ने
मालवा के शासक महमूद को हराकर 6 माह तक चित्तौड़ के दुर्ग में बन्दी
बनाए रखा। केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं अपितु सांस्कृतिक एवं
भवन-निर्माण कला की दृष्टि से भी यह युग मेवाड़ के इतिहास में
स्वर्णयुग था। ऐसा कहा जाता है कि मेवाड़ में विद्यमान 84 दुर्गों में से
लगभग 32 दुर्गों के निर्माण का कार्य इसी समय में हुआ था।
बाबर ने स्वयं अपनी ‘आत्मकथा’ में लिखा है कि भारतवर्ष पर
आक्रमण के समय वहां पर सात महत्त्वपूर्ण राज्य थे, जिनमें दो हिन्दू राज्य
थे – एक मेवाड़ और दूसरा विजयनगर। बाबर ने यह भी स्वीकार किया
है कि मेवाड़ की शक्ति राणासांगा ने अपनी सैनिक प्रतिभा के कारण
काफी बढ़ा ली थी।
कर्नल टाँड ने लिखा है कि सांगा की सैनिक-संख्या लगभग 80
हजार थी। उसकी सेना में 7 राजा, 9 राव और 104 सामंत थे। राजस्थान
के शासकों ने जिसमें मुख्य रूप से मारवाड़, आमेर, बूंदी आदि ने इसको
अपना नेता स्वीकार कर लिया था। सांगा के नेतृत्व के कारण ही राजस्थान समस्त भारत वर्ष में अथवा दिल्ली पर राजपूती प्रभुत्व स्थापित
करने का स्वप्न देखने लगा था।
राणा सांगा ने मालवा, गुजरात और यहां तक कि इब्राहीम लोदी की
मिली-जुली सेना को और अलग-अलग रूप से भी कितनी ही बार
पराजित किया। मालवा का शासक महमूद द्वितीय भी सांगा के हाथों
परास्त हुआ। सांगा इब्राहीम लोदी की शक्ति हीनता का लाभ उठाकर
दिल्ली पर हिन्दू राज्य स्थापित करने को लालायित था। डॉ. जी.एन. शर्मा
के अनुसार – राणा सांगा युद्ध की प्रतिमा थे। ऐसा माना जाता है कि
जीवन पर्यन्त युद्ध करते रहने के कारण उसके शरीर पर अस्सी घावों के
निशान थे तथा एक हाथ, एक आंख और एक टांग बेकार सी हो गई।
वास्तव में उसकी वीरता और प्रभुता की धाक समस्त उत्तरी भारत वर्ष में
फैली हुयी थी।
सांगा के नेतृत्व शक्ति के कारण ही बाबर के आक्रमण के पूर्व
राजपूत शासकों का प्रथम बार इतना विशाल संगठन स्थापित हुआ था।
इस संगठन का उद्देश्य भारतवर्ष में अपना राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित
करना था। किन्तु खानवां के युद्ध में सांगा पराजित हुआ। उसकी
महत्त्वाकांक्षा अधूरी रही। इसके एक वर्ष बाद ही सांगा की मृत्यु हो गई।
12. मारवाड़ – मेवाड़ के अतिरिक्त अन्य महत्त्वपूर्ण राज्य मारवाड़ था।
यह राजस्थान के पश्चिमी भाग में अवस्थित था। संस्कृत शिलालेखों एवं
पुस्तकों में इस राज्य के अनेक नाम मिलते हैं। मरूदेश, मरू, मरूस्थल
आदि अनेक नामों से इसे पुकारा जाता है परंतु साधारण बोलचाल की भाषा में यह मारवाड़ अथवा मरूधर के नाम से जाना जाता है। जोधपुर
शहर के निर्माण के बाद इस राज्य की राजधानी जोधपुर को ही बना दिया
तथा तभी से इसे राजधानी के नाम से ‘जोधपुर राज्य’ ही कहना प्रारम्भ
कर दिया गया। राजस्थान के राज्यों में जोधपुर का भी विशिष्ट महत्त्व रहा
है। यह राज्य विस्तार में अन्य राज्यों की अपेक्षाकृत अधिक बढ़ा है
बाबर के आक्रमण के समय जोधपुर का शासक राव गांगा था।
उसने 1515 ई. से 1531 ई. तक मारवाड़ पर शासन किया। यह सांगा का
समकालीन था। 1526 के युद्ध में भी यह अपनी सेना सहित बाबर के
विरूद्ध राणा सांगा को सहायता देने के लिए खानवां के युद्ध में सम्मिलित
हुआ। इसके राज्याभिषेक के समय में मारवाड़ की स्थिति असुरक्षित थी।
सामन्त लोग शासक के साथ बराबरी का दावा करते थे। जोधपुर के
आसपास मेड़ता, नागौर, सांचोर और जालोर स्वतंत्र राज्य थे। परंतु राव
गांगा ने बड़ी दृढ़ता से मारवाड़ की सीमाओं को बढ़ाने का प्रयत्न किया
और उसमें उसे बड़ी सीमा तक सफलता भी मिली। उत्तराधिकारी शासक
मालदेव एक श्रेष्ठ और शक्तिशाली शासकों की गणना में आ सका।
मारवाड़ उसके शासन काल में पूर्ण रूप से सुव्यवस्थित आरै सुसंगठित
था।
13. बीकानेर – राठौड़ वंश का एक अन्य राज्य बीकानेर था जिसे
जांगल प्रदेश भी कहा जाता है अर्थात् एक ऐसा देश जहां पानी और वृक्षों
की कमी हो। बीकानेर राठौड़ों के अधीन आने से पूर्व परमारों के अधीन
था। बीकानेर में राठौड़ राज्यवंश की स्थापना राव बीका ने की। राव बीका
जोधपुर के शासक राव जोधा का पुत्र था। अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के उद्देश्य से वह जांगल प्रदेश में एक छोटी सेना सहित आया और
यहां अपने एक अलग राज्य की स्थापना की। यहां पर अनेक छोटे-छोटे
राज्य थे। यह क्षेत्र रेगिस्थानी भाग होने के कारण आक्रमणकारियों के लिए
विशेष आकर्षण का केन्द्र नहीं रहा। इसीलिए 15वी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में
भी अन्यान्य छोटे-छोटे राजवंश वहां पर विद्यमान थे। राव बीका के लिए
बीकानेर राज्य का छोटे-छोटे भागों में विभाजित होना हितकर सिद्ध हुआ
क्योंकि यहां की छोटी-छोटी जातियों को हराकर बड़ी आसानी से वह एक
विशाल साम्राज्य स्थापित कर सका।
और 1485 ई. में उसने बीकानेर नगर और दुर्ग का निर्माण कार्य प्रारम्भ
करवा दिया। सन् 1505 ईस्वी में अपनी मृत्यु से पूर्व राव ने बीकानेर राज्य
की सीमा को पंजाब में हिसार तक पहुँचा दिया। मांडोत, मिश्रीलाल, मुगल सम्राट् बाबर, पृ. 55.
बाबर के आक्रमण के समय यहां का शासक लूणकरण था। उसने
21 वर्ष तक शासन किया और सामंती विद्रोही को दबाया। पड़ौसी शासकों
को पराजित कर उसने अपने साम्राज्य का विस्तार किया तथा राज्य की
सीमाओं को सुरक्षित किया। उसने फतेहपुर, नागौर, जैसलमेर व नारनौल
आदि स्थानों पर आक्रमण किये। वह एक अच्छा विजेता ही नहीं, अपितु
प्रजाहितैषी, साहित्य प्रेमी और दानी शासक था। अकाल तथा अन्य संकट
के समय में वह अपनी प्रजा को सहायता देता था। अपनी वीरता, शौर्यता
व प्रजा हितैषी कार्यों के कारण उसने राठौड़ राजवंश को बीकानेर क्षेत्र में
दृढ़ किया। बाबर के आक्रमण के समय मेवाड़ व मारवाड़ के बाद बीकानेर
ही सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य था।
14. कछवाहा, राजवंश – राजस्थान का अन्य महत्त्वपूणर् राज्य कछवाहा
राजवंश था। यह अपने आपको कुश के वंशज मानते हैं। राजस्थान में इस
राजवंश की स्थापना के काल के बारे में मतभेद हैं। सभी इतिहासकार इस
विषय पर एकमत हैं कि सौढ़ादेव इस राजवंश का संस्थापक था जिसने
सबसे पहले दौसा पर अधिकार किया।
ओझा की मान्यता है कि सौढ़ादेव राजस्थान में 1137 ई. में आया।
कर्नल टाड ने 967 ई., श्यामलदास ने 976 ई. और इम्पीरियल गजीटियर
के अनुसार 1128 ई. को सौढ़ादेव के राजस्थान आगमन का समय बताया
गया है। शिलालेशों में ओझा के कथन की पुष्टि होती है। सौढ़ादेव
ग्वालियर से दौसा आया, वहां के बढ़गुर्जरों को पराजित किया और बाद में
जयपुर (ढूंढाण प्रदेश) में अपना राज्य स्थापित किया। जब आमेर शहर का
निर्माण हुआ, तब से यह आमेर राज्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाबर के आक्रमण के समय आमेर का शासक पृथ्वीराज था। बाबर
के आक्रमण तक आमेर राज्य का राजस्थान में विशेष महत्त्व नहीं था किन्तु
इसकी सीमायें लगभग निश्चित हो गई थी। पृथ्वीराज ने अपने साम्राज्य
का विस्तार नहीं किया। वह कृष्ण का परम भक्त था। उसने राज्य में
धार्मिक वातावरण उत्पन्न किया। इस काल में आमेर में बहुत से मंदिरों का
निर्माण हुआ जो वास्तुकला के विशेष उत्कृष्ट नमूने हैं। पृथ्वीराज खानवां
के युद्ध में राणा सांगा की तरफ से लड़ा था।
15. चौहान राजवंश – राजस्थान का एक अन्य महत्त्वपूर्ण राज्य चौहान वंश का था। प्राचीन काल में इस राजवंश का राजस्थान में बहुत प्रभाव था। अजमेर और सांभर इसके मुख्य केन्द्र थे। राजस्थान के अनेक भागों
में छोटे-छोटे चौहान वंशीय राज्य थे किन्तु सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में
यह सारा प्रभाव समाप्त हो गया था और केवल हाड़ौती प्रदेश (वर्तमान
कोटा-बूंदी का क्षेत्र) में चौहान वंश का राज्य रह गया। सोलहवीं शताब्दी
के पूर्व चौहान वंशीय राजवंश मेवाड के अधीन था। यहां के शासकों का
स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था। राणा सांगा की मृत्यु के बाद उत्पन्न
परिस्थितियों के कारण यहां के शासकों ने अपने आपको मेवाड से स्वतंत्र
कर लिया किन्तु इनकी स्वतंत्रता अधिक समय तक नहीं बनी रह सकी।
कुछ ही समय बाद इस राजवंश ने बाध्य होकर मुगलों की अधीनता
स्वीकार कर ली थी।
16. बहमनी राज्य –सुल्तान मुहम्मद तुगलक के शासन काल में दक्षिणी
भारत में बहमनी राज्य की स्थापना हुई। बहमनी दक्षिण भारत का एक
प्रबल राज्य था जो लगभग दो शताब्दियों तक रहा। परन्तु आन्तरिक
संघर्ष और विजयनगर राज्य के साथ निरन्तर युद्धों के कारण इसका पतन
हो गया। अमीरों की शक्ति निरन्तर बढ़ती जा रही थी। बहमनी राज्य का
अंतिम शासक महमदू शाह था जिसका शासन काल 1482 ई. से 1518 ई.
तक रहा। इसके पश्चात् बहमनी राज्य छिन्न-भिन्न होकर पांच विभिन्न
राज्यों में विभाजित हो गया। ये राज्य अहमद नगर, बीदर, बरार, बीजापुर
और गोलकुण्डा के नाम से बने।
सबसे उल्लेखनीय बात यह थी कि बहमनी राज्यों के सभी शासक
इस्लाम के शियामत के अनुयायी थे। इन नवीन निर्मित राज्यों में परस्पर संघर्ष और वैमनस्य चलता रहा जिसके कारण इन राज्यों की शक्ति क्षीण
हो गई जिससे दक्षिण भारत की राजनीति में अव्यवस्था और असंतुलन के
वातावरण का संचार हुआ।
बाबर के आक्रमण के समय इन सभी मुस्लिम राज्यों का अस्तित्व
कायम था परन्तु आपसी वैमनस्य और संघर्षरत रहने के कारण इन राज्यों
ने उत्तरी भारत की राजनीति पर प्रभाव नहीं डाला।
17. विजयनगर – भारतवर्ष के हिन्दू राज्यों में सर्वाधिक शक्तिशाली
राज्य विजयनगर था। इस राज्य की स्थापना 1336 ई. में हरिहर आरै बुका
ने की। यह राज्य दक्षिण भारत में हिन्दू-धर्म और संस्कृति की रक्षा के
लिये बहमनी राज्य से बराबर संघर्षरत रहा। बाबर के आक्रमण के समय में
विजयनगर राज्य का शासक कृष्णदेव राय था, जो अपने वंश का महान्तम
शासक था। वह बहुत ही वीर, साहसी, विजेता और योग्य शासक था।
साहित्य और कला से उसे बहुत प्रेम था। उसके शासन काल में
विजयनगर राज्य राजनीतिक, आर्थिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक दृष्टि से
प्रगति की चरम-सीमा पर था। यह राज्य उत्तरी भारत से बहुत दूर
उपस्थित था। इसलिए उत्तरी भारतवर्ष की राजनीति को इसने सम्पर्क सूत्र
की कमी के कारण प्रभावित नहीं किया। किन्तु दक्षिण में मुसलमान
आक्रमणकारियों को आगे बढ़ने से रोका और दक्षिण भारत में हिन्दू-धर्म
और संस्कृति की रक्षा करने में भी सफलता प्राप्त की।
के.एम. पन्निकर का मन्तव्य है कि कृष्णदेव अशोक, चन्द्रगुप्त
विक्रमादित्य, हर्ष एवं भोज की परंपरा में एक महान् सम्राट् था, जिसका राज्य अपने वैभव के शिखर पर था। बाबर ने भी उसे दक्षिणी भारत का
सबसे प्रतापी एवं शक्तिशाली शासन माना है।
18. गोआ के पुर्तगाली – बाबर के आक्रमण के समय पुर्तगालियों ने
दक्षिण में अपने पैर जमा लिये थे। 1498 ई. में वास्कोडिगामा ने कालीकट
के बन्दरगाह तक पहुँच कर पश्चिमी देशों के लिए भारत के द्वार खोल
दिए। सन् 1510 ई. में पुर्तगाली गवर्नर अल्बु कर्क ने गोआ पर अधिकार
कर लिया। फलत: कुछ ही समय पश्चात् यह नगर पुर्तगालियों की
कार्यवाही का केन्द्र और राजधानी बन गया। शीघ्र ही उन्होंने दिऊ, दमन,
साल्सेट तथा बसीन पर भी आधिपत्य स्थापित कर लिया।
बाबर के आक्रमण के समय भारत की सामाजिक स्थिति
बाबर के आक्रमण के समय भारत में समाज मुख्य रूप से हिन्दू और
मुसलमान दो वर्गों में विभाजित था। हिन्दू-समाज में जाति और
वर्ण-व्यवस्था प्रचलित थी। हिन्दू-समाज कई जातियों, उपजातियों में
विभाजित था। व्यवसाय भी अधिकांशत: जाति-व्यवस्था पर आधारित था।
इस्लाम धर्म से हिन्दूत्व की रक्षा के लिए सामाजिक नियम और
नियंत्रण और भी कठोर बना दिए गए थे। छुआछूत की भावना विद्यमान
थी। समाज में ब्राह्मण वर्ग का बोलबाला था। धार्मिक और सामाजिक
अनुष्ठान का कार्य ब्राह्मण करते थे। हिन्दू राजपूत राज्यों में क्षत्रियों का
बहुत सम्मान था। अपने वैभव के कारण वैश्य वर्ग को भी समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त थी।
अन्य विश्वास, रूढ़िवादिता, आडम्बर आदि बुराइयां व्याप्त थीं। स्त्रियों को समाज में आदर की दृष्टि से नहीं देखा जाता था। उन
पर अन्यान्य प्रकार के बंधन थे। घर की चहारदीवारी तक ही उनका
कार्यक्षेत्र सीमित था। समाज में बहुपत्नी प्रथा, सतीप्रथा, पर्दाप्रथा और
बाल-विवाह का विशेष प्रचलन था।
एस.एल. नागोरी एवं प्रणव देव का अभिमत है कि बाबर के आक्रमण
के समय भारत में दो वर्ग थे – हिन्दू एवं मुसलमान। सदियों से साथ
रहने एवं भक्ति आंदोलन व सूफी मत के परिणामस्वरूप दोनों परस्पर
निकट आ गये थे। बोल-चाल का माध्यम, उर्दू भाषा तथा हिन्दी भाषा
थी। भक्ति आंदोलन से प्रान्तीय भाषाओं तथा साहित्य का विकास हुआ।
हिन्दू-समाज में बहु-विवाह, बाल-विवाह, सती-प्रथा तथा पर्दा-प्रथा के
प्रचलन के परिणाम स्वरूप स्त्रियों की स्थिति विशेष शोचनीय हो गई थी।
विधवाओं की स्थिति बड़ी दयनीय थी। मुस्लिम-समाज में बहु-विवाह एवं
तलाक-प्रथा के कारण स्त्रियों की दशा खराब थी। दासों की स्थिति भी
बड़ी दयनीय थी।
समाज में साधारण वर्ग की दशा दयनीय थी। धार्मिक असहिष्णुता
का वातावरण था। धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर लोगों पर अत्याचार हो
रहे थे। मुस्लिम शासकों ने हिन्दू जनता पर धर्मान्धता के कारण अन्यान्य
अत्याचार किये। हिन्दू जनता में इतनी शक्ति नहीं थी कि वे संगठित रूप
से इन कुपरिस्थितियों का मुकाबला कर पाते।
बाबर के आक्रमण के समय भारत की धार्मिक स्थिति
हिन्दू-समाज में वैष्णव, जैन, शैव, शाक्त और
अन्य कई सम्प्रदाय और मत मतान्तर प्रचलित थे। मंदिरों में धर्म के नाम
पर दुराचरण होता था। तंत्र-मंत्र अनुष्ठान, भूत-प्रेत, मूर्ति पूजा, कर्मकाण्ड,
यज्ञ, अनुष्ठान हवन, पूजा पाठ आदि कई बातों में विश्वास किया जाता
था। बहुदेववाद का प्रचलन था। पशु बलि-प्रथा प्रचलित थी। धर्म को
बहुत ही संकीर्ण बना दिया गया था। धर्म शास्त्रों का अध्ययन केवल
ब्राह्मण वर्ग तक ही सीमित था। पन्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में
हिन्दू-धर्म व समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए रामानन्द,
कबीर, रैदास, चैतन्य, महाप्रभु, गुरू नानक, तुकाराम जैसे भक्तों और संतों
ने बहुत प्रयास किया। उन्होंने एकेश्वरवाद पर जोर दिया और भक्ति को
ही मुक्ति का साधन माना। जाति प्रथा, अन्ध विश्वास और मिथ्या आडम्बरों
का खंडन किया।
इस समय देश में हिन्दू, मुस्लिम समन्वय के प्रयास भी हुए। इसमें
भक्ति आंदोलन व सूफी मत के संतों ने काफी योगदान दिया जिसके
कारण हिन्दू व मुसलमानों के बीच भ्रातृत्व भावना पैदा हुई और सामाजिक
एकता को प्रोत्साहन मिला। तत्कालीन साहित्य, स्थापत्य कला, संस्कृति,
धार्मिक व सामाजिक-जीवन में भी उन्नति हुई और धार्मिक सहिष्णुता की
भावना में विशेष वृद्धि हुई।
बाबर के आक्रमण के समय भारत की आर्थिक स्थिति
आर्थिक दृष्टि से भी समाज में प्रथम, मध्यम और निम्न वर्ग थे।
प्रथम वर्ग बहुत ही सम्पन्न एवं समृद्ध था, जिसमें बड़े-बड़े शासक, उच्च द्रष्टव्य – श्रीवास्तव, कन्हैया लाल, झारखण्ड चौबे, मध्ययुगीन कोटि के सामन्त और पदाधिकारी तथा धनवान लोग सम्मिलित थे। यह
वर्ग विलास प्रिय जीवन व्यतीत करता था। मध्यम वर्ग में छोटे-छोटे
अमीर, सामन्त व्यापारी आदि सम्मिलित थे। निम्न वर्ग में सैनिक, शिल्पी,
श्रमिक और कृषक वर्ग था, जो प्राय: सादा-जीवन व्यतीत करता था।
साधारण तौर पर देश आर्थिक दृष्टि से उन्नत था। खाद्यान्न की कमी न
थी और आवश्यकता की सभी वस्तुएं सुलभ थी। अतिवृि “ट आरै अनावृष्टि
से अकाल पड़ने पर साधारण वर्ग की आर्थिक स्थिति बिगड़ जाती थी।
ग्रामीण जीवन सरल और सुखी था। किसानों की दशा ठीक थी। उन्हें
अपनी उपज का ⅓ भाग भूमि कर के रूप में देना पड़ता था। आन्तरिक
व विदेशी व्यापार उन्नत दशा में था।
तिब्बत आदि देशों से स्थल-मार्ग द्वारा और अरब मलाया आदि देशों में
सामुद्रिक व्यापार होता था। लोग आर्थिक दृष्टि से सुखी व सम्पन्न थे।
नागोरी एवं प्रणवदेव का अभिमत है कि अच्छी वर्षा के कारण पर्याप्त मात्रा
में अन्न उत्पन्न होता था। एक यात्री एक बतौली (एक तरह का सिक्का)
से दिल्ली से आगरा जा सकता था। उद्योग-धन्धे तथा व्यापार भी उन्नत
दशा में थे। कुशल कारीगर पर्याप्त संख्या में थे। सामान्य जनता का
जीवन सुखी था।बाबर भी भारत की अतुल धन राशि से लालायित होकर
ही भारत की ओर उन्मुख हुआ था।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि बाबर के आक्रमण के समय भारत
सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक सभी दृष्टियों से
उन्नत स्थिति में था। किन्तु राजनीतिक परिस्थितियां ठीक नहीं थी। उसने इन अस्थिर राजनीतिक परिस्थितियों का पूरा-पूरा लाभ उठाया और भारत
पर आक्रमण कर विजय प्राप्त करने में सफल हुआ और भारत में मुगल
साम्राज्य की नींव डाली।
बाबर का साम्राज्य विस्तार
संक्षेप में 1529-30 तक बाबर अपनी विजयों के कारण लगभग
सम्पूर्ण उत्तरी भारतवर्ष का शासन बन गया था। उसका साम्राज्य मध्य
एशिया में आक्सस नदी से लेकर उत्तरी भारत में बिहार तक फैला हुआ
था। बंगाल के सुल्तान नुसरत शाह ने उसका आधिपत्य स्वीकार कर
लिया था। उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में चंदेरी तक उसका साम्राज्य
फैला हुआ था। हिन्दुकुश से परे के बदख्शा, कुण्डुज, बल्ख आदि के प्रदेश भी उसके अधीन थे। भारत की उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर स्थित काबुल,
गजनी, कंधार भी उसके राज्य के अंग थे। 1 मुल्ला अहमद, तारीखे अल्फी (रिजवी), पृ. 645.
राजपूताना और मालवा में
रणथंभोर व चंदेरी के दुर्ग पर उसका अधिकार था। इस प्रकार बाबर ने
अपनी विजयों के द्वारा उत्तरी भारत के एक विशाल भू-भाग पर आधिपत्य
कायम कर लिया था। परंतु इस संबंध में वन्दना पाराशर ने सत्य ही
लिखा है – ‘पानीपत’ खानवा और घाघरा जैसी विजयों ने उसे सुरक्षा और
स्थायित्व प्रदान किया था किन्तु बाबर के अंतिम दिनों में इस साम्राज्य की
विघटनशील प्रवृत्तियां उभरने लगी थीं। खलीफा और मैंहदी ख्वाजा अपने
प्रयास में विफल हो जाने पर भी अत्यन्त प्रभावशाली थे। उनके अतिरिक्त
मोहम्मद सुल्तान मिर्जा, मोहम्मद जमान मिर्जा आदि अनेक अमीर अपने
अधिकारों के प्रति सजग थे। कामरान कंधार से संतुष्ट नहीं था और
काबुल पर उसकी नजर थी। पंजाब में अब्दुल अजीज और ग्वालियर में
रहीम दाद का विद्रोही स्वर बाबर के समय में ही फूटने लगा था। गुजरात
में साधन-सम्पन्न एवं महत्त्वाकांक्षी सुल्तान बहादुर शाह शक्ति संचय कर
रहा था। राजपूताने में खानवा और मालवा में चंदेरी की विजय के बाद भी
राजपूत न तो कुचले गये थे और न ही अफगानों का विद्रोह समूल नष्ट
किया जा सका था। इन बिखरे हुए तत्वों को एकत्रित एवं संगठित रखने
के लिए बाबर के उत्तराधिकारी का बाबर के ही समान दृढ़ और साहसी
व्यक्तित्व अपेक्षित था।’
परिस्थितियों में तो ठीक था, किंतु शांतिकाल के लिए उपयुक्त न था।
बाबर के अंतिम दिन और खलीफा का षडयंत्र घाघरा के युद्ध में अफगानों को पराजित कर, बंगाल के सुल्तान
नुसरत शाह से संधि करने के बाद 21 जून, 1529 ई. को बाबर आगरा
लौट आया। बाबर की शारीरिक दुर्बलता और मानसिक चिंता को देखते
हुए उसके प्रधानमंत्री निजामुद्दीन अली खलीफा ने मैंहदी ख्वाजा को बाबर
की मृत्यु के बाद हुमायूं के बजाय सिंहासनारूढ़ करने का प्रयत्न किया जो
खलीफा का षड्यंत्र कहलाता है।
बाबर की मृत्यु 26 दिसम्बर, 1530 ई. को हुई और हुमायूं चार दिन
बाद गद्दी पर बैठा। हुमायूं के हिन्दुस्तान में होते हुए भी बाबर की मृत्यु के
चार दिन बाद गद्दी पर बैठने के दो कारण हो सकते हैं – प्रथम तो यह
कि हुमायूं के स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को गद्दी पर बिठाने का षड्यंत्र
इस मध्य किया गया हो और वह असफल हुआ हो अथवा दूसरा यह कि
हुमायूं आगरा में उपस्थित नहीं था।
खलीफा के षड्यंत्र का विस्तृत उल्लेख निजामुद्दीन अहमद ने
‘तबकाते अकबरी’ में किया है। निजामुद्दीन के अनुसार – अमीर निजामुद्दीन
अली अलीफा, जिस पर शासन-प्रबंध के कार्य अवलम्बित थे, किन्हीं
कारणों से शाहजादा मोहम्मद हुमायूं मिर्जा से भयभीत था और वह उसे
बादशाह बनाने के पक्ष में नहीं था। जब वह ज्येष्ठ पुत्र के पक्ष में नहीं था
तो छोटे पुत्रों के पक्ष में भी नहीं हो सकता था। चूंकि बाबर का जामाता
मैंहदी ख्वाजा एक दानी और उदार व्यक्ति था तथा अमीर खलीफा से
उसकी बहुत घनिष्ठता थी, इसलिए अमीर खलीफा ने उसे बादशाह बनाने
का निर्णय किया। लोगों में यह बात प्रसिद्ध हो गई। वे मैंहदी ख्वाजा को
अभिवादन करने जाने लगे। मैंहदी ख्वाजा भी इस बात को समझकर लोगों
से बादशाह के समान व्यवहार करने लगा। किंतु किन्हीं कारणों से मैंहदी
ख्वाजा को बादशाह नहीं बनाया गया। मीर खलीफा ने तत्काल मोहम्मद
हुमायूं मिर्जा को बुलाने के लिए भेजा तथा मैंहदी ख्वाजा को जबरन उसके
घर भेज दिया गया।
अबुल फजल ने भी इस संबंध में लिखा है कि मीर खलीफा हुमायूं
से किन्हीं कारणों से आशंकित था और मैंहदी ख्वाजा को बादशाह बनाना
चाहता था किन्तु बाद में मीर खलीफा ने यह विचार त्याग दिया तथा
मैंहदी ख्वाजा को दरबार में आने से मना कर दिया। ईश्वर की कृपा से
सब काम ठीक हो गया।
निजामुद्दीन और अबुल फजल ने जो विवरण दिया है उससे स्पष्ट है
कि –
- जब बाबर बहुत रूग्णावस्था में था तब खलीफा ने बाबर के
अंतिम दिनों में यह योजना बनाई थी। - हुमायूं उन दिनों आगरा में उपस्थित नहीं होकर अपनी जागीर
संभल में था। - खलीफा ने मैंहदी ख्वाजा को अपने घर जाने के आदेश दिए
तथा अमीरों को उसके घर जाने से इंकार कर दिया जिससे
यह ज्ञात होता है कि बाबर की रूग्णावस्था और हुमायूं की
अनुपस्थिति के कारण खलीफा का प्रभाव काफी बढ़ गया था
और वह स्वयं बाबर के नाम से आदेश देने लगा था। - दोनों ही लेखक इस बात को स्वीकार करते हैं कि किन्हीं
कारणों से खलीफा हुमायूं से आशंकित और भयभीत था।
इसलिए संभव है कि खलीफा ने यह सोचा होगा कि यदि
हुमायूं को बादशाहत मिली तो उसकी स्थिति और प्रभाव में
कमी आ जाएगी। अस्तु खलीफा एक ऐसे व्यक्ति को
सिंहासनारूढ़ करना चाहता था जो योग्य भी हो तथा उसके
प्रभाव में बना रह सके। यही सोचकर उसने मैंहदी ख्वाजा
का चयन किया होगा। किंतु जब उसने मोहम्मद मुकीम से
यह सुना कि मैंहदी ख्वाजा बादशाह बनते ही सबसे पहले
खलीफा को रास्ते से हटाने की सोच रहा है, तब उसने इस
योजना का परित्याग कर दिया और बाबर की मृत्यु के चार
दिन बाद हुमायूं को सिंहासनारूढ़ कर दिया गया। यह भी
स्पष्ट है कि हुमायूं को बादशाह बनाने में खलीफा की भी
सहमति थी।
यादगार और सुर्जनराय ने भी इस बात की पुष्टि की है कि बाबर
की रूग्णावस्था के दौरान खलीफा हुमायूं के स्थान पर मैंहदी ख्वाजा को
बादशाह बनाना चाहता था।
श्रीमती बेवरिज की मान्यता है कि न केवल खलीफा, अपितु बाबर
भी हुमायूं के स्थान पर मोहम्मद जमान मिर्जा को गद्दी पर बिठाना चाहता
था न कि मैंहदी ख्वाजा को। श्रीमती बेवरिज का अनुमान है कि बाबर
मोहम्मद जमान मिर्जा को हिन्दुस्तान का राज्य सौंपकर काबुल लौट जाना
चाहता था, लेकिन हुमायूं के अकस्मात् बदख्शां से आ जाने, उसकी
बीमारी, बाबर के आत्म बलिदान आदि कारणों ने हुमायूं को सिंहासनारूढ़ कर दिया। रश्बु्रक विलियम्स की भी मान्यता है कि माहम बेगम को
खलीफा के षड्यंत्र की सूचना थी, इसीलिए उसने हुमायूं को बदख्शां से
बुला लिया और वह बाबर के कहने के उपरान्त भी पुन: बदख्शां नहीं
गया। तत्पश्चात् हुमायूं ने अपने अच्छे व्यवहार से बाबर को खुश कर दिया
और उसने उसे अपना उत्तराधिकारी बना दिया।
वन्दना पाराशर ने श्रीमती
बेवरिज और रश्बु्रक विलियम्स के कथन से असहमति प्रकट करते हुए
लिखा है –
- इस अनुमान की पुष्टि किसी समकालीन अथवा परवर्ती वृत्तान्त से
नहीं होती कि खलीफा मोहम्मद जमान मिर्जा को गद्दी पर बिठाना
चाहता था। - यदि खलीफा किसी तैमूर के वंशज को ही गद्दी पर बिठाना चाहता
था तो मोहम्मद जमान मिर्जा के अतिरिक्त और भी अनेक तैमूर के
वंशज हिन्दुस्तान में उपस्थिति थे। फिर खलीफा ने मोहम्मद जमान
मिर्जा को ही क्यों चुना? - जवान का अर्थ युवक ही नहीं, सैनिक भी होता है और यजना केवल
पुत्री के पति को ही नहीं, बहन के पति को भी कहा जाता है। - मोहम्मद जमान मिर्जा को शाही चिºन प्रदान करने का तात्पर्य उसे
उत्तराधिकारी बनाना नहीं था। इस प्रकार के चिºन बाबर ने अस्करी
को भी प्रदान किये थे। - खलीफा की योजना से बाबर के सहमत होने का विचार भी कल्पना
मात्र है। समकालीन वृत्तान्तों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि बाबर ने हुमायूं को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया था। खलीफा ने
यह योजना तब बनाई थी जब बाबर बीमार था और राज्य-कार्य
खलीफा पर निर्भर थे। सहमत होना तो दूसरी बात है, बाबर को इस
योजना की सूचना मिलने का उल्लेख भी किसी वृत्तान्त में नहीं
मिलता। - जून-जुलाई 1529 में हुमायूं बदख्शां से बाबर के निमंत्रण पर आया
था न कि माहम बेगम के निमंत्रण पर। माहम बेगम के आगरा पहुँचने
के केवल दस दिन बाद हुमायूं आगरा में था। इतने कम समय में
माहम बेगम का खलीफा की योजना के विषय में पता लगाना, हुमायूं
को सूचित करना और हुमायूं का आगरा पहुँच जाना असंभव था।
दूसरे, 10 जून, 1529 ई. को जब माहम बेगम काबुल-आगरा मार्ग पर
थी तब हुमायूं बदख्शां से चलकर काबुल पहुँच चुका था। तीसरे
हुमायूं 1529 की जून-जुलाई में आया था और बाबर की मृत्यु
दिसम्बर 1530 में हुई। हुमायूं के आगरा आने से लेकर बाबर की मृत्यु
तक, अर्थात् डेढ़ वर्ष तक षड्यंत्र होता रहा और बाबर को उसकी
सूचना भी न मिली, यह असंभव है। फिर निजामुद्दीन और अबुल
फजल ने स्पष्ट लिखा है कि यह योजना बाबर की बीमारी के दौरान
बनी अत: हुमायूं के बदख्शां से आने और खलीफा के षड्यंत्र में कोई
अन्तर नहीं है। - यह सत्य है कि बाबर समरकन्द विजय की अभिलाषा से कभी मुक्त
नहीं हो सका और काबुल को खालसा में सम्मिलित करने की इच्छा
का भी उसने अपने पत्रों में कई बार उल्लेख किया है। किन्तु इसका
अभिप्राय यह नहीं था कि वह काबुल को अपने साम्राज्य का केन्द्र
मानता था और काबुल लौट जाना चाहता था। यदि वह हिन्दुस्तान में
किसी को नियुक्त करके काबुल या समरकन्द जाना चाहता था तो
उसका उत्तराधिकारी निश्चित रूप से हुमायूं था, मोहम्मद जमान मिर्जा
या मैंहदी ख्वाजा नहीं।
उपर्युक्त विवरण से यह तो स्पष्ट है कि खलीफा का षड्यंत्र अवश्य
हुआ किंतु किन्हीं परिस्थितियों में वह क्रियान्वित नहीं हो सका और बाबर
की मृत्यु (26 दिसम्बर, 1530) के चार दिन बाद हुमायूं को गद्दी पर
बिठाया गया। हुमायूं के सिंहासनारूढ़ होने में यह चार दिन की देरी
इसलिए हुई क्योंकि वह उस समय आगरा में नहीं था।
बाबर की मृत्यु
बाबर की मृत्यु के बारे में एक कहानी यह प्रचलित है कि जब हुमायूं
बहुत बीमार हो गया तो उसे संभल से आगरा लाया गया। बहुत उपचार
के बाद भी जब हुमायूं की हालत में सुधार नहीं हुआ तो मीर अबुल बका
ने बाबर से कहा कि यदि कोई मूल्यवान वस्तु रोगी के जीवन के बदले में
दान कर दी जाये तो वह बच सकता है। बाबर ने कहा कि उसके जीवन
से ज्यादा मूल्यवान और क्या हो सकती है? तत्पश्चात् बाबर ने हुमायूं की
शैय्या के चारों ओर तीन चक्कर लगाकर प्रार्थना की कि यदि जीवन का
बदला जीवन ही होता है, तो वह हुमायूं के जीवन के बदले में अपने प्राणों
का दान करता है। बाबर की प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। वह बीमार पड़
गया, हुमायूं अच्छा होने लगा। इसके बाद हुमायूं संभल चला गया। जब
बाबर का स्वास्थ्य काफी बिगड़ गया तो उसे कालिंजर अभियान से बुलाया
गया। बाबर ने उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और उसकी मृत्यु हो गई। किन्तु गुलबदन बेगम की यह कहानी कपोल कल्पित और
वास्तविकता से परे है।
इब्राहीम की मां द्वारा दिया गया विष था, और उसी कारण 26 दिसम्बर,
1530 को 48 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई। मृत्यु से पूर्व उसने अमीरों
को बुलाकर हुमायूं को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने और उसके प्रति
वफादार रहने का आदेश दिया। हुमायूं को भी अपने भाइयों के प्रति अच्छा
व्यवहार रखने की चेतावनी दी। अंत में जब बाबर की मृत्यु हो गई तो
उसका पार्थिक शरीर चार बाग अथवा आराम बाग में दफना दिया गया।
‘शेरशाह के राज्यकाल में बाबर की अस्थियों को उसकी विधवा पत्नी बीबी
मुबारिका काबुल ले गई और वहां शाहे काबुल के दलान पर जो मकबरा
बाबर ने एक उद्यान में बनवाया था, वहां दफनवा दिया।’ हुमायूं 29
दिसम्बर, 1530 ई. को सिहासनारूढ़ हुआ
सन्दर्भ –
- बाबरनामा- पृ. 198-227, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बास, मुगलकालीन भारत ‘बाबर’ पृ.सं. 30-31,
- डॉ0 राधेश्याम- मुगलसम्राट बाबर, पृ.सं. 165-170. बाबरनामा, 1, पृ. 198-227,
- डॉ0 राधेश्याम, मुगल सम्राट ‘बाबर’, पृ.सं. 165-170, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बास, ‘‘मुगल कालीन भारत ‘बाबर’ ‘‘, पृ.सं. 30-31.
- बाबरनामा, 1, पृ. 198-227, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बास, मुगलकालीन भारत ‘बाबर’ पृ.सं. 30-31,
- डॉ0 राधेश्याम- मुगलसम्राट बाबर, पृ.सं. 165-170.
- बाबरनामा, 1, पृ. 198-227, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बास, मुगलकालीन भारत ‘बाबर’ पृ.सं. 30-31,
- डॉ0 राधेश्याम- मुगलसम्राट बाबर, पृ.सं. 165-170. 4 ‘तुजुके बाबरी’, 1, पृ.सं. 227, डॉ0 त्रिपाठी आर.पी. ‘मुगल साम्राज्य का उत्थान एवं पतन’, पृ.सं. 8-9, डॉ0 राधेश्याम- मुगलसम्राट बाबर, पृ.सं. 170.
- तुजुके बाबरी, भाग 1, पृ.सं. 227,
- डॉ0 राधेश्याम- मुगलसम्राट बाबर, पृ.सं. 170.
- तुजुके बाबरी, भाग 1, पृ.सं. 227-228, डॉ0 त्रिपाठी आर.पी. ‘मुगल साम्राज्य का उत्थान एवं पतन’, पृ.सं. 8-9. 3 रिजवी सैय्यद अतहर अब्बास, मुगलकालीन भारत ‘बाबर’ पृ.सं. 25-30, तुजुके बाबरी, भाग 1, पृ.सं. 227-28,
- डॉ0 राधेश्याम- मुगल सम्राट बाबर, पृ.सं. 165-170, स्टेनली लेनपूल, बाबर, पृ. सं. 60.
- तुजुके बाबरी, भाग 1, (अंग्रेजी अनुवादक ए.एस. बेवरीज) भाग 1, पृ.सं. 127-28,
- रिजवी सैय्यद अतहर अब्बास, मुगलकालीन भारत ‘बाबर’ पृ.सं. 25-30, तुजुके बाबरी, भाग 1, पृ.सं. 227-28, डॉ0 राधेश्याम- मुगल सम्राट बाबर, पृ.सं. 165-170, स्टेनली लेनपूल, बाबर, पृ. सं. 60.
- तुजुके बाबरी, भाग 1, अंग्रेजी अनुवादक (ए.एस. बेवरीज), पृ.सं. 129-29, डॉ0 त्रिपाठी आर.पी. ‘मुगल साम्राज्य का उत्थान एवं पतन’, पृ.सं. 9-10, स्टेनली लेनपूल बाबर’ पृ.सं. 60-61.
- बाबरनामा, 1, पृ. 198-206, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बास, ‘‘मुगल कालीन भारत ‘बाबर’ ‘‘, पृ. सं. 30-31.
- स्टेनले लेनपूल, ‘बाबर’ पृ.सं. 60-61, डॉ0 राधेश्याम- मुगल सम्राट बाबर, पृ.सं. 165-175.
- बाबरनामा, 1, पृ. 100-227, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बास, मुगलकालीन भारत ‘बाबर’ पृ.सं. 43-44, डॉ0 राधेश्याम- मुगल सम्राट बाबर, पृ.सं. 170-175.
- बाबरनामा, भाग-1, पृ.सं. 228, रिजवी सैय्यद अतहर अब्बास मुगल कालीन भारत, बाबर, पृ.सं. 43-44, डॉ0 राधेश्याम, मुगल सम्राट, बाबर, पृ.सं. 170-175.