अनुक्रम
बहमनी साम्राज्य की स्थापना दक्षिण भारत में मुहम्मद तुगलक के खिलाफ विद्रोह से हुई ।
1347 ई. में हसन गंगु, अलाउद्दीन बहमनशाह के नाम से गद्दी पर बैठा और दक्षिण में मुस्लिम
राज्य की नींव रखी । यह मुस्लिम राज्य भारत में बहमनी साम्राज्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
बहमनी साम्राज्य के शासक
1. अलाउद्दीन हसन बहमन शाह (1347-1358 ई.)- 1347 ई. में सरदारों ने हसन गंगु को
अबल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमन शाह के नाम से सुल्तान घोषित किया गुलबर्गा में अपनी
राजधानी स्थापित की और उसका नाम अहसनाबाद रखा ।
बहमनी साम्राज्य का महान शासक हुआ । तेलगांना गोलकुंडा के किले को छीन लिया और 22 लाख
रूपये क्षतिपूर्ति की राशि भी वसुल लिया । 1373 ई. में उनका देहान्त हो गया ।
दिया ।
दो पुत्र गयासुद्दीन तथा शम्सुद्दीन एक एक करके गद्दी पर बैठा । फिराजशाह की उपाधि
धारण करके वारंगल तथा विजयनगर को पराजित किया था ।
वह विद्वानों का संरक्षक था ।
अहमद शाह के समय में गुलबर्गा विद्रोह तथा “ाड्यन्त्रों का केन्द्र बन गया । उसने गुलबर्गा को
हटाकर बीदर को अपनी राजधानी बनाया । उसेन वारंगल पर चढ़ाई कर उसे हस्तगत कर लिया।
उसने काकतीय राज्य को भी जीत लिया था । विजयनगर से उसने कर वसूल किया । उसने
गुजरात तथा कोंकण के सामन्तों को भी पराजित किया । 1435 ई. में उसका देहान्त हो गया ।
सिहासनारूढ़ हुआ । उसने कोंकण पर चढ़ाई की, परिणामस्वरूप कोंकण के शासक के अधीनता
स्वीकार कर ली । उसके भाई ने विद्रोह कर रायचूर तथा बीजापुर उससे छीन लिया । सुल्तान ने
उसे उस विद्रोह के लिए क्षमा कर दिया तथा उसे रायचूर दे दिया । उसके समय में दक्षिणी तथा
विदेशी मुसलमानों पर पारस्परिक विरोध आकाश छू रहा था ।
साथ विजयनगर पर आक्रमण किया तथा उसे कर देने के लिए बाध्य किया ।
वह विद्वान था, पर निर्दयी तथा क्रूर था । अमीर उसकी क्रूरता से भयभीत रहते थे ।
गावान ने गद्दी पर आसीन किया । निजाम की माता उसकी संरक्षिका थी । उसने अपने पति द्वारा
दण्डित किए गए सारे व्यक्तियों को छोड़ दिया । उस पर अवसर देखकर तेलंगाना के शासकों ने
चढ़ाई कर दी, पर उसने बुद्धिमानी तथा वीरता से उन्हें खदेड़ दिया । इसी समय उसने बहमनी
को हराया तथा गुजरात पर कब्जा कर लिया । 1463 ई. में निजाम शाह की मृत्यु हो गयी।
तृतीय के नाम से गद्दी पर बैठा । उसने अलना का प्रदेश संगमेश्वरम् राजा से छीन लिया ।
विजयनगर तथा उड़ीसा पर भी आक्रमण किया । वहां लूट में हाथियों के साथ अपार धन मिला।
उसके शासनकाल में महमूद गवां के हाथों पूरी शक्ति केन्द्रित थी । महमदू गवां बहमनी साम्राज्य का प्रतिभाशाली प्रधानमन्त्री था । वह पहले मिलानी (ईरान) का
रहने वाला था । वह एक व्यापारी के रूप में गुलबर्गा आया था । अपनी योग्यता और कुशलता
के बल पर वह प्रधानमंत्री के पद तक पहुंच गया । उसने दक्षिण में विदेशी अमीरों के झगड़ों को
शान्त किया ।
बहमनी साम्राज्य के पतन के कारण
1. विलासी शासक-बहमनी साम्राज्य के शासक प्राय: विलासी थे । वे सुरा सुन्दरी में डूबे
रहते थे । विजयनगर के साथ निरन्तर संघर्ष के कारण प्रबन्ध पर विचार करने के लिए उन्हें अवसर
नहीं मिला ।
दुर्बल बना दिया ।
घृणा करती थी ।
हुए । इससे उनकी राजभक्ति में कमी आई । महमूद गवां की हत्या बहमनी साम्राज्य के लिए एक
ऐतिहासिक घटना थी, क्योंकि उसकी हत्या के पश्चात बहमनी साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया ।
नियम नहीं थे तथा राजकुमारों के सही प्रशिक्षण की व्यवस्था भी नहीं थी ।
बहमनी साम्राज्य का योगदान
1. स्थापत्य कला-सुल्तानों ने अपने शासनकाल में अनेक भव्य भवनों का निर्माण
करवाया । गुलबर्गा तथा बीदर के राजमहल, गेसुद राज की कब्र, चार विशाल दरवाजे वाला
फिरोज शाह का महल, मुहम्मद आदिल शाह का मकबरा, जामा मस्जिद, बीजापुर की गोल गुम्बद
तथा बीजापुर सुल्तानों के मकबरे स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने है । गोल गुम्बद को विश्व के
गुम्बदों में श्रेष्ठ माना जाता है । गोलकुंडा तथा दौलताबाद के किले भी इसी श्रेणी में आते हैं ।
इस स्थापत्य कला में हिन्दू, तुर्की, मिस्त्री, ईरानी तथा अरेबिक कलाओं का सम्मिश्रण है ।
2. साहित्य संगीत- बमहनी के सुल्तानों ने साहित्य तथा संगीत को प्रोत्साहित किया।
ताजउद्दीन फिराज शाह स्वयं फारसी, अरबी और तुर्की भाषाओं का विद्वान था । उसकी अनेक
हिन्दू रानियां भी थी । वह प्रत्येक रानी से उसी की भाषा में बोलता था । मुहम्मद शाह तृतीय तथा उसका वजीर महमूद गवा एक विद्वान था । उसने शिक्षा का
प्रचार किया । विद्यालय तथा पुस्तकालय खोले । इसके निजी पुस्तकालय में 3000 पुस्तकें थीं ।
उसके दो ग्रंथ अत्यधिक प्रसिद्ध हैं –
- उरोजात-उन-इंशा,
- दीवाने अश्र ।
प्रादेशिक तथा ऐतिहासिक साहित्य का उन्नयन हुआ ।