अनुक्रम
- पॉल पिगर्स एवं चाल्र्स ए. मेयर्स के अनुसार ‘‘पदोन्नति से आशय किसी कर्मचारी को एक श्रेष्ठतर कार्य अपेक्षाकृत अधिक उत्तरदायित्वों, अधिक गौरव अथवा प्रतिष्ठा, अधिक निपुणताओं तथा विशेष रूप से बढ़ी हुर्इ आय अथवा वेतन दर से प्रदान करना है।’’
- अरून मोनप्पा एवं मिर्जा एस. सैय्यद के अनुसार ‘‘पदोन्नति किसी व्यक्ति का एक संगठन की पद सोपानिकी में ऊपर की ओर पुन: कार्य-निर्धारण होता है, जो कि बढ़े हुए उत्तरदायित्वों ,बढ़ी हुर्इ प्रतिष्ठा तथा सामान्य रूप से बढ़ी हुर्इ आय के साथ होता है, जो यद्यपि कि हमेशा इस प्रकार नहीं होता है।’’
पदोन्नति के विषय में उपरिलिखित विवरण के अध्ययन से इसकी जो अनिवार्य दशायें सामने आती है, वे हैं :
- किसी कर्मचारी द्वारा वर्तमान में सम्पन्न किये जा रहे कार्य की अपेक्षा उसके लिए उच्चतर स्तर के कार्य का पुन: निर्धारण।
- कर्मचारी को स्वाभाविक रूप से उसके द्वारा पूर्व में धारित उत्तरदायित्वों एवं प्राधिकारों की अपेक्षा अधिक का सांपै ा जाना।
- पदोन्नति में स्वाभाविक रूप से अधिक आय का सम्मिलित होना।
अत: निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है। कि पदोन्नति किसी कर्मचारी के विकास की वह प्रक्रिया है, जिससे उसके कार्य मे परिर्वतन होता है। वह अच्छा वेतन, अच्छा स्तर, अच्छा अवसर, अर्थिक प्रतिष्ठा, अच्छा कार्य, वतावरण , अधिक उत्तरदायिव्त एवं अच्छी सुविधायें प्राप्त करता है।
पदोन्नति के उद्देश्य
संगठनों द्वारा कर्मचारियों को पदोन्नति की उद्देश्यों की प्राप्ति को ध्यान में रखते हुए की जाती है –
- कर्मचारियों को अधिक उत्पादकता के लिए अभिप्रेरित करना।
- संगठनात्मक पद सोपानिकी में समुचित स्तरों पर कर्मचारियों के ज्ञान एवं निपुणताओं का उपयोग करना, जो कि संगठनात्मक प्रभावशीलता तथा कर्मचारी सन्तुष्टि में परिणत होता है।
- संगठन के उच्च स्तर के कार्यों के लिए आवश्यक ज्ञान एवं निपुणताओं की प्राप्ति हेतु कर्मचारी में प्रतिस्पर्धात्मक भावना का विकास करना तथा उत्साह का संचार करना।
- योग्य एवं सक्षम लोगों को संगठन के प्रति आकर्षित करना तथा उनकी सेवायें प्राप्त करना।
- परिवर्तित वातावरण में उच्च स्तर के रिक्त पदों का उत्तरदायित्व ग्रहण करने हेतु तत्पर रहने के लिए कर्मचारियों के समक्ष आन्तरिक स्त्रोत का विकास करना।
- कर्मचारियों में आत्म-विकास को बढ़ावा देना तथा उन्हें उनकी पदोन्नति के अवसरों की प्रतीक्षा करने हेतु तैयार करना।
- कर्मचारियों में संगठन के प्रति निष्ठा एवं अपनत्व की भावना को विकसित करना तथा उनके मनोबल को उच्च करना।
- कर्मचारियों में प्रशिक्षण एवं विकास कार्यक्रमों के प्रति रूचि उत्पन्न करना।
- अच्छे मानवीय सम्बन्धों के निमार्ण हेतु संगठन के प्रति बचनबद्ध एवं निष्ठावान कर्मचारियों को पुरस्कृत करना।
- श्रम संघों का संगठन के प्रति विश्वास सृजन का प्रयास करना।
पदोन्नति के प्रकार
- क्षैतिजीय पदोन्नति: इस प्रकार की पदोन्नति में उत्तरदायित्वों एवं आय में वृद्धि तथा पद नाम में परिवर्तन सम्मिलित होता है। परन्तु, पदोन्नति कर्मचारी कार्य वर्गीकरण के अन्तर्गत ही रहता है, अर्थात इसमें मौलिक कार्य वर्गीकरण ज्यों का त्यों ही रहता है। उदाहरण के लिए, एक लोअर डिवीजन क्लर्क को अपर डिवीजन क्लर्क के पद पदोन्नति करना। यह पदोन्नति किसी कर्मचारी के पद के श्रेणी उन्नयन करने से सम्बन्धित होती है।
- लम्बवत् पदोन्नति: इस प्रकार की पदोन्नति बढ़े हुए उत्तरदायित्वों, प्रतिष्ठा तथा आय के साथ-साथ कार्य की प्रकृति में परिवर्तन में परिणत होती है। दूसरे शब्दों में, जब पदोन्नति कार्य वर्गीकरण की सीमाओं के बाहर होती है तो वह लम्बवत् पदोन्नति कहलाती है। उदाहरण के लिए, अपर डिवीजन क्लर्क को सुपरिन्टेन्डेण्ट के पद पर पदोन्नत करना।
- शुष्क पदोन्नति: कभी-कभी पारिश्रमिक में वृद्धि के स्थान पर शुष्क पदोन्नति भी की जाती है। इसमें पद नाम भिन्न होता है, परन्तु उत्तरदायित्वों में कोर्इ परिवर्तन नहीं होता है। पदोन्नत कर्मचारी को एक अथवा दो वार्षिक वेतन-वृद्धि दी जाती सकती है।
पदोन्नति के आधार
संगठनों द्वारा अपनी प्रकृति, आकार तथा प्रबन्धन के अनुसार पदोन्नति के लिए विभिन्न आधार अपनाये जाते हैं। सामान्यत: पदोन्नति के दो सुस्थापित आधार योग्यता तथा वरिष्ठता हैं। एक अन्य पदोन्नति का आधार है, वरिष्ठ अधिकारियों की सिफारिश, जो कि विभिन्न रूपों में सभी प्रकार के सगठनों के आधार पर पदोन्नति के समर्थक होते हैं, जबकि दूसरी ओर श्रम संघों की दृष्टि से वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति दी जानी चाहिये।
1. योग्यता के आधार पर पदोन्नति –
योग्यता के आधार पर पदोन्नति करने हेतु यह आकलन किया जाता है कि कोर्इ कर्मचारी उस नये उच्च पद के लिए कितना योग्य है? उसके उस नये पद पर सफल होने की कितनी सम्भावना है? इन सभी बातों को ध्यान में रखकर ही उसकी पदोन्नति की जाती है। इसके अन्तर्गत उसकी सेवा की अवधि को ध्यन में नहीं रखा जाता है।
योग्यता के आधार पर पदोन्नति से होने वाले लाभ –
- योग्य एवं कुशल कर्मचारी अपनी प्रगति हेतु अधिक परिश्रम से काय्र करने के लिए प्रोत्साहित होते हं;ै
- अकुशल कर्मचारियों को यदि यह विश्वास हो जाता है कि पदोन्नति केवल योग्यता के आधार पर ही की जायेगी तो वे अपनी कमियों को दूर करने के प्रयास करते हैं। इस प्रकार, सम्पूर्ण संगठन के कर्मचारियों की कार्यकुशलता एवं योग्यता में वृद्धि होती है; तथा
- यदि संगठन के समस्त कर्मचारी परिश्रम एवं लगन से कार्य करते हैं तो उत्पादन में वृद्धि होती है, जिसके फलस्वरूप सम्पूर्ण समाज भी लाभान्वित होता है।
योग्यता के आधार पर पदोन्नति से होने वाले लाभो के होते हुए भी इसके कुछ दोष –
- यह संगठन के प्रबन्धकों एवं पर्यवेक्षकों आदि को, जिन्हे कर्मचारियों की योग्यताओं के विषय में अपनी राय देनी होती है। पक्षतापूर्ण नीति को अपनाने का अवसर प्रदान करती है। इससे योग्यता की आड़ में जातिवाद तथा भार्इ-भतीजावाद को बढ़ावा मिलता है;
- यह उन कर्मचारियों में असन्तोष एवं निराशा की भावना को उत्पन्न करती है, जो कि वरिष्ठ होते हैं तथा जिनकी पदोन्नति नहीं होती है;
- श्रम संघ, योग्यता के आधार पर पदोन्नति के समर्थक नहीं होते हैं, जिसके फलस्वरूप असन्तोष फैलता है तथा औद्योगिक सम्बन्ध भी बिगड़ते है।
2. वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति –
वरिष्ठता का तात्पर्य एक ही संगठन के अन्तर्गत पर ही कार्य पर सेवा की अवधि से है। इसकी गणना किसी कर्मचारी के कार्य आरम्भ करने की तिथि से की जाती है। वरिष्ठता को पदोन्नति के आधार के रूप में मानने के पीछे यह तर्क है कि एक ही कार्य पर सेवा की अवधि तथा किसी कर्मचारी द्वारा संगठन के अन्तर्गत अर्जित ज्ञान की मात्रा एवं निपुणता के स्तर के बीच एक सकारात्मक सह-सम्बन्ध होता है। यह व्यवस्था इस प्रथा पर भी आधारित होती है कि जो संगठन में पहले आयेगा उसे ही समस्त हित-लाभों एवं विशेषाधिकारों में पहले अवसर दिये जाने चाहिये।
वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति के गुण है –
- यह एक उचित आधार है तथा इसके अपनाने से प्रबन्धकों एवं पर्यवेक्षकों को अपने विवेकानुसार अथवा पक्षपातपूर्ण ढंग से पदोन्नति हेतु कर्मचारियों के चयन करने की छूट नहीं मिल पाती हं;ै
- यह अधिक व्यावहारिक आधार है, क्योकि योग्यता का मापन अत्यन्त कठिन कार्य है;
- इससे कर्मचारियों में संगठन के प्रति निष्ठा एवं अपनत्व की भावना में वृद्धि होती है, क्योंकि उन्हें पता रहता है कि वरिष्ठता के आधार पर उनके पदोन्नति के अवसर आने पर उनके साथ अन्याय नहीं होगा;
- यह आधार कर्मचारियों को अधिक सन्तुष्टि प्रदान करता है, क्योंकि उनकी पदोन्नति उचित समय पर हो जाती है; तथा
- पदोन्नति के इस आधार का श्रम संघों द्वारा प्रबल समर्थन किये जाने से यह विवादों को भी कम करने में सहायक होता है।
वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति में होने वाले गुणों के साथ-साथ इसमें विद्यमान कुछ दोष –
- यह कर्मचारियों को परिश्रम तथा कुशलता के साथ कार्य करने को पा्र ेत्साहित नहीं करता, क्योंकि उन्हैं। यह आश्वासन रहता हैं। कि वे चाहे कार्य करें अथवा न करें उनकी पदोन्नति तो हो जायेगी
- यह योग्य, परिश्रमी एंव कुशल कर्मचारियों के मनोबल को गिरता है तथा उन्हैं। हतोत्साहित करता है, क्योंकि वे सोचते हैं कि परिश्रम से कार्य करने पर भी उन्हें पदोन्नति नहीं मिल पायेगी; तथा
- इससे संगठन की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, क्योंकि आयोग्य एवं अकुशल कर्मचारी इसलिए परिश्रम नहीं करते हैं, क्योंकि उनकी पदोन्नति में कोर्इ रूकावट नहीं होती, जबकि योग्य एवं कुशल कर्मचारी असन्तुष्ट होने के कारण उत्साह एवं लगन से कार्य नहीं करते हैं।
3. वरिष्ठता के साथ योग्यता –
वरिष्ठता एवं योग्यता, दोनों ही पदोन्नति के आधारो कें सापेक्षिक गुण-दोषों का विवेचन करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि दोनों ही आधार के अपने-अपने लाभ हैं। तथा साथ ही उनमें कछु दोष भी हैं। व्यवहार में, वरिष्ठता को ही आधार मानकर पदोन्नति की जाती है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि योग्यता के महत्व को स्वीकार ही न किया जाये। वास्तव में, दोनों ही आधारों के प्रति सन्तुलित दृष्टिकोण अपनाया जाना ही उचित होता है। यदि यह स्पष्ट है कि कोर्इ वरिष्ठ कर्मचारी नये एवं उच्च पद के कार्य को सम्पन्न कर सकता है तो चाहे वह थोड़ा कम ही योग्य क्यों न हो, उसकी पदोन्नति की जानी चाहिये। परन्तु, यदि वह बिल्कुल ही अयोग्य है तो केवल वरिष्ठता के आधार पर उसकी पदोन्नति किये जाने से संगठन का हानि ही होगी। अत: इस सम्बन्ध में निर्णय लेते समय सम्बन्धित कर्मचारी, प्रबन्ध एवं सेवायोजक तीनों के हितों को ध्यान में रखना अति आवश्यक है।