पर्यावरण जागरूकता क्या है ?

पर्यावरण हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन किए बिना जीवन को समझ पाना असम्भव है। पर्यावरण की रक्षा करने में लापरवाही बरतने का अर्थ अपना विनाश करना है। हम अपने दैनिक जीवन में पर्यावरणीय संसाधनो का प्रयोग करते है। इन ससाधनो में कुछ नवीनीकरण हो सकता है और कुछ का नहीं। हमें कोयला और पेट्रोलियम जैसे गैर नवीकृत संसाधनो का प्रयोग करते समय विशेष ध्यान रखना चाहिए जो समाप्त हो सकते है। मानव की सभी क्रियाओ का पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है। पिछली दो सदियो से जनसंख्या में हुर्इ वृद्धि तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हुए तीव्र विकास से पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव कर्इ गुना बढ गया है। पर्यावरण की गुणवत्ता को कम करने तथा इसके क्षरण के लिए ये दो मुख्य कारक मुख्य रूप से उत्तरदायी है। पर्यावरण क्षरण से मानव के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा हो गया है। हमें शीघ्र ही यह जान लेना चाहिए कि मानव जाति के कल्याण एवं अस्तित्व के लिए पर्यावरण का संरक्षण एवं सध्ु ाार आवश्यक है। भूमि, वायु, पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनो का प्रयोग बुद्धिमतापूर्ण ढंग से करना चाहिए ताकि वर्तमान और भावी पीढी के लिए स्वस्थ पर्यावरण को सुनिश्चित किया जा सके।

पर्यावरण की समस्याए 

1. भूमि, वायु, और पानी –

भूमि और पानी के प्रदूषण ने पौधो, जानवरो और मानव जाति को प्रभावित किया है। अनुमान है कि प्रत्येक वर्ष लगभग पाचं से सात मिलियन हेक्टयेर भूमि की हानि हो रही है। वायु और पानी के कारण मृदा अपरदन विश्व को बहुत महंगा पड रहा है। बार बार बाढ़ आने से विशेष प्रकार की हानि होती है जैसे वनक्षेत्र का घटना, नदिया े में गाद भरना, पानी निकासी का अपर्याप्त एवं त्रुटिपूर्ण होना, जान माल की हानि इत्यादि। सभी प्रकार के नाभिकीय कचरे को सागरो में डालने से परूा प्राकृतिक पर्यावरण प्रदूषित और विषाक्त हो गया है।

2. जनसंख्या में वृद्धि- 

जनसंख्या में वृद्धि का अर्थ है खाने और सासं लेने वाले अधिक लोग और इससे भूमि और जंगलो पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है जिससे अंत: पारिस्थितिक असंतुलन पैदा हो जाता है। हमारी बढ़ती जनसंख्या से भूमि पर बोझ पड़ता है। जिससे उत्पादन की गुणवत्ता घटती है वनो में कमी आती है। (पारिस्थितिकी में संतुलन के लिए वन क्षेत्र बहुत आवश्यक है जिसके अभाव में वन्य जीव लुप्त हो जाएंगे)। जनसंख्या में वृद्धि केवल प्राकृतिक पर्यावरण के लिए ही समस्या नही है। अपितु यह पर्यावरण के अन्य पक्षों जैसे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पक्षो के लिए भी समस्या है।

3. शहरीकरण – 

शहरीकरण भी पद्रूषण का एक बड़ा स्त्रोत है और पर्यावरण के लिए खतरा है। शहरीकरण का अर्थ है लोगो की शहर की ओर भागती भीड़। शहरीकरण का परिणाम है- धूल, बीमारी और विनाश। बढ़ते शहरीकरण की स्थिति में सफाइर्, बीमारी, आवास, जल आपूिर्त और बिजली की समस्याएं निरतं र बढ़ती रहती है। दूसरी ओर ग्रामीण जीवन में बिना साचे विचार के इंर्धन की लकड़ी सग्रहित करने, अधिक चरागाहो तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनो के हृास से पर्यावरण में क्षरण हो रहा है।

4. औद्योगिकीकरण- 

यातायात और संचार साधनो के विकास के साथ औद्योगिकीकरण ने न केवल पर्यावरण को प्रदुषित किया है अपितु प्राकृतिक संसाधनो में भी कमी पैदा कर दी है। दोनो प्रकार से भारी हानि हो रही है। उष्मा प्रवाह, कार्बन डाइ ऑक्साइड, धूल कण, रेडियोधर्मी नाभिकीय कूडा कचरा और इसी प्रकार के अन्य प्रदूषको के बढ़ते स्तर से पर्यावरणीय खतरा बढ़ा है। दूसरी ओर पारम्परिक उर्जा स्त्रोतो की खपत से प्राकृतिक संसाधनो का हास होता है। हम भावी पीढ़ी की चिंता किए बिना विश्व निर्माण कर रहे है।

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता

पिछले दो दशको में पर्यावरण ने नीति निमार्ताओ वैज्ञानिको और विश्व के अनेक देशो में आम आदमी का ध्यान आकर्षित किया है। वे अकाल, सूखा, इंर्धन की कमी, जलाने की लकड़ी और चारा, वायु और जल प्रदूषण, रासायनिको और विकिरणो की भवायह समस्या, प्राकृतिक संसाधनो, वन्य जीवन का लुप्त होना एवं वनस्पति तथा जीव जतुआे को खतरे जैसे मुददो के प्रति अधिक सतर्क होते जा रहे है। लोग आज वायु, जल, मृदा और पौधों जैसे प्राकृतिक पर्यावरणीय ससाधनो की रक्षा करने की आवश्यक्ता के प्रति सजग है तथा यह पा्रकृतिक सम्पदा है जिस पर मनुष्य निर्भर करता है।

पर्यावरणीय मुददे महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके समाधान के बिना स्थिति बहुत भयावह होगी। यदि पर्यावरणीय समस्याओ को हल नहीं किया गया तो यह पृथ्वी भावी पीढ़ी के रहने योग्य नहीं रहगेी। आज लोगो की और इस ग्रह की आवश्यक्ता एकाकार हो गर्इ है। इस सच्चार्इ से इन्कार नही किया जा सकता कि भविष्य को संभव बनाने के लिए पर्यावरण की रक्षा एवं बचाव अनिवार्य है। वास्तव में मनुष्य की आवश्यक्ताएं बढ़ गर्इ है और उनके अनुरूप पर्यावरण में परिवर्तन किए जा रहे है। यद्यपि पक्रृित में सहन करने की अपार क्षमता है और यह स्वयं को पुनर्जीवित कर लेती है। परंतु फिर भी इसकी एक सीमा है विशेष रूप से जब बढ़ती जनसंख्या और प्रौद्योगिकी का दबाव निरंतर बढ़ रहा है। आज अक्षय विकास तथा परिवर्तनशील पर्यावरण के सुधार एवं संरक्षण की आवश्यक्ता है।

अवलम्बनीय विकास की अवधारणा 

पर्यावरण और विकास पर बने विश्व आयोग ने 1987 में ‘‘हमारा सयुक्त भविष्य’’ शीर्षक से अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट ने अवलम्बनीय विकास (अक्षय विकास) की अवधारणा को उजागर एवं चर्चित बनाया। अवलम्बनीय विकास की यह परिभाषा दी गर्इ है कि वर्तमान पीढ़ी की आवश्यक्ताआे को भावी पीढ़ी की आवश्यक्ताओ से समझौता किए बिना पूरा करना। सभी प्रकार की विकास क्रियाएं किसी न किसी प्रकार से पर्यावरण क्षरण से जुड़ी होती है। आवश्यक्ता इस बात की है कि विकास से होने वाले पर्यावरण क्षरण को ध्यान में रखा जाए तथा विकास और पर्यावरण संरक्षण में सतुंलन स्थापित किया जाए। लोगो के कल्याण और विकास का अवलम्बीय स्तर प्राप्त करने का उददेश्य होना चाहिए। मूल चिंता यह है कि अंत: कितने लोगो की पर्यावरण एवं जीवन की गुणवत्ता के स्तर पर कितनी सहायता की जा सकती है। कार, ब्राउन, डाला, स्मुचर जैसे मुख्यध्कार,,, ब्राउन,, डाला, स्मचुर जैसे मुख्यधारा के पर्यावरणीय विद्वान कहै मुख्यधारा के विद्वानो का जोर प्रदूषण नही है अपितु उनका जोर है कि किस प्रकार:-

  1. ऊर्जा और इसके स्त्रोंतो को नवीनीकरण बनाया जा सके और उनका निरंतर नवीकरण हो 
  2. कूडे़ कचरे को कच्चे माल तथा कच्चे माल को कूडा कचरे में अर्थात दोनो का पुनर्चक्रण किया जा सके। 
  3. सकल राष्ट्रीय उत्पादन की वृद्धि कें लक्ष्यो को पूरा करने से बेहतर है कि वास्तविक मानवीय आवश्यक्ताओ को पूरा किया जा सके। 

‘द ग्रीन्स’ कहते है कि वृद्धि एक प्रकार का कैंसर है, एक ऐसा कैंसर जो पूरे विश्व में फेल सकता है और जीवन का नाश कर सकता है। वह उद्योगो को तभी स्वीकार करते है जब यह लघु स्तर पर हो तथा आत्म निर्भरता के लिए हो। वे व्यापक विकेन्द्रीकरण की वकालत करते है।

    अवलम्बनीय विकास की सकंल्पना विकास के लिए कम और पर्यावरण के लिए अधिक, स्थायित्व के लिए अधिक और परिवर्तन के लिए कम, आवश्यक्ताओ को सीमित करने के लिए अधिक और भौतिक विकास की निरतं रता के लिए कम, पर्यावरण के शोषण के विरूद्ध अधिक तथा इसके प्रयोग के प्रति कम तथा छोटे समुदायो के हित के प्रति कम रूझान रखती है। यह पर्यावरण के साथ विकास की संकल्पना नहीं है अपितु विकास के बिना पर्यावरण की संकल्पना है।

    वास्तव में पारिस्थितिकी का क्षरण रूकना चाहिए। लेकन विकास की गति में रूकावट क्यों ? पर्यावरणीय लाभाें का अनुशासित प्रयोग चहुँमुखी विकास के मार्ग को प्रशस्त करता है। विद्वान तथा सक्रिय कार्यकर्ताओ का कहना है कि पर्यावरणीय क्षरण पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाले लोगो को उनकी हरकतो के लिए उत्तरदायी ठहरा कर तथा उन्है। पर्यावरणीय स्थितियों को सुधारने में लगाकर ही नियंत्रित किया जा सकता है। आवश्यक्ता है ऐसी नियमावली की जो विकास की मांगेा तथा पर्यावरण की अनिवार्यता को एक दूसरे के निकट ले आए।

    राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय प्रयास 

    भारत में पर्यावरण जागरूकता को महत्व 1970 के दशक में सयुंक्त राष्ट्र द्वारा राष्ट्रीय स्टाकहोम में पर्यावरण पर सम्मेलन करवाने के बाद प्राप्त हुआ। भारत में पर्यावरणीय हित की कर्इ गतिविधि लागू किए गए। भारत की राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के उदेश्श्य यहाँ उल्लेखनीय है:

    1. सुरक्षित, स्वस्थ, उत्पादक और सौदंर्य बोध को कराने वाले पर्यावरण का संरक्षण एवं विकास करना 
    2. ग्रामीण और शहरी बस्तियों के जीवन स्तर में श्रेष्ठता लाने के लिए उन्हे सुधारना तथा विकसित करना
    3. विकास को पारिस्थितिकी के सिद्धांत पर आधारित करना तथा उसके साथ पर्यावरण पर पडऩे वाले प्रभाव का अनुमान लगाना आरै पयार्व रण सुरक्षा का समुचित प्रबध्ं ा करना। 
    4. पर्यावरण सुरक्षा की तकनीको को प्रोत्साहित करना, संसाधनो का पुर्नचकण््रा करना तथा कूडे का उपयोग करना 
    5. देश में जैव विविधता के सरंक्षण हेतु प्राकृतिक संरक्षित पशु पक्षी विहार जैसे पहाडो, वर्षा वनो, चारागाहो, मरूस्थल, जलीय क्षेत्र, झीलो, समुद्री तटो, नदी के मुहानो, समुद्री ढ़ालो तथा द्वीपो को सुरक्षित रखना।
    6. राष्ट्रीय समुद्री विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के अंतर्गत पर्यावरण को सुरक्षित रखना। 
    7. सूचनाओ के एकत्रीकरण एवं वितरण पर निगरानी करने हेतु प्रभावशाली तत्रं स्थापित करना 
    8. वज्ञै ानिक परिदृश्यो तथा ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्मारको तथा उनके परिसरो को सुरक्षित रखना।
    9. सभी स्तरो पर पर्यावरणीय शिक्षा को बढा़वा देना तथा जनता में जागरूकता पैदा करना। 
    10. पर्यावरण विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में शोध को प्रोत्साहित करना तथा पर्यावरण को सुरक्षित एवं सुधारने हेतु सामाजिक रूचि को बढ़ावा देना। 
    11. देश में पारिस्थितिकी विज्ञानी, पर्यावरणीय विज्ञानी, योजनाकार तथा उच्च कोटि के प्रबंधको की मानव शक्ति को विकसित करना और उनके काम को राष्ट्रीय विकास के महतवपूर्ण अंग के रूप में देखना। 
    पर्यावरणीय प्रदूषण को रोकने के लिए भारत पर्यावरणीय प्रदूषण को रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा लिए गए कुछ उपाय –
    1. पर्यावरण अदालतें : पर्यावरण को पद्रूषित करने वाली फैक्ट्रियो के विरूद्ध तेजी से न्याय दिलाने के लिए विशेष अदालतो का गठन किया जा रहा है। 
    2. पर्यावरण हितैषी उत्पाद : सरकार बाजार में बिकने वाले उत्पादो के लिए सख्त नियम लागू कर रही है। इन मानको पर खरा उतरने वाले उत्पादो को उत्कृष्टता का प्रमाण पत्र जैसे आर्इ. एस. आर्इ मार्क दिया जाता है। 
    3. पेट्रोल को शीशामुक्त करना : तेल शोधक कारखानो को शीशामुक्त पेट्रोल बनाने के लिए पे्ररित किया जा रहा है। भारतीय पेट्रोल में शीशा (लैड) की मात्रा अधिकतम होती है जो मोटर गाडियो के माध्यम से अधिकांश पद्रूषण फैलाता है। 
    4. हानिकारक कीटनाशको पर प्रतिबंध : आठ रासायनिक कीटनाशको, जिनमें डीडीटी, बीएचसी, एल्ड्रिन और मेलाथियन शामिल है, को बाजार से हटा दिया गया है तथा इनके स्थान पर सुरक्षित जैविक कीटनाशकों को लाने की योजना है। 
    5. राष्ट्रीय कूडा प्रबंधन परिषद : इसका मुख्य कार्य 40 मिलियन टन फलार्इ ऐश को जो कि थमर्ल प्लांटो के निकट पहाड के रूप में पडी है। इर्ट ो में तथा शहर के कडू ा कर्कट को उर्जा में और सीवर के मल को उर्वरक में परिवर्तित करना है। 
    6. ब्लिक लायबिल्टी इन्श्योरेंस : (जन दायित्व बीमा) इसके अंतर्गत सभी कम्पनियों के लिए 48 घंटे में पब्लिक लायबिल्टी इन्श्योरेंस का भुगतान करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। 
    7. मोटर वाहनो द्वारा प्रदूषण : मोटर वाहनो द्वारा प्रदूषण फैलाने के विरूद्ध प्रदूषण विराधेी अभियान को सख्ती से लागू किया जा रहा है। निश्चित मापदण्डो का पालन न करने वाले वाहनो पर भारी जुर्माना भी हो सकता है। 
    8. समुद्र तट के निकट होटल : ऐसे होटलों के विरूद्ध सख्त कार्रवार्इ की गर्इ है जो कानूनो की अनदेखी करते हुए समुद्री तट पर अतिक्रमण करते है। 
    9. राष्ट्रीय नदी कार्य योजना : राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण बनाने का प्रस्ताव है जो राष्ट्रीय स्तर पर जल प्रयोग एवं कूड़ा प्रबंधन के लिए नीति बनाएगा। 
    10. सौर उर्जा आयोग : उर्जा क्षत्रे पद्रूषण फेलाने का मुख्य कारक है इसलिए मुख्य उर्जा स्त्रोत को बढा़ने के स्थान पर ग्रामीण स्तर पर विकेन्दित्र उर्जा निर्माण की योजना है।
    11. सार्वजनिक स्थलो पर धूम्रपान निषेध : सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध करने का प्रस्ताव है। दिल्ली सरकार ने इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभार्इ है एवं इसे लागू कर दिया है। 

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