अनुक्रम
युद्ध में हुई अपार जन-धन की हानि को देखते हुये भविष्य में विश्व शांति के उद्देश्य को लेकर 1919 ई. में पेरिस शांति सम्मेलन आयोजित किया गया। फ्रांस के क्लीमेंशु, इंग्लैण्ड के लायड जार्ज एवं अमेरिका के वुडरो विल्सन इस सम्मेलन के प्रमुख कर्ता-धर्ता थे। मगर इनके बीच मतभेद के कारण विश्व शांति की स्थापना बाधित हुई। इंग्लैण्ड एवं फ्रांस ने जर्मनी पर बर्साय जैसी कठोर संधि आरोपित की। इस संधि की धाराएँ इतनी कठोर थीं कि मार्शल फाॅच ने कहा था कि यह शांति संधि नहीं है यह तो 20 वर्ष के लिये युद्ध विराम मात्र है। मार्शल फाॅच की भविष्यवाणी अक्षरशः सत्य साबित हुई। 28 जुलाई, 1919 ई. की इस संधि के पूरे 20 वर्ष बाद 1 सितम्बर, 1939 ई. को पुनः द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया। इस द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज पेरिस शांति सम्मेलन में जर्मनी पर आरोपित बर्साय की संधि की धाराओं में स्पष्टतः मौजूद थे।
पेरिस शांति सम्मेलन के उद्देश्य
पेरिस शांति सम्मेलन के इन प्रतिनिधियों के समक्ष उद्देश्य थे –
- आत्म निर्णय के सिद्धांत को कार्य रूप प्रदान करना।
- एक न्याय संगत एवं चिरस्थायी शांति संधि का मसौदा तैयार करना एवं उस पर हस्ताक्षर कराना।
- प्रजातंत्र की सुरक्षा को कायम रखना।
- राष्ट्र संघ के संविधान का निर्माण करना।
- विश्वयुद्ध की महाविभीषिका से आहत भूखी जनता को अनाज मुहैया कराना।
- प्रतिशोध की भावना से उत्तेजित मित्र राष्ट्रों की सेनाओं पर नियंत्रण कायम करना।
- अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के 14 सूत्रों के अनुसार कार्य सम्पन्न करना।
- विजेता एवं पराजित राष्ट्रों को संतुष्ट करना।
पेरिस शांति सम्मेलन के प्रमुख प्रतिनिधि
- वह जर्मनी के नौसैनिक एवं थल सैनिक शक्ति को इतना कम कर देना चाहता था कि भविष्य में इंग्लैण्ड के लिये चुनौती न बन सके।
- वह जर्मनी को तो कमजोर करना चाहता था, मगर फ्रांस को भी अधिक शक्तिशाली नहीं बनने देना चाहता था।
- युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में लायड जार्ज अधिक से अधिक धन इंग्लैण्ड के लिये प्राप्त करना चाहता था।
3. अमेरिका का राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन – अमेरिका के राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन का प्रमुख उद्देश्य यूरोप में आदर्शमय शांति स्थापित करना चाहता था। युद्ध के दौरान विल्सन ने 8 जनवरी, 1918 को 14 सूत्रीय योजना की घोषणा की थी। जर्मनी ने इन 14 सूत्रों के पालन के आश्वासन पर ही युद्ध विराम लिया था। वुड्रो विल्सन इसीलिये चाहता था कि शांति संधियों में इन 14 सूत्रों का पालन हो। विल्सन युद्ध पश्चात भविष्य में शांति की स्थापना के लिये राष्ट्रसंघ की स्थापना भी कराना चाहता था।
पेरिस शांति सम्मेलन में संपन्न संधियां
पेरिस शांति सम्मेलन में काफी मशक्कत के पश्चात पाँच पराजित राष्ट्रों के साथ पाँच पृथक-पृथक सन्धियाँ सम्पन्न की गई –
- 28 जून, 1919 ई. जर्मनी के साथ वर्साय की सन्धि
- 10 सितम्बर, 1919 ई. आस्ट्रीया के साथ सेंट जर्मन की संधि
- 27 नवम्बर, 1919 ई. वल्गारिया के साथ न्यूली की संधि
- 4 जून, 1920 ई. हंगरी के साथ ट्रियानो की संधि
- 10 अगस्त, 1920 ई. टर्की के साथ सेवे्र की संधि 23 जुलाई, 1923 ई. टर्की के साथ लूसान की संधि (एक बार पुन:)
अब हम उक्त सभी संधियों की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत करेंगे।
- 4 माह तक गहन विचार विमर्श के उपरान्त 6 मई, 1919 ई. को इसका अंतिम प्रारूप तैयार किया गया।
- इस संधि मसौदा में कुल 230 पृष्ठ थे। यह 15 भागों में विभक्त थी। इसमें 439 अनुच्छेद (धाराएँ) थे एवं कुल 80,000 शब्द थे।
- 20 अप्रैल, 1919 ई. को विदेश मंत्री ब्रोकडर्फि रान्टाजू के नेतृत्व में एक जर्मन प्रतिनिधिमण्डल वर्साय पहुँच गया था। इन्हें ट्रायनन पैलेस होटल में ठहराया गया था।
- 7 मई, 1919 ई. को संधि का मसौदा जर्मन प्रतिनिधियों को सौंप दिया एवं इस पर विचार विमर्श हेतु 2 सप्ताह का समय उन्हें दिया।
- सम्पूर्ण जर्मनी में संधि की शर्तों का घोर विरोध हुआ।
- ब्रोकडर्फि ने कहा युद्ध की सारी जिम्मेवारी जर्मनी पर लादना न्यायसंगत नहीं है।
- जब इन्होंने संधि पर हस्ताक्षर करने में ना-नुकर की तो सिंह गर्जना करते हुये लायड जार्ज ने कहा – ‘जर्मन लोग कहते हैं कि वे संधि पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। जर्मनी के समाचार पत्र एवं राजनीतिज्ञ भी यही बात कहते हैं।
- जर्मन राजनीतिज्ञों ने 26 दिन बाद 60 हजार शब्दों का एक विरोध पत्र सौंपा।
- मित्र राज्यों ने जर्मन प्रस्तावों पर विचार-विमर्श कर संधि प्रस्ताव पर छोटे-मोटे संशोधन किये।
- संशोधित संधि प्रस्ताव युद्ध की चुनौती के साथ 5 दिन में हस्ताक्षर करने हेतु जर्मनी को सौंपा।
- शिंडेमान सरकार ने संधि को अस्वीकार कर त्यागपत्र दे दिया।
- जर्मनी में नयी सरकार बनी गुस्टावजौर प्रधानमंत्री एवं मूलर विदेश मंत्री बना।
- सराजवो हत्याकांड के दिन 28 जून, 1919 (5 वर्ष बाद) जर्मन प्रतिनिधियों ने संधि मसौदा पर हस्ताक्षर कर दिये।
(1) वर्साय की संधि की प्रमुख धाराएँ – बर्साय की संधि की प्रमुख धाराएँ निम्न थीं –
- अल्सास लारेन फ्रांस को दे दिये गये।
- जर्मन सीमा पर स्थित मेलमिडे और यूपेन बेल्जियम को दिये।
- खनिज सम्पदा से भरपूर सार घाटी दोहन हेतु 15 वर्ष के लिये फ्रांस को दी गयी नियंत्रण राष्ट्रसंघ का रहेगा एवं एक आयोग शासन चलायेगा। 15 वर्ष बाद जनमत संग्रह द्वारा सार बासी निर्णय करेंगे कि जर्मनी, फ्रांस, राष्ट्र संघ किसके साथ रहें।
- जर्मनी अधिकृत श्लेसविग में जनमत संग्रह किया गया उसके आधार पर उत्तरी श्लेसविग डेनमार्क को, दक्षिणी श्लेषविग जर्मनी को दिया गया।
- जर्मनी को पूर्वी सीमा पर सर्वाधिक नुकसान हुआ। जर्मनी, आस्ट्रीया, रूस के पोल क्षेत्रों को लेकर स्वतन्त्र पोलैण्ड का निर्माण, समुद्र तट स्थापित करने के लिये जर्मनी का डेनजिंग बंदरगाह पोलैण्ड को दिया।
- जर्मनी का वाल्टिक सागर तट पर स्थित मेमल बन्दरगाह राष्ट्रसंघ को दिया ताकि वह लिथुआनिया को स्थानान्तरित किया जाय।
- नवनिर्मित राष्ट्र वेल्जियम, पोलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया की स्वतंत्रता और प्रभुसत्ता को जर्मनी ने मान्यता दी।
- चेकोस्लोवाकिया को उपरी साइलेशिया का छोटा क्षेत्र दिया।
- जर्मन उपनिवेश ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, आस्ट्रीया, न्यूजीलैण्ड, बेल्जियम ने बाटे।
- ब्रेस्ट लिटोवस्क सन्धि द्वारा जर्मनी ने एक बड़ा भाग रूस से छीन कर अपने राज्य में मिला लिया था। उसे बर्साय सन्धि द्वारा इस भाग पर लैटविया, एस्टोनिया, लिथुआनिया की स्थापना की गई।
(ii) सैनिक व्यवस्थायें :-
- अनिवार्य सैनिक सेवा समाप्त की गयी।
- स्थल सेना 1 लाख निर्धारित, अधिकारियों को कम से कम 25 वर्ष तथा सैनिकों को 12 वर्ष सेना में रहना पड़ेगा।
- गोला बारूद, अस्त्र-शस्त्र सीमित किये एवं निर्यात प्रतिबन्धित किया।
- जर्मनी अब वायुसेना नहीं रखेगा।
- नौसेना सीमित – 6 युद्धपोत, 6 लड़ाकू विमान, 12 तोपची जहाज, पनडुब्बी नहीं एवं 15,000 सैनिक अधिकारियों सहित।
(iii) अन्य व्यवस्थायें :-
- नदियाँ – एल्व, ओडर, नीमन, डेन्यूब अन्तर्राष्ट्रीय घोषित।
- कील नहर और इसके मार्गों को सब राष्ट्रों के लिये खोला गया।
- विलियम प् पर घोर अपराध का अभियोग। नीदरलैण्ड ने उसे सौंपने से इन्कार किया अत: मुकदमा न चल सका।
- जर्मनी को प्रथम विश्वयुद्ध का उत्तरदायित्व स्वीकार करना पड़ा।
- क्षतिपूर्ति आयोग का गठन।
- युद्ध में नष्ट हुये प्रदेशों के पुनर्निर्माण के लिये जर्मनी फ्रांस, इटली, बेल्जियम, लक्झमवर्ग को कोयला देगा, फ्रांस को – अमोनियम सल्फेट, कोलतार आदि देगा।
- क्षतिपूर्ति राशि का अन्तिम निर्णय होने तक जर्मनी 1921 तक 5 अरब डालर देगा।
- सन्धि शर्तों को पूरा करने के लिये कुछ गारन्टियों की भी व्यवस्था की गई। राइन के पश्चिम क्षेत्र पर सन्धि लागू होने के बाद आगामी 15 वर्षों तक मित्र राष्ट्रों की सेनाओं का अधिकार रहेगा। यदि जर्मनी शर्तों का निष्ठापूर्वक पालन करता है तो 5 वर्ष बाद कोलोन क्षेत्र, 10 वर्षों बाद कोबलेंज क्षेत्र, 15 वर्ष बाद मेंज तथा अन्य अधिकृत जर्मन क्षेत्रों से सेनायें हटा ली जायेंगी।
(2) वर्साय की संधि का आलोचनात्मक मूल्यांकंन – वर्साय की संधि की प्राय: अधिकांश विद्वानों ने आलोचना की है। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जिन्हें कि इतिहास में विशेष रूचि थी ने वर्साय की संधि पर इन शब्दों में आलोचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है। “मित्र राष्ट्र घृणा और प्रतिशोध की भावना से भरे हुए थे वे माँस का पिण्ड ही नहीं चाहते थे बल्कि जर्मनी के अर्द्धमृत शरीर से रक्त की आखिरी बूँद तक खींच लेना चाहते थे।” वर्साय की संधि का आलोचनात्मक अध्ययन निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर किया जा सकता है।
- प्रतिशोधात्मक संधि – वर्साय की संधि एक प्रतिशोधात्मक संधि थी मित्र राष्ट्र विशेषकर फ्रांस में जर्मनी के प्रति प्रतिशोध की भावना व्याप्त थी। फ्रांस के राजनीतिज्ञ एवं जनता जर्मनी से 10 मई, 1871 की फैकफर्ट की अपमानजनक संधि का प्रतिशोध लेना चाहते थे। अत: यह प्रतिशोधात्मक संधि थी।
- अपमानजनक संधि – अमेरिकी विदेशमंत्री लैन्सिग ने कहा था कि “सन्धि की शर्तें काफी कठोर एवं अपमानजनक थी उनमें अधिकांश ऐसी थी जिन्हें क्रियान्वित किया जाना मेरी दृष्टि से असम्भव था।” इतिहासकार हैजैजैजन ने लिखा है – “जर्मन जैसा स्वाभिमानी राष्ट्र इन अपमानजनक शर्तों को स्वीकार नहीं कर सकता अत: यह स्वाभाविक ही था कि भविष्य में पुन: युद्ध द्वारा वह अपने अपमान को धोने और क्षतिपूर्ति की पूर्ति का प्रयत्न करे। अत: स्पष्ट है कि यह संधि अपमानजनक थी।”
- आरोपित संधि – ई.एच. कार महोदय ने इसे आरोपित संधि करार देते हुए कहा कि “वर्साय की संधि में आरोप का भाव सभी शांति संधियों की अपेक्षा अधिक था” इस संधि पर जर्मन के प्रतिनिधियों से धमकी देकर हस्ताक्षर करवाकर उन पर यह संधि जबरदस्ती थोपी गई। इससे पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है कि यह एक आरोपित संधि थी।
- शिष्टाचार का उल्लंघन – संधि मसौदे पर हस्ताक्षर हेतु जर्मन प्रतिनिधियों को बुलाया गया उनके साथ उस समय शिष्टाचार का व्यवहार नहीं किया गया। उन्हें कटीले तारों से घिरे एक बंगले में रूकाया गया तथा उनके साथ अपराधी की तरह बाहर तथा भीतर दोनों जगह व्यवहार किया गया। इस प्रकार इस संधि में शिष्टाचार का उल्लंघन किया गया।
- संधि का आधार विश्वासघात – जर्मनी ने विल्सन के 14 सूत्रों का पालन करते हुए युद्ध में आत्मसमर्पण किया था। परन्तु जब संधि की गई तो विल्सन के 14 सूत्रों को कोई अहमियत नहीं दी गई। इंग्लैण्ड का प्रमुख उद्देश्य था कि युद्ध की लूट को आपस में बाँटा जाए। जर्मनी के साथ विश्वासघात किया गया। जर्मनी के साथ राष्ट्रीयता के सिद्धांत का पालन नहीं किया गया था।
- एकपक्षीय संधि – संधि की शर्तें पूर्णत: एकपक्षीय थी। संधि मसौदा तैयार करते समय जर्मनी के साथ विचार-विमर्श की तो दूर की बात इसे सम्मेलन में आमंत्रित भी नहीं किया। एडम्स गिवन्स ने सही लिखा है – “पराजित राष्ट्रों की अनुपस्थिति में यह संधि एकतरफा थी इसकी शर्तों को कार्यान्वित करना केवल उसी समय तक संभव था जब तक कि वह शक्ति उसे कार्यान्वित कर सके।”
- द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज – वर्साय की संधि कोई शांति संधि नहीं थी, द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज इसमें स्पष्टत: मौजूद दिखाई दे रहे थे। चैम्बर्स एण्ड हैरिस ने लिखा है – “शांति सम्मेलन में एक विष वृक्ष के बीज का आरोपण किया जो 1939 ई. में एक विशाल संहारक वृक्ष के रूप में परिवर्तित हो गया और उसके कटु फलों को संपूर्ण संसार को बुरी तरह चखना पड़ा।”
अत: यह सच है कि वर्साय की संधि प्रत्येक दृष्टि से अनुचित थी। यह संधि जर्मनी पर जबरदस्ती थोपी गई थी, जर्मनी को पंगू बनाने का प्रयास किया गया था।
- इटली को आस्ट्रिया से दक्षिण टायरल, ट्रैंटिनो, ट्रीस्ट, इरिट्रिया, एवं डालमेशिया के तटवर्ती कुछ द्वीप प्राप्त हुए।
- चेकोस्लोवाकिया को वोहीमिया, मोराविया, आस्ट्रियन, साइलेशिया का अधिकांश भाग और आस्ट्रिया के दक्षिणी क्षेत्र का कुछ भाग प्राप्त हुआ।
- पोलैण्ड को मलेशिया का क्षेत्र प्राप्त हुआ।
- रूमानिया को वोकोविनया का प्रदेश प्राप्त हुआ।
- यूगोस्लाविया को डालमेशिया, वोस्मिया-हर्जगोबीना आदि क्षेत्र प्राप्त हुए।
इस प्रकार अब आस्ट्रिया का क्षेत्रफल सिमटकर छोटा सा बचा और आबादी मात्र सत्तर लाख रह गई। इस संधि के अनुसार आस्ट्रिया को बाध्य किया गया कि वह युद्ध की जिम्मेवारी स्वीकार करे और इसके लिए जर्मनी की तरह एक बहुत बड़ी रकम मित्र राष्ट्रों को हर्जाने के रूप में दे। आस्ट्रिया को युद्ध के अपराधियों को सौंपने के लिए कहा गया। अंतत: सेंट-जर्मन की सन्धि की धारा 88 द्वारा आस्ट्रिया पर यह प्रतिबंध लगा दिया गया कि वह भविष्य में ऐसा कोई प्रयत्न न करे जिसमें स्वतन्त्र राज्य के रूप में उसका नामोनिशान मिट जाय।
- पश्चिमी थ्रेस (Thrace) का भाग यूनान को देना पड़ा। इससे उसकी बड़ी हानि हुई। क्योंकि थ्रेस के निकल जाने से एजियन सागर से उसका संबंध टूट गया।
- वल्गेरिया की सेना की संख्या घटाकर 20,000 कर दी गयी और उसकी नौ-सेना को भंग कर दिया गया।
- हर्जाने के रूप में एक भारी बड़ी रकम भी लाद दी गयी।
4. हंगरी के साथ त्रियानों की संधि, 4 जून, 1920 – युद्ध समाप्ति के पश्चात हंगरी की आंतरिक स्थिति इतनी अव्यवस्थित हो गई कि वहाँ कोई सरकार ही नहीं बन सकी। नवम्बर, 1920 में वहाँ एक नयी सरकार गठित की गई जिसे मित्र राज्यों ने मान्यता दे दी। 4 जून, 1920 को हंगरी के प्रतिनिधि मण्डल ने त्रियानो के राजमहल में संधि पर हस्ताक्षर कर दिये। इस संधि के अनुसार –
- हंगरी राज्य का बहुत सा भाग यूगोस्लाविया, चेकोस्लोवाकिया और रूमानिया को दिया गया।
- यूगोस्लोवाकिया को हंगरी, कोटिया, स्लावोनिया, और वनाट का कुछ भाग दे दिया गया।
- चेकोस्लोवाकिया को कार्पोशियन पर्वत के दक्षिण और पूर्व की ओर स्थित कुछ भाग प्राप्त हुआ।
- रूमानिया को ट्रांसिलवानिया का प्रदेश और उसके पश्चिम में स्थित कुछ मैदानी भाग एवं वनाट का दो तिहाई भाग प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त आस्ट्रिया को और भी राज्य प्राप्त हुआ। विजित राज्यों में आस्ट्रिया को अत्यधिक राज्य प्राप्त हुआ।
इस प्रकार ट्रियानों की संधि के अनुसार हंगरी का क्षेत्रफल एवं जनसंख्या बहुत कम रह गई। क्षेत्रफल 1,25,000 वर्ग मील की जगह 35,000 वर्ग मील तथा जनसंख्या 2 करोड़ की जगह 80 लाख रह गई। नौसेना भंग कर दी गई तथा सेना घटाकर 35,000 कर दी गई।
- तुर्की को मिश्र, सूडान, साइप्रस त्रिपोलीटानिया, मोरक्को, और ट्यूनिस, अरब पेलेस्टाइन, मेसोपोटामिया तथा सीरिया पर अपने समस्त अधिकार छोड़ने पड़े।
- यूनान (ग्रीस) को पूर्वी थ्रेस का कुछ भाग और एजियन सागर में स्थित कुछ द्वीप प्राप्त हुए।
- डार्डेनलीज के जलमडरूमध्य को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र घोषित किया गया, परन्तु कान्सटेन्टीनोपल और उसके आसपास का भाग तुर्की के सुल्तान के अधीन बना रहा।
- तुर्की के आर्मीनिया को स्वतन्त्र राज्य मान लिया और बुदिस्तान को आन्तरिक स्वराज्य देने का वचन दिया।
- अरब में हिजाव के राज्यों को भी मान लिया गया। लेबनान, सीरिया, मेसोपोटामिया और पेलेस्टाईन का अधिदेशाधीन क्षेत्र बनाया गया। एशिया माइनर में केवल एनालेलिया का क्षेत्र तुर्की के अधीन बना रहा।
इस संधि के तहत एक बड़ा भू-भाग तुर्की के हाथ से निकल गया। यह संधि कार्यान्वित न हो सकी। मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में तुर्की में इस संधि के विरूद्ध एक जबरदस्त आन्दोलन खड़ा हुआ। मुस्तफा कमाल पाशा ने खलीफा की शक्ति का अन्त कर दिया।
पेरिस शांति सम्मेलन की कठिनाइयाँ
सम्मेलन के सम्मुख विविध प्रकार की जटिल समस्याएँ थीं। उदार सिद्धांतों को सामने रखकर मित्रराष्ट्र लड़ाई लड़े थे। युद्ध के समय समानता, स्वतंत्रता, लोकतंत्रवाद इत्यादि के नारे बुलन्द किये गये थे। पर युद्ध के बाद विजय के मद में चरू होकर मित्रराष्ट्र इन सारे सिद्धांतों को भूल गये वे अब इस चिन्ता में थे कि पराजित शत्रुओं से किस प्रकार अधिक-से-अधिक हरजाना वसूल किया जाय और किस प्रकार उनके भग्न साम्राज्य को आपस में बाँट लिया जाय।