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जाता है। दुर्खीम का जन्म 15 अप्रैल 1858 सन् में पूर्वी फ्रांस के लॉरेन प्रान्त में स्थित एपिनाल
(Epinal) नामक नगर में एक यहूदी परिवार में हुआ था। इनके पारिवारिक व
शैक्षणिक जीवन के बाद इन्होंने अनेक सिद्धांत समाजशास्त्र में प्रतिपादित किये।
दुर्खीम के आत्महत्या का सिद्धांत
1. आत्महत्या के कारक
विद्वानों का कहना है कि आत्महत्या की घटना पागलपन से संबंधित है। कुछ विद्वान आत्महत्या के सम्बन्ध में प्रजाति
और वंशानुक्रमण को मानते हैं। कुछ विद्वान निर्धनता, निराशा, व मद्यपान आदि के
आधार पर आत्महत्या जैसी घटना करने का प्रयास करते हैं। लेकिन
दुर्खीम इन विद्वानों के विचारों से सहमत नहीं है। वे कहते हैं ये आधार
वैयक्तिक है। आत्महत्या की प्रकृति सामाजिक है। इसलिए इसकी व्याख्या समाज
संदर्भ में होनी चाहिए।
जितना कि जैविकीय और भौतिक दषाएं आत्महत्या के साथ एक अनिश्चित और
अस्पष्ट सम्बन्ध को स्पष्ट करती है।’’ इस कथन के आधार पर स्पष्ट है कि
एक सन्तुलित व्यक्तित्व के लिए यह आवश्यक होता है कि सामाजिक दशाओं
तथा सामूहिक चेतना का व्यक्ति के जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव स्वस्थ हो।
लेकिन जब इसके सापेक्ष व्यक्ति के जीवन पर समूह के नियन्त्रण में आवश्यकता
से अधिक वृद्धि अथवा कमी होने लगती है तब सामाजिक दशाएं व्यक्ति को
अस्वस्थ रूप से प्रभावित करना आरम्भ कर देती है। यही दशाएं आत्महत्या का
कारण बनती है।
का प्रभाव बताया जाता था। यदि महिलाये पुरुषों की अपेक्षा कम आत्महत्याएं करती
हैं, तो इसके पीछे कारण यह है कि वे पुरुषों की अपेक्षा सामूहिक-जीवन में
बहुत कम भाग लेती है, और वे इसके सामूहिक जीवन के अच्छे या बुरे प्रभाव को
जीवन में इनके सापेक्ष कम अनुभव करती है। यही प्रभाव दुर्खीम ने अपने अध्ययन
के आंकड़ों के आधार पर अधिक आयु के व्यक्तियों तथा बच्चों के सम्बन्ध आदि
में भी लागू किया।
दुर्खीम अपने अध्ययन में स्पष्ट करते हैं कि समाज में घटित होने वाली
आत्महत्या की दर की व्याख्या केवल समाजशास्त्री आधारों पर ही की जा
सकती है। एक निश्चित समय पर समाज का नैतिक संगठन ऐच्छिक मृत्युओं के
लिए अनुकूल परिस्थिति उत्पन्न करता है।
शक्ति की मात्रा लिए हुये एक सामूहिक व सामाजिक शक्ति का दबाव अनुभव
करता है। जिसके परिणामस्वरूप वह आत्महत्या की ओर बाध्य होता है।
आत्महत्या करने वाले के कार्य जोकि पूर्व में केवल उसके वैयक्तिक स्वभाव को
व्यक्त करते प्रतीत होते हैं, वास्तविक रूप में एक सामाजिक अवस्था के पूरक
और विस्तार होते हैं, जिनकी अभिव्यक्ति आत्महत्या के परिणाम में परिणित होती
हैं। इसलिए वास्तविक तथ्यों के अनुसार प्रत्येक मानव समाज में कम या अधिक
रूप में आत्महत्या की प्रवृति पाई जाती है।
के लिए अपने अनुसार एक सामूहिक प्रवृत्ति पाई जाती है। जोकि वैयक्तिक
प्रवृतियों को उत्पन्न करती है, न कि वैयक्तिक प्रवृतियों का परिणाम होती है।
सम्पूर्ण सामाजिक समूह की ये प्रवृतियां व्यक्तियों को प्रभावित करके आत्महत्या
का प्रमुख कारण बनती है। वे तो केवल ऐसे प्रभाव मात्र है जिनकों आत्महत्या
करने वाले व्यक्ति की नैतिक प्रवृति से लिया गया है। जोकि समाज की नैतिक
स्थिति की एक प्रति-ध्वनि है। व्यक्ति जीवन में अपनी उदासीनता को समझाने के
लिए अपने चारों ओर की तात्कालिक परिस्थितियों को दोषी ठहराता है, कि
उसका जीवन दुखी है क्योंकि वह दुखी है। लेकिन वास्तविकता में वह बाहरी
परिस्थितियों के कारण दुखी है। ये सभी बाहरी परिस्थितियां उसके जीवन
की इधर-उधर की घटना नहीं, बल्कि वही समूह की है जिसका कि वह सदस्य
है। यही कारण है कि ऐसी कोई सामाजिक परिस्थिति नहीं होती जोकि
आत्महत्या के लिए अवसर का काम न कर सके। यह सब तो इस बात पर निर्भर
करता है कि आत्महत्या की प्रवृति को उत्पन्न करने वाले कारण कितनी तीव्रता
से व्यक्ति को प्रभावित करते हैं।
उपर्युक्त सम्बन्ध में एक प्रश्न उठता है कि यदि सामाजिक
परिस्थिति ही आत्महत्या का कारण है तो समान सामाजिक परिस्थिति होने पर उसमें
रहने वाले व्यक्तियों में आत्महत्या की घटनाएं एक-दूसरे से अलग क्यों होती है?
इसमें दुर्खीम ने स्पष्ट करते हैं कि आत्महत्या को प्रेरणा
देने वाली परिस्थिति प्रत्येक समाज में क्रियाशील रहती है लेकिन कई व्यक्तियों
पर इनका प्रभाव समान नहीं होता है। क्योंकि इनका प्रभाव किसी व्यक्ति पर तब
पड़ता है जब तक व्यक्ति का व्यक्तित्व उसे अपना न ले। यही कारण है कि
निर्धनता तथा असुखी वैवाहिक जीवन की यातना को कुछ लोग सह लेते हैं।
लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इस यातना को सह नहीं पाते हैं और
उसके साथ अनुकूलन करने में अपने को असमर्थ पाकर आत्महत्या की ओर प्रेरित
हो जाते हैं। एक विषेश परिस्थिति को कुछ लोग बहुत सामान्य समझकर उसे
यूं ही छोड़ देते हैं। अथवा उसके प्रति उदासीन बने रहते हैं। वहीं दूसरी ओर
कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जोकि उसी परिस्थिति के उत्पन्न होने या तो पूरी तरह से
टूट जाते हैं और उन्हें अपने जीवन की भी चिन्ता नहीं रहती है। तथा परिणाम
आत्महत्या होती है।
अर्थात स्पष्ट है कि आत्महत्या को प्रेरणा देने वाली कई सामाजिक परिस्थितिओं के प्रति जो व्यक्ति जितना अधिक लगाव महसूस करते हैं, उनमें
आत्महत्या की ओर बढ़ जाने की सम्भावना उतनी अधिक हो जाती है। इसी
संदर्भ में दुर्खीम अपने अध्ययन में लिखते हैं कि ‘‘यह निश्चित प्रतीत होता है कि
तक वे उसके प्रति उदासीन बने रहें।’’
दुर्खीम द्वारा अध्ययन में प्रतिपादित आत्महत्या से संबंधित आंकड़ों के विश्लेषण
विश्लेषण के आधार पर कुछ परिणामों पर नजर डालें –
- आत्महत्या की दर हर साल लगभग एक सी रहती है।
- सर्दियों की तुलना में गर्मियों में आत्महत्याएं ज्यादा होती हैं।
- कम उम्र के लोगों की तुलना मे अधिक उम्र के लोगों में आत्महत्या की दर
अधिक पायी जाती है। - सामान्य जनता की तुलना में सैनिक लोग अधिक आत्महत्याएं करते हैं।
- अविवाहित और सुखी पारिवारिक जीवन से वंचित लोगों में उन व्यक्तियों
की तुलना में आत्महत्या की दर - गावों की तुलना में शहरों में अधिक आत्महत्याएं होती हैं।
दुर्खीम के अनुसार आत्महत्या के प्रकार
- अहंवादी आत्महत्या
- परार्थवादी आत्महत्या
- असामान्य (आदर्शहीन) आत्महत्या
1. अहंवादी आत्महत्या
2. परार्थवादी आत्महत्या
- अनिवार्य परार्थवादी आत्महत्या,
- ऐच्छिक परार्थवादी आत्महत्या व
- उग्र परार्थवादी आत्महत्या।
