अनुक्रम
इस प्रकार सिद्धान्त समझने तथा किन कार्यों से क्या परिणाम होंगे, का पूर्वानुमान लगाने में सहायक होते हैं। इस प्रकार सिद्धान्त रूप आधार समस्त कार्यों का सारथी होता है। एक कुशल प्रबन्धक, किसी भी व्यवसाय, उद्योग तथा देश की आर्थिक प्रगति एवं समृद्धि का सूत्रधार होता है। अत: भावी प्रबन्धकों को कुशल एवं वैज्ञानिक बनाने के लिए यह आवश्यक प्रतीत होता है कि वे महान प्रबन्ध गुरूओं के नियमों एवं सिद्धान्तों से पूर्णतया परिचित हो तथा व्यावसायिक प्रतिस्पर्धियों की प्रकृतिनुसार उनका सुव्यवस्थित सुसंगठित तथा क्रमबद्ध प्रयोग करें।
अर्थ, प्रकृति तथा विशेषताएं
प्रबन्ध के संबंध में हम कह सकते हैं कि ये मूलभूत सार्वभौमिक सत्य है जो प्रबन्धकीय कार्यों को दिशा देने में, परिणामों की व्याख्या करने में, तथा उनकी भविष्यवाणी करने में सहायक होते हैं । इन सिद्धान्तों का अवतरण आर्थिक क्रियाकलाप के विभिन्न आयामों में प्रबन्धकों के अनुभवों तथा व्याख्या के द्वारा सम्भव हुआ लगता है। इनका प्रमुख उद्देश्य प्रबन्ध सिद्धान्तों को सुव्यवस्थित करना होता है जिससे प्रबन्ध प्रक्रिया में प्रबन्धकों के कार्यों का मार्ग आसान एव लक्ष्योंन्मुख हो सकें। इस प्रकार ये सिद्धान्त वैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में प्रबन्ध के आधार स्तम्भ के रूप में कार्य करते रहेंगे। सम्भवत: यही कारण है कि प्रबन्ध सिद्धान्तों का प्रयोग करते समय, भिन्न एवं परिवर्तनशीलता परिस्थितियों, प्रबन्धक अलग अलग विचार पर ध्यान देते हैं, परिवर्तनशील बाह्य तथा आन्तरिक कारकों का विशेष ध्यान रखते हैं । वास्तव में प्रत्येक प्रबन्धक इन सिद्धान्तों को अपने उद्देश्य तथा अपने चिन्तन के अनुसार अलग अलग ढंग से व्याख्यित एवं प्रयोग करता है। इस प्रकार ये लोचपूर्ण होते हैं तथा आवश्यकता की पूर्ति हेतु इनको अलग अलग परिस्थितियों के अनुसार उपयोग किया जा सकता है। वस्तुत: उपरोक्त विश्लेषणानुसार इन सिद्धान्तों की अग्रलिखित विशेषताएं हो सकती हैं –
- प्रबन्ध के सिद्धान्त प्रबन्धकीय क्रियाओं के सुव्यवस्थित संचालन हेतु मार्गदर्शक नियम हैं जिनके आधार पर व्यापारिक स्थितियों व चुनौतियों को समझा जा सकता है जिससे संगठन की कार्यकुशलता में वृद्धि हो सकती है।
- पूर्व निर्धारित सिद्धान्त प्रबंधकों को प्रबंधकीय क्षेत्र में एक दृढ़ आधार प्रदान करते हैं।
- प्रबन्धकीय सिद्धान्त केवल प्रबन्धकीय कार्यक्षमता में वृद्धि नहीं करते वरन औद्योगिक उपक्रम को भी उन्नति की ओर अग्रसर करते हैं।
- प्रबन्ध के सिद्धान्तों के बिना प्रबन्ध विज्ञान की प्रकृति को समझना कठिन कार्य है।
- प्रबन्धकों के अध्ययन और प्रशिक्षण के लिए भी ये बहुत उपयोगी होते हैं।
- मानवीय व्यवहार, आदतों व रूचियों के सम्बन्ध में शोध व अनुसंधान करने के लिए आवश्यक आधार प्रदान करते हैं।
- समाज का मुख्य उद्देश्य अधिकतम उच्च गुणवत्ता युक्त सस्ते उत्पाद प्राप्त करना होता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के सम्बन्ध में सिद्धान्तों के बिना उद्देश्य प्राप्त करना संभव प्रतीत नहीं होता।
- इनके विकास से प्रबन्ध के पेशेकरण की धारणा सिद्ध होती है। नवीन शोधों को बढ़ावा मिलता है तथा प्रबन्ध एवं उद्योग के क्षेत्र में और बेहतर समन्वय स्थापित होता है।
प्रबंधकीय सिद्धान्तों की उपरोक्त विशेषता के आधार पर सुव्यवस्थित, सुसंगठित तथा श्रेष्ठ सिद्धान्तों के कुछ लक्षणों की प्राप्ति होती है। जो कि इस प्रकार से हैं-
- वह सरल व सीधे होते हैं जिससे वह एक ही अर्थ में सभी की समझ में आ जाते हैं।
- ये सम होते हैं सिद्धान्त के पीछे जो भी विभिन्न तत्व व मान्यताएं हों वे उसके उद्देश्य को परिलक्षित करती हैं।
- ये प्रयोगाश्रित विधि से जांचे परखे जाते हैं तथा टिकाऊ आधार पर उसे अनुभवाश्रित शोध का बल मिलना चाहिए।
- यें एक उपकरण के रूप में होते हैं तथा जिस बात को ये सिद्ध करना चाहते हैं वह पर्याप्त तथा पूर्णत: समझ में आने योग्य होती हैं।
- ये प्रभावपूर्ण प्रबंध व्यवहार के लिए सहायक एवं व्यावहारिक पथ प्रदर्शक होते हैं।
- ये प्रबंध सिद्धान्त के लिए एक अंतरण तंत्र बनते हैं तथा प्रबंध शास्त्र में आगे के सिद्धान्तों की निर्माण प्रक्रिया में सहायक होते हैं।
प्रबन्ध सिद्धान्तोंं की सार्थकता
प्रबन्ध सिद्धान्तों की सार्थकता उनके उद्देश्य तथा उनके द्वारा प्रबंध के क्षेत्र में प्राप्त किए महत्व पर निर्भर करता है । प्रबन्ध सिद्धान्तों का प्रमुख उद्देश्य प्रबंध शास्त्र में यथाक्रम सिद्धान्तों का सृजन करना होता है जिससे वह प्रबंध व्यवहार, प्रशिक्षण और कार्यालय प्रबंध में उपयोगी बन सकें। इनकी आवश्यकता इस प्रमुख उद्देश्य के कारण ही उत्पन्न होती है। ये सिद्धान्त प्रबन्ध के लिए व्यवस्थित ज्ञान तथा कार्यात्मक अनुभव का मार्ग खोलते हैं। प्रभावी विधि से अच्छे परिणाम किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। यह सुझाव प्रबंध के सिद्धान्तों से मिलता है तथा ये प्रबन्धकला को सुधारने का प्रयत्न सदैव करते रहते हैं।
ये सिद्धान्त ही प्रबन्ध व्यवहार का सरलीकरण करते हैं। सिद्धान्त के मूल पहलुओं का स्पष्टीकरण करते हैं तथा प्रबन्ध के कार्य व्यवहार में प्रयोग करने के लिए नियमों का प्रतिपादन करने का सुझाव देते हैं तथा आवश्यक आचार विचार की अपेक्षा करने के लिए उचित मापदंडों का निर्माण करते हैं। प्रबंध के सिद्धान्त केवल मूल तथ्यों का स्पष्टीकरण नहीं करते या वे किसी एक परिस्थि के कारणों को ही प्रकार में नहीं लाते वरन किसी विशेष कार्य को करने पर उस व्यवहार अथवा घटना का क्या निष्कर्ष अथवा परिणाम निकलेगा इसका भी पूर्व अनुमान लगाने में सहायक होते हैं। अपनी व्याख्यात्मक तथा पूर्व अनुमान लगाने की विशेषता के कारण ही ये लोचपूर्ण सुझावात्मक तथा व्यवहारात्मक रूप में प्रबंधकों की विचारशक्ति, निर्णयन तथा कार्यान्वयन में सहयोगी होते हैं। सिद्धान्तों का ज्ञान, नियोजन समस्या समाधान तथा निर्णयन के लिए उद्देश्य साधक तथा सुलझी हुर्इ विधि को विकास करने के लिए प्रबन्धकों को प्रोत्साहित करते हैं। इस प्रकार ये प्रबन्धकों के सहायक होते हैं।
प्रबन्धकों को आंख बन्द कर के इस सिद्धान्त को नहीं अपनाना चाहिए बल्कि उन्हें अपनी चेतन शक्ति तथा अनुभव में वृद्धि के लिए इसका प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार, वे अपने विचारों तथा अनुभवों को और अधिक धनी बना सकते हैं तथा सिद्धान्त एवं व्यवहार के बीच की दूरी को और कम कर सकते है।
इस प्रकार पर्यवेक्षण व अन्य स्तरों पर प्रबन्धकों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में प्रबन्ध के सिद्धान्तों को पाठ्यक्रम से अलग नहीं किया जा सकता। प्रबन्धकों के कार्योें को प्रबन्ध प्रक्रिया तथा सिद्धान्तों का उदाहरण लेकर समझाया जाता है। प्रबंध के सिद्धान्तों का क्षेत्र शोधकार्य करने के लिए भी उपयुक्त माना जाता है चाहे यह शोध अध्ययन सिद्धान्तों का हो अथवा उनको व्यवहार में अपनाने का। उदाहरण के लिए कर्इ शोध अध्ययन कार्य उन दशाओं की पहचान पर किए जाते हैं जिनके अन्तर्गत प्रबंध के विशिष्ट सिद्धान्तो को व्यवहार में प्रभावी बनाया जा सकता है। इसी प्रकार, कर्इ परम्परावादी सिद्धान्तों को प्रयोगाश्रित बल देने वाले विषयों पर शोध कार्य चल रहा है।
हेनरी फेयोल का सिद्धान्त
विगत शताब्दी में प्रबन्ध गुरूओं ने अनेकानेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। विशेष रूप से परम्परागत विचारधारा से जुड़े विद्वानों का इनके निर्माण में विशेष योगदान रहा है। इनमें से श्री हेनरी फेयोल ने अपने विस्तृत अनुभवों से कार्यप्रणाली के आधार पर प्रबन्ध के अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है।
श्री फेयोल ने अपने कार्यकारी जीवन का प्रारम्भ एक फ्रांसीसी माइनिंग कम्बाइन में मुख्य अधिकारी के रूप में लम्बे समय तक किया तत्पश्चात वे फ्रांस के एक प्रसिद्ध उद्योगपति भी कहलाये। श्री फेयोल ने 14 सामान्य प्रशासनिक सिद्धान्तों की स्थापना की। उन्होंने इस सत्य को स्वीकार किया कि उनकी इस सफलता के पीछे अनेक व्यक्तिगत दृष्टिकोण ही नहीं थे बल्कि इस सफलता का कारण उन प्रबन्धकीय विचारधाराओं का भी है जिनको उन्होंने सीखा और सामान्य कार्य दिवसों में प्रयोग किया। आइये फेयोल के सिद्धान्तों को समझने का प्रयास करें –
कार्य विभाजन का सिद्धान्त –
अधिकार एवं दायित्व –
अनुशासन –
आदेश की एकता –
निर्देश की एकता का सिद्धान्त –
केन्द्रीय हित व्यक्तिगत हित के सवोपरि होना –
कर्मचारियों का पारिश्रमिक –
केन्द्री्रकरण का सिद्धान्त –
पदाधिकारी सम्पर्क श्रृंखला –
क्रम व्यवस्था –
समता –
कार्र्यकाल मेंं स्थायित्व का सिद्धान्त –
पहल का सिद्धान्त –
संघीय शक्ति का सिद्धान्त –
फ्रेडरिक डब्ल्यू. टेलर का सिद्धान्त
यद्यपि प्रबन्ध का सामान्य विकास अठारहवीं शताब्दी में यूरोप के देशों में होने वाली औद्योगिक क्रान्ति से लगाया जाता है परन्तु उन्नीसवीं शताब्दी तक प्रबन्ध के क्षेत्र में परम्परागत पद्धतियों का ही प्रयोग होता रहा। बीसवीें शताब्दी के प्रारम्भ में औद्योगिक प्रणाली के ढॉंचे में बढ़ती हुर्इ जटिलताओं एवं उत्पादन की कारखाना प्रणाली से उत्पन्न अनेक समस्याओं के समाधान के लिए वैज्ञानिक प्रबन्ध का विकास हुआ। सर्वप्रथम ब्रिटेन के विद्वान चाल्र्स बेवेज ने 1932 में अपनी पुस्तक Economy of Manufacturers में वैज्ञानिक प्रबन्ध शब्द का प्रयोग किया परन्तु वास्तव में वैज्ञानिक प्रबन्ध का मूल विकास अमेरिकन विद्वान एफ. डब्ल्यू. टेलर द्वारा 1911 में रचित पुस्तक Principle of Scientific Management में प्रस्तुत किया गया।
फ्रेडरिक विन्सलो टेलर संयुक्त राज्य अमेरिका के निवासी थे। व्यावसायिक प्रबन्ध के क्षेत्र में ये पहले व्यक्ति थे जिन्होंने प्रबन्ध के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सूत्रपात किया इसलिये इन्हें वैज्ञानिक प्रबन्ध के जनक के नाम से सम्बोधित किया जाता है। टेलर ने अपना कार्यकारी जीवन 19 वर्ष की आयु में अमेरिका के फिलाडेल्फिया में क्रेम्प शिपयार्ड में एक सामान्य मशीन प्रशिक्षाथ्र्ाी एवं टर्नर के रूप में आरम्भ किया। 3 वर्ष के उपरान्त इनकी नियुक्ति मिडवैल स्टील वक्र्स में मशीन श्रमिक के रूप में हुर्इ और 2 वर्ष के उपरान्त इनकी पदोन्नति टोलीनायक के रूप में हो गर्इ।
अपनी योग्यता, प्रतिभा और लगन के परिणामस्वरूप 4 वर्ष के उपरान्त अर्थात 28 वर्ष की आयु में ही इसी संस्था में मुख्य अभियन्ता बन गये। इसी बीच मध्यकालीन स्कूल में अध्ययन करके उन्होंने मास्टर आफ इंजीनियरिंग की उपाधि प्राप्त की और 1898 में इस संस्था को छोड़कर बेथलेहन स्टील कम्पनी में 1901 तक कार्यभार सम्भाला। इस कम्पनी को छोड़ने के पश्चात आपने अपना शेष जीवन कारखाना प्रबन्ध के परामर्शदाता ओर प्रबन्ध विज्ञान के मूलभूत विचारों की खोज करने और उनके प्रचार व प्रसार करने में लगाया । आइये टेलर द्वारा दिये गये वैज्ञानिक प्रबन्धन की अवधारणा को और गहरार्इ से समझने का प्रयास करें।
वैज्ञानिक प्रबंध का सिद्धान्त
वैज्ञानिक प्रबंध के अपने नियम तथा सिद्धान्त प्रतिपादित है जिसका संस्था में कुशलता प्राप्ति के लिए दृढ़ता से पालन किया जाना आवश्यक है जो कि है।
कार्य का वैैज्ञानिक विश्लेषण, अध्ययन तथा मूल्यांकन –
वैज्ञानिक प्रबन्ध ने प्रत्येक श्रमिक के लिये कार्य प्रतिमानों की स्थापना की है। ये कार्य प्रतिमान प्रबन्धकों द्वारा कर्मचारियों की औसत कार्य क्षमता को ध्यान में रखकर स्थापित किये जाते हैं। इनकी स्थापना करते समय कार्य विश्लेषण, कार्य अध्ययन तथा प्रयोगों को आधार बनाया जाता है।
टेलर ने कार्य- प्रतिमान स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक विधि के अनुकरण का सुझाव दिया है जिसके दो पहलू हैं – कार्य अध्ययन एवं कार्य सुधार।
(1) कार्य अध्ययन – इससे आशय है – प्रत्यके क्रिया को पूर्ण करने की याग्यता पर प्रभाव डालने वाले विभिन्न तत्वों एवं पक्षों का सुव्यवस्थित,निष्पक्ष तथा आलोचनात्मक अध्ययन करना, जिससे कार्य विधि में सुधार किया जा सके। कार्य अध्ययन के दो पक्ष होते हैं – कार्य विधि अध्ययन तथा कार्यमापन ।
(अ) कार्य विधि अध्ययन – इसलिए सबसे पहले उत्पादन की सम्पूर्ण प्रक्रिया का परीक्षण किया जाता है तथा इसके आधार पर एक प्रक्रिया चार्ट का निर्माण किया जाता है। तत्पश्चात प्रबन्धक सामग्री के आवागमन की दूरी को कम करने, साज सामान को उठाने रखने, एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने ले जाने, निरीक्षण करने तथा संग्रह करने की विधियों में सुधार करने के लिए विचार किया जाता है और इस प्रकार कार्य विधि को सरल, मितव्ययी तथा उपयोगी बनाया जाता है।
(ब) कार्य मापन – इसके अन्र्तगत अग्रलिखित तीन प्रकार के अध्ययन सम्मिलित किये जाते हैं –
(1) समय अध्ययन – यह एक एसे ा परीक्षण है जिसके अन्तर्गत किसी क्रिया को करने में लगने वाले समय को निर्धारित किया जाता है एवं उसका लेखा जोखा रखा जाता है। यह किसी कार्य को करने में उपयोग की जाने वाली विधियों और नीतियों का विश्लेषण करना, उस कार्य को करने का सर्वोत्तम विधि के व्यावहारिक तथ्यों का विकास करना तथा आवश्यक कार्यों की प्रभावोत्पादकता को मापने का प्रमाण प्रस्तुत करता है एवं उस आधार को बताता है जिस पर पारिश्रमिक निर्धारण की क्रिया निर्भर करनी चाहिए। ऐसा करते समय श्रमिक व नियोक्ता दोनों के हितों को ध्यान में रखना आवश्यक है। यह अध्ययन स्टॉप वाच की सहायता से किया जाता है।
(2) गति अध्ययन – गति अध्ययन एक एसे ी विधि है जिसके द्वारा किसी कार्य के सम्भव आधारभूत तत्वों का अलग अलग तथा एक दूसरे केसाथ मिलाकर अध्ययन किया जाता है एवं ऐसे तरीके विकसित किये जाते हैं जिनमें न्यूतम समय लगे तथा न्यूनतम क्षति हो। इसका प्रमुख उद्देश्य कार्यकरने की सर्वश्रेष्ठ विधि का पता लगाना है। गति अध्ययन के लिए निम्नलिखित विधियों को अपनाना चाहिए।
- कुछ श्रमिकों का चयन एवं उनकी कार्य में होने वाली हरकतों का विश्लेषण।
- कैमरे या स्टाप वाच की सहायता से प्रत्येक कार्य में लगने वाले न्यूनतम समय की गणना।
- सभी आवश्यक, त्रुटिपूर्ण, धीमी, और अक्षम्य गतियों को समाप्त करना।
- कार्य करने की सर्वोत्तम गतियों तथा न्यूनतम समय का लेखा रखना।
(4) थकान अध्ययन – प्राय: यह दख्े ाा गया है कि एक व्यक्ति की कार्यक्षमता पूरे दिन समान नहीं रहती हैं उसे काम करते करते जितना अधिक समय होता जाता है उसकी कार्य शक्ति उतनी ही क्षीण होती जाती है। इसका कारण यह है कि जैसे जैसे कार्य का समय बढ़ता जाता है उसकी थकान बढ़ती जाती है, उसका उत्साह क्षीण होता जाता है तथा उसकी शारीरिक तथा मानसिक शक्ति, घटती जाती है। इससे उत्पादन की मात्रा कम होती है कार्य की किस्म खराब होती है तथा दुर्घटनाओं की मात्रा में वृद्धि होती है।
‘थकान अध्ययन’ के अन्तर्गत यह पता लगाया जाता है कि थकान कब, कैसे और क्यों होती है? इसके आधार पर थकान कम करने वाली विधियों को खोजा जाता है।
प्रेरणात्मक मजदूरी पद्धति –
यह पद्धति श्रमिकों को अधिक कार्य करने के लिए प्रोत्वाहित करती है ताकि उत्पादन की मात्रा में वृद्धि की जा सके। इसके लिए टेलर ने विभेदात्मक मजदूरी पद्धति को अपनाने का सुझाव दिया है। इस पद्धति का उद्देश्य श्रमिकों से उनकी कार्यक्षमता के अनुकूल कार्य कराकर अधिक दर से पारिश्रमिक देना है। दर का निर्धारण वैज्ञानिक आधार पर किया जाता है।समय तथा गति अध्ययन करके प्रत्येक कार्य को करने का प्रमापित समय तथा प्रमापित विधि का पता लगाया जाता है। इसे अन्तर्गत कुशल श्रमिकों को ऊॅंची दर से मजदूरी मिलती है। जबकि अकुशल श्रमिक को नीची दर से मजदूरी मिलती है।
योजना बनाना –
योजना बनाने के लिए एक अलग विभाग (नियाजेन विभाग) की स्थापना की जाती है। औद्योगिक उपक्रमों में नियोजन से अभिप्राय यह निश्चित करना है कि –
- क्या कार्य किया जाना चाहिए?
- कार्य कैसे किया जाना चाहिए?
- कार्य किस प्रकार किया जाना है?
- कार्य किस समय किया जाना है? तथा,
- कार्य किस व्यक्ति के द्वारा किया जाना है?
योजना विभाग निम्नलिखित प्रमुख कार्य करता है –
- उत्पादन के लिए आवश्यक सामग्री का आदेश देना।
- उत्पादन के लिए आवश्यक मशीनों तथा सुविधाओं की व्य उत्पादन प्रंक्रिया को निर्धारित करना।
- प्रयोगों के आधार पर प्रत्येक क्रिया को करने में लगने वाले समय को निध्र्धारित करना।
- योजना के अनुसार उत्पादन कार्य चलाना तथा यह देखना कि समस्त सुविध् ाायें योजनानुसार उपलब्ध हो जायें।
- वास्तविक प्रगति के आंकड़े व रिपोर्ट तैयार करना तथा उन्हें सुरक्षित रखना।
श्रमिको का वैज्ञानिक चुनाव एवं प्रशिक्षण –
श्रमिकों के वैज्ञानिक चयन से अभिप्राय ऐसी विधि से है जिसके अन्तर्गत सम्बन्धित कार्य का विश्लेषण करके, निष्पक्ष आधार पर केवल उन योग्यताओं व गुणों को रखने वाले श्रमिकों का ही चयन किया जाता है जो उस कार्य को करने की योग्यता रखते हैं। श्रमिकों का चयन कार्य की अपेक्षाओं के अनुरूप होता है।
श्रमिकों के चयन के पश्चात उनकी कार्य के कुशल संचालन के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। प्रशिक्षण के द्वारा नये ज्ञान को प्राप्त किया जाता है। प्रगति के अवसर बढ़ते हैं संगठनात्मक स्थिति बढ़ती है कार्य करने के सर्वोत्तम तरीकों का प्रयोग किया जाता है तथा श्रमिकों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती हैं।
वैज्ञानिक प्रशिक्षण से ही जुड़ी हुर्इ एक अन्य समस्या इन श्रमिकों के लिऐ पदोन्नति की उपयुक्त व्यवस्था करना है। पदोन्नति का अर्थ है – उच्च पद पर स्थानान्तरण और यह तभी सफल हो सकता है जब वह व्यक्ति नये पद के उत्तर दायित्व के विषय में अच्छी तरह प्रशिक्षित हो और स्वयं उसका स्थान ग्रहण करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति से प्रशिक्षण प्राप्त कर सके।
प्रमापीकरण –
प्रमापीकरण एक ऐसी व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत एक निश्चित प्रकार, गुण भार आदि के उत्पादों का उत्पादन किया जाता है। इसमें तीन तत्वों का प्रमापीकरण महत्वपूर्ण है –
- वस्तुओंं का चयन एवं उपयोग – प्रमापित गुणों के उत्पाद के निर्माण के लिए केवल प्रमापित प्रकार के साधनों की ही व्यवस्था की जानी चाहिए। कच्चा माल अच्छी किस्म का तथा एक सा होना चाहिए क्योंकि यह श्रमिकों की कार्यकुशलता को प्रभावित करता है। इसके साथ साथ प्रयोग की विधि भी वैज्ञानिक होनी चाहिए।
- नवीनतम एवं उन्नत मशीनों, यंत्रों व उपकरणों का प्रयोग – वैज्ञानिक प्रबन्ध के अन्तर्गत यह आवश्यक है कि उपर्युक्त तथा नवीनतम मशीनों व यंत्रों का प्रयोग किया जाये। इससे श्रमिकों की कार्यकुशलता एवं उत्पादन में वृद्धि होती है। किस्म में सुधार होता है तथा लागत में कमी आती है। इसके अतिरिक्त एक ही कार्य को करने वाले अलग अलग श्रमिकों की कार्य कुशलता की एक दूसरे से तुलना करने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक श्रमिक के पास मशीन, यंत्र व अन्य उपकरण एक समान हो। एक ही प्रकार की मशीनें आदि लगाने से प्रशिक्षण की तथा मशीनों की देखभाल की लागत कम रहती है, उनसे प्राप्त उत्पादन की किस्म में एकरूपता आती है और उत्पादन की प्रक्रिया सरल हो जाती है।
- काम करने की दशायेंं – काम के निर्धारित मानकों को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि कारखाने में सभी स्थानों पर कार्य दशायें तथा वातावरण उपयुक्त, स्वास्थ्यप्रद तथा एक जैसा हो। उत्तम व स्वास्थ्यप्रद काम करने की दशाओं का अर्थ यह है कि कार्य स्थल पर प्रकाश, स्वच्छ वायु, उपयुक्त तापमान तथा स्फूर्तिदायक जलवायु की उचित व्यवस्था हों। मशीनों के साथ काम करने की स्थिति में कारीगरों की सुरक्षा तथा उसकी सुविधा दोनों का विचार रखा जाना चाहिए।
प्रशासकीय पुर्नगठन –
वैज्ञानिक प्रबन्ध के क्षत्रे में प्रशासकीय पुर्नगठन के लिए क्रियात्मक संगठन प्रणाली आधुनिक प्रबन्ध को टेलर की प्रमुख देन है। व्यावसायिक प्रबन्ध तथा प्रशासन के क्षेत्र में टेलर पहले व्यक्ति हुए जिन्होंने किसी कार्य के दो मूल अंगों नियोजन तथा निष्पादन’ को अलग-अलग रखने के लिए क्रियात्मक संगठन व्यवस्था को अपनाने पर बल दिया। विशिष्टीकरण पर आधारित इस संगठन में उत्पादन के कार्य को क्रियाओं के अनुसार बॉंट दिया जाता है तथा यथासम्भव एक व्यक्ति को ही एक प्रकार का कार्य सौंपा जाता है जिसका वह विशेषज्ञ होता है।
कुशल लागत लेखांकन पद्धति –
उत्पादन की लागत ज्ञात करने अपव्ययों को रोकने तथा लागत को कम करने के लिए एक कुशल लागत लेखांकन पद्धति को अपनाना आवश्यक है। लागत लेखकों को तैयार करने के लिए कुशल व्यक्तियों को नियुक्त किया जाना चाहिये।
पारस्परिक सहयोग –
टेलर ने श्रमिकों और प्रबन्धकों के पारस्परिक सम्बन्ध् ाों में मानसिक क्रान्ति की आवश्यकता पर जोर दिया है। टेलर का विचार है कि ‘‘वैज्ञानिक प्रबन्ध के अन्तर्गत दोनों पक्षों के मानसिक व्यवहार में जो महान क्रान्ति होती है वह यह है कि दोनों पक्ष ही अति उपार्जन के विभाजन को सार्वजनिक महत्व का विषय मानना छोड़ देते हैं और मिलकर अपना प्रयास इस अति उपार्जन को इतना अधिक बढ़ाने की तरफ लगा देते हैं जिससे कि यह अति उपार्जन स्वयं इतना बड़ा हो जाये कि यह विवाद हो कि इसको कैसे बॉंटा जाये, अनावश्यक बन जाये।’’ इसका कारण यह है कि वैज्ञानिक प्रबन्ध के परिणामस्वरूप संस्था की उत्पादकता कर्इ गुना अधिक बढ़ जायेगी और फलस्वरूप प्रबन्धकों के लाभ का अंश और श्रमिकों की मजदूरी का अंश दोनों ही बढ़ जायेंगे।
मानसिक क्रान्ति –
श्रम तथा प्रबन्ध के बीच मधुर सम्बन्धों की स्थापना के लिए टेलर ने मानसिक क्रान्ति पर जोर दिया है। प्राय: यह देखने में आता है प्रबन्ध वर्ग का यह विचार होता है कि श्रमिक कार्य से जी चुराते हैं और कम कार्य करके अधिक पारिश्रमिक प्राप्त करना चाहते हैं और दूसरी ओर श्रमिकों का यह विचार होता है कि प्रबन्ध अथवा नियोक्ता वर्ग सदैव उनका शोषण करता है, उनसे कार्य अधिक कराया जाता है और पारिश्रमिक कम दिया जाता है। प्रबन्ध अथवा नियोक्ता वर्ग और श्रमिक वर्ग के मस्तिष्क में बैठे हुए एक दूसरे के प्रति गलत एवं विरोधी विचारों में परिवर्तन करके, दोनों को एक दूसरे के निकट लाना और उद्देश्यों तथा हित की एकता पर बल देना ही मानसिक क्रान्ति कहलाती है।
मैरी पार्कर फोलेट का योगदान
मैरी पार्कर फोलेट यू.एस.ए. की एक प्रसिद्ध सामाजिक, राजनैतिक दार्शनिक थी। उन्होंने समन्वय पर अपना ध्यान केन्द्रित किया और इस प्रक्रिया से संबंधित कुछ सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया, जो इस प्रकार है –
प्रत्यक्ष संपर्क का सिद्धान्त –
प्रारम्भिक चरणोंं मेंं ही समन्वय करने का सिद्धान्त –
सभी कारकों के पारस्परिक संबंधोंं वाला सिद्धान्त –
समन्वयन की सतत् प्रक्रिया का सिद्धान्त –
परिस्थिति के अनुुसार अधिकार का सिद्धान्त –
अन्य महत्वपूर्ण सिद्धान्त
उद्देश्योंं की एकता का सिद्धान्त –
पर्यवेक्षण के विस्तार का सिद्धान्त –
संतुलन का सिद्धान्त –
समन्वय की सुविधा का सिद्धान्त –
प्रबन्ध विकास का सिद्धान्त –
निरन्तरता का सिद्धान्त –
कुशलता का सिद्धान्त –
सहभागिता का सिद्धान्त –
अपवाद का सिद्धान्त –
समर्थनात्मक सम्बन्ध का सिद्धान्त –
सार्वभौमिकता पर विचार
परम्परावादी लेखकों की निरंतर चली आने वाली विषम वस्तुओं में एक विषय वस्तु यह भी है कि क्या उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त सार्वभौमिक है। सार्वभौमिकता के सिद्धान्त का तात्पर्य यह है कि प्रबन्ध सिद्धान्त विश्व के सभी स्थानों के सभी उपक्रमों में लाभपूर्ण रूप से अपनाए जा सकते हैं चाहे उपक्रमों की भिन्नता तथा कार्य करने का वातावरण कितना ही भिन्न क्यों न हो। प्रबन्ध सिद्धान्त की सार्वभौमिकता पर विचार करते समय हम प्रबन्ध सिद्धान्तों के पक्ष में निम्नलिखित तर्कों को प्रस्तुत कर सकते हैं।
परम्परावादी प्रबन्ध सिद्धान्तों को ‘‘मूलभूत सत्य’’ का नाम दिया गया है।
विज्ञान के क्षेत्र में जिस प्रकार समय तथा अवधि से न प्रभावित होने वाले ‘‘मूलभूत सत्य’’ हैं जिनकी सार्वभौमिकता चुनौती से परे है। द्वितीय, सम्पूर्ण विश्व में सभी उपक्रमों का उद्देश्य एक सा ही है उदाहरण के लिए समाज द्वारा मांगे जाने वाले उत्पादो/सेवाओं की पूर्ति करना। इन उद्देश्यों की भली प्रकार से प्राप्ति के लिए प्रबंध सिद्धान्त उपक्रमों की योग्यता में वृद्धि करते हैं, अत: वे सभी उपक्रमों पर एक ही अर्थ में लागू होते हैं तीसरे, किसी भी प्रकार के उपक्रम में प्रबंध सिद्धान्तों को लागू किया जा सकता है क्योंकि वे लोचपूर्ण होते हैं। फिर, प्रबंध सिद्धान्तों की सर्वोत्कृष्ट विवेकता तथा व्यावहारिक उपयोगिता के कारण विश्व भर के उपक्रम अपने ढॉंचे तथा प्रक्रिया के निर्धारण में इन सिद्धान्तों का प्रयोग करते हैं
इस तर्क के आधार पर इन सिद्धान्तों के अपनाए जाने के कारण उनके विवेक तथा व्यावहारिक मूल्य हैं उपक्रमों की विविधता तथा जटिलता नही। चौथे, प्रबन्धक जो इन सिद्धान्तों तथा प्रबंध के सैद्धान्तिक प्रयोग में पूर्णत: प्रशिक्षित हैं तथा अन्यथा भी विविध प्रकार से अनुभवी एवं कुशाग्र हैं । इन सार्वभौमिक प्रबंध के सिद्धान्तों का प्रयोग किसी भी प्रकार के उपक्रम में तथा किसी भी परिस्थिति में कर सकते हैं। अंतिम यह भी संभव है कि कुछ प्रबंध सिद्धान्त परिस्थितियों में कुछ उपक्रमों में लागू न हो पाएं। वे तब अफवाह ही कहलाएंगे तथा वे प्रबंध सिद्धान्तों की सार्वभौमिकता को अमान्य नहीं कर सकते। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक नियम की ही भांति प्रत्येक सिद्धान्त के अपने ही अपवाद होते हैं।
सार्वभौमिकता के सिद्धान्त के समर्थन में यह कहा जा सकता है कि उपक्रमों की एक बड़ी संख्या सम्पूर्ण विश्व में, अमीर तथा गरीब पश्चिम से पूरब तक, पूंजीगत और सामाजिक सभी देशों में परम्परावादी सिद्धान्तों के आधार पर डाले गये हैं। यह भी कहा जा सकता है कि नवीनतम तथा सर्वाधिक आधुनिक उपक्रम मील अपना ढॉंचा तंत्र तथा प्रक्रियाओं को निर्धारित करने के लिए परम्परागत प्रबंध सिद्धान्तों की ओर निहारते रहते है। उस संदर्भ में कहा जा सकता है कि अनुक्रम अधिकार (आदेश की श्रृंखला) केन्द्रीयकरण तथा विकेन्द्रीयकरण, अधिकारों का हस्तांतरण नियंत्रण की सीमा, कार्यात्मक अंतर आदि के आधार पर ही दन उपक्रमों की रूपरेखा बनार्इ जाती है।
किन्तु इस सिद्धान्त को समस्त विश्व से समर्थन नहीं मिल पाया है। इस सिद्धान्त के आलोचक अपने तर्क की पुष्टि के लिए फैयाल का भी उदाहरण देते हैं जबकि फैयोल प्रबंध प्रक्रिया सिद्धान्तों तथा उनकी सार्वभौमिकता के प्रबल समर्थक थे। फैयोल ने कहा था, ‘‘मै सिद्धान्त शब्द का प्रयोग करूॅंगा, किन्तु इसकी अनम्यता अथवा कठोरता से पृथक रहना चाहूॅंगा क्योंकि प्रबन्ध में निरपेक्षता अथवा अनम्यता (कठोरता) का कोर्इ स्थान नहीं है, यह सब तो केवल अंश का प्रश्न है। विभिन्न तथा बदलती हुर्इ परिस्थितियों के लिए स्थान रखना ही चाहिए। परिस्थितियों के विभिन्न समूह में प्रबंध के सिद्धान्तों की एक सीमित सार्थकता रहती है। परिस्थितियों के विभिन्न समूह में वह अपनी सार्थकता खो बैठते हैं अथवा कम कर लेते हैं। यह भी तर्क दिया जाता है कि उपक्रम तथा प्रबंध की परिस्थितियॉं इतनी परिवर्तनशील एवं जटिल है कि वे पूर्व सिद्धान्तों द्वारा नियंत्रित नहीं की जा सकती है।
सिद्धान्तों की सीमाएँ
बड़ी संख्या में प्रबंधकों का मत है कि प्रबंध के सिद्धान्त कर्इ सीमाओं से ग्रसित हैं। एक उम्र वर्ग तो प्रबंध के सिद्धान्तों के बिल्कुल ही विपरीत है तथा ‘‘सिद्धान्तों द्वारा प्रबंध की विचारधारा’’ को अनुपयोगी, भ्रमात्मक और हानिकारक बनाता है। आइये प्रबंध सिद्धान्तों की सीमाओं को समझने का प्रयास करें –
(1) अधिकतर सिद्धान्त इस शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में प्रतिपादित किए गये थे जब उपक्रम अपेक्षाकृत सरल थे तथा अपेक्षाकृत स्थायी परिस्थितियों में कार्य करते थे। अत: इन सिद्धान्तों में अपने समय की सरलता तथा स्थायित्व दिखार्इ देती है। तब से इन दश कों तथा वर्षों में तकनीकी तथा आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य परिस्थितियों में तीव्रता के साथ होने वाले परिवर्तनों के कारण उपक्रम तथा वातावरण दोनों ही अत्यधिक जटिल एवं प्रतियोगात्मक बन चुके हैं। वर्तमान समय के बदलते हुए वातावरण में कार्यरत आधुनिक जटिल उपक्रमों पर लागू इन प्रबंध के सिद्धान्तों की सार्थकता तथा उपयोगिता पर गंभीर शंकाएं उठार्इ जा रही हैं।आधुनिक प्रबंध सिद्धान्त समर्थकों में से कुछ इन सिद्धान्तों में सुधार करने के पक्ष में हैं जिससे ये वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप ढाले जा सकें जबकि अन्य अधिक उपयुक्त सिद्धान्तों द्वारा इनके मूलत: प्रतिस्थापन के पक्ष में हैं।
(2) परम्परावादी प्रबंध के सिद्धान्तों का परीक्षण करने से मन में यह विचार उठता है कि उपक्रम बंद तंत्र व्यवस्था में कार्य कर रहे हैं, बाह्य वातावरण तथा घटनाओं और उनसे होन वाले परिवर्तन से उनका कोर्इ संबंध नहीं हैं । संभवत: परंमपरावादी लेखकों में प्रबंध के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने का कार्य सरलीकरण करने के लिए इन मान्यताओं को अपनाया। वास्तविकता यह है कि उपक्रम अपेक्षाकृत खुला तंत्र है। वे अपने वातावरण में कार्य करते हैं तथा पर्याप्त रूप से इससे प्रभावित होते हैं। यह बात जो परम्परावादी प्रबुद्ध युग में थी वह अब भी पार्इ जाती है। खुले तंत्र वाली प्रकृति के उपक्रमों को परम्परावादी प्रबंध सिद्धान्तों में जिस सीमा तक अनदेखा किया है, उसके लिए उनको अवास्तविक कहना सही होगा।
(3) प्रबंध के सिद्धान्तों का आधार बहुत कम वैज्ञानिक है तथा उन्हें बहुत कम अनुभव सिद्ध सहायता प्राप्त हैं।