अनुक्रम
जर्सिल्ड नामक मनोवैज्ञानिक ने किशोरावस्था का अर्थ परिभाषित करते हुए लिखा है, ‘‘किशोरावस्था वह अवस्था है जिससे मनुष्य बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर बढता है।’’ किशोरावस्था 11 से 18 वर्ष के बीच की मानी जाती है। कुछ मनोवैज्ञानिक इसे तनाव, तूफान एवं विरोध की अवस्था भी मानते है। इस अवस्था में किशोर एवं किशोरी में नाना प्रकार के शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होते है।
किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तन-
- किशोर की वाणी में कर्कशता एवं किशोरी की वाणी में कोमलता तथा मिठास आ जाती है।
- किशोर के मुख में मूँछों व दाढ़ी के प्रारम्भिक चिन्ह स्पष्ट होने लगते है एवं किशोर एवं किशोरी के गुप्तांगों में बाल उग आते है।
- किशोरियो में मांसिक स्त्राव एवं किशोरो में स्वप्न दोष होने लगते है।
- किशोरियों के कुल्हे एवं वक्षस्थल तथा किशोर के कंधें चौड़े होने लगते है।
- किशोर एवं किशोरी की हडिडयॉ सुदृढ़ होने लगती है।
- ज्ञानेन्द्रियो का पूर्ण विकास हो जाता हैं।
- कद लम्बा हो जाता है।
- किशोरियों में शरीर की गोलार्इ प्रदान करने के लिए अधिक वसीय ऊतक व त्वचा के नीचे के ऊतक विकसित होतें है जबकि किशोरों में मांसपेशियों का विकास होता है जिससे लड़को को भारी श्रम करने में मदद मिलती हैं।
जल्दी या देर से परिपक्वता-
कुछ किशोर में उपरोक्त शारिरिक परिवर्तन अन्य की तुलना में जल्दी होते है। इस दौरान किशोरो पर इन परिवर्तन का मनोवैज्ञानिक रूप से विशिष्ट प्रभाव पड़ता है। ऐसा देखा गया कि जो लड़कियाँ जल्दी परिपक्व होती है वे अपने शरीर में होने वाले परिवर्तनो से संकोच महसूस करती है तथा देर से परिपक्व होने वाली लड़कियाँ अधिक आश्वस्त होती है क्योकि वयस्क लोग इनसे जिम्मेदारी पूर्ण व्यवहार की उतनी अपेक्षायें नही रखते जितनी कि जल्दी परिपक्व होने वाली लड़कियों से रखते है। ठीक इसके विपरीत जल्दी परिपक्व होने वाले लड़के अधिक आत्मविश्वासी तथा आत्मसंतुष्ट होते है। वयस्क इनसे अधिक अपेक्षायें रखते हैं जबकि देर से परिपक्व हुए लड़कों में हीनभावना आ जाती है। ये भावनाओं अस्थिर एवं अस्थायी होती है। अभिभावको को किशोर होते बच्चों से सहानुभूतिपूर्वक पेश आना चाहिए।
किशोरावस्था में सामाजिक संवेगात्मक विकास-
किशोर का जीवन बहुत ही भावात्मक होता है। इस समय इनकी मन: स्थिति में काफी उतार चढ़ाव रहता है। ये अत्यंत भावुक एवं चिड़चिड़े हो जाते है। कभी-कभी यें भावावेश में ऐंसे कार्य कर डालते हैं जो असम्भव एवं असाधारण होते है।
सामाजिक रूप से ये अपने हम उम्र मित्रो के साथ रहना पसंद करते है। इस समय इनकी एक विशिष्ट संस्कृति मुल्य, कपड़ा, पहनने का तरीका, भाषा, संगीत एवं रूचि अरूचि होती है। किशोरो की मित्र मण्डली काफी बड़ी होती है। ऐसे किशोर जो सामाजिक रूप से हिलमिल नही पाते तथा मित्र नही बना पाते, अवसाद के शिकार हो जाते है जिसके परिणाम घातक हो सकते है।
1. बुद्धि का अधिकतम विकास-
किशोरावस्था तक बालक रमें बुद्धि का उच्चतम विकास हो जाता है। में बाल उग आते है। बी. एन झाने लिखा है’’ जहाँ तक बुद्धि के विकास का प्रश्न है यह किशोरावस्था मे चरम सीमा तक पहुँच जाता है।
2. भाषा विकास-
बुद्धि के चरम विकास के फलस्वरूप बालक की भाषा की समझ, शब्द भंडार, शब्दो के संक्षिप्त रूप का प्रयोग आदि पर सीधा असर पड़ता है। बालक का शब्द ज्ञान पर लगभग 4000 से 5000 शब्दों तक का हो सकता है। अपने विचारो की धारा प्रवाह अभिव्यक्ति कर सकते है।
3. संज्ञानात्मक विकास-
इस अवस्था में किशोरो की सोच अमूर्त हो जाती है। वे घटनाक्रम व परििस्थ्तियों की कल्पना कर सकते है। प्राय: किशोर किसी स्थान पर बैठकर नाना प्रकार के दिवास्वाप्न देखता है। काल्पनिक जगत में विचरण करने के कारण इनकी प्रवृति अन्र्तमुखी रहती है। साहित्य, कला एवं संगीत के प्रति रूचि बढ़ जाती है।
किशोरावस्था में यौन शिक्षा की आवश्यकता-
आधुनिक मनोवैज्ञानिकों का मत है कि किशोर की कामप्रवृति को अच्छी दिशा की ओर परिवर्तित अथवा परिमार्जित करने के लिए उसे यौन शिक्षा देना नितान्त आवश्यक है। किशोरों को यौनविकास के विषय में शिक्षित व इन परिवर्तनो में सामंजस्य बैठाने की आवस्यकता है। इस समय इस विषय में ये जैसी विचार धारा बनायेगें उसी पर उनका वयस्क यौन जीवन आधारित होगा। इस समय किशोरो का यौन ज्ञान के प्रति रूझान स्वाभाविक है तथा वे अपनी जिज्ञासा को शाँति करने के लिए गलत माध्यमों का चयन भी कर सकते है अत: इस विषय में माता पिता व स्कूल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है जिससे इनको यौन शिक्षा से संबंधित सही सूचनाये मिल सके। माता पिता को बच्चो के साथ निकटतम संबंध बनाये रखना चाहिए ताकि बच्चे अपने कोर्इ भी प्रश्न बेंझिझक पूछ सकें तथा माता पिता भी स्पष्ट शब्दो में उन प्रश्नो के उत्तर निसकोच दे सकें ।
1. अभिभावको की भूमिका:-
इस अवधि में किशोर अपने आपको इतना सक्षम समझने लगता है कि वह अपना स्वतंन्त्र निर्णय ले सके उसे माता पिता का दबाव तथा नियंन्त्रण अच्छा नही लगता। वे यह नही चाहते कि उन्हे हर वक्त यह करो यह मत करो का उपदेश दिया जायें फलस्वरूप बच्चो व वयस्कों के मध्य एक दूरी निर्मित हो जाती है अत: अभिभावको को सोंच समझकर सहानुभूति पूर्वक उनसे व्यवहार करना चाहिए तथा उन्हे यह सुनििश्चात करना चाहिए कि उन्हें बच्चो को ेिकतनी स्वर्तन्त्रता देना चाहिए अथवा कितना नियंत्रण रखना चाहिए । इस समय माता पिता तथा शिक्षको का कत्र्तव्य हो जाता है कि वे बालक के प्रति सहानुभूति का बर्ताव करे, उन पर भरोसा करे तथा उन्हे पर्याप्त मात्रा में स्वतन्त्रता प्रदान करे। उनके द्वारा लिए गए अच्छे निर्णयों का स्वागत एवं सम्मान करे ताकि वे भविष्य में जीवन की कठिनाइयों को स्वत: दूर कर सके तथा आत्मविश्वासी बने रहें। यह देखा गया है कि-
- जो माता पिता बच्चो को पर्याप्त स्वतंत्रता देते है, उनके निर्णयो के प्रति रूचि व जिम्मेदारी का भाव दर्शाते है, वे बच्चो को अधिक आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बनाने के लिए सक्षम होते है।
- इसके विपरित तानाशाही प्रकृति के माता पिता बच्चों को स्वयं निर्णय नही लेने देते तथा उनके आत्मविश्वास को आघात करते है। ऐसे किशोर हीन भावना से ग्रसित तथा नकारात्मक विचारों से भर जाते है तथा इनकी आत्मनिर्भर होने की क्षमता पर गंभीर रूप से रोक लगा देते रहै।
- किशोर की समस्याओं को उन पर ही छोड देने वाले तटस्थ माता पिता बच्चों से कोइ मेल जोल नहीं रखते, ऐसें किशोर तटस्थ मनोवृतियों वाले हो जाते है। अत: माता-पिता बच्चो का संबंध आपसी प्रेम व आदर पर आधारित होना चाहिए। बच्चों को भी अपने माता पिता का दृष्टिकोण समझना चाहिए क्योकि माता-पिता अनुभवी है तथा वे अपने बच्चो का अहित नही चाहते।
2. हम उम्रोंं की भूमिका-
किशोरावस्था में बालक अपने माता पिता से ज्यादा हम उम्रो को अधिक महत्व देते है क्योंकि संयुक्त परिवार टूट रहे है। एकल परिवारो में किशोरो की समस्याओं पर बात करने वाला कोर्इ नही होता। माता-पिता जीविको पार्जन में व्यस्त रहतें है तथा घर पर कोर्इ अन्य व्यक्ति नहीं होता अत: किशोर हम उम्रो से ज्यादा मेल जोल बढ़ाता है। किशोरावस्था में हम उम्रों की मण्डली निम्न कारणों से महत्वपूर्ण हो जाती है-
- सभी की समस्या एक जैसे हो जाती है।
- किशोर मित्रमडली में ज्यादा स्वतंत्रता अनुभव करता है तथा विपरित लिंगीय सदस्यों के साथ अंत: क्रिया सीखता हैं।
- किशोरावस्था में माता पिता से ज्यादा मित्र ज्यादा भरोसे मंद लगतें रहै।
- इस अवस्था में किशोर ‘मित्र संस्कृति’ अपनाते है जैसे हम उम्रों जैसे बात करना, कपड़े पहनना, चलना, व्यवहार करना। मित्र संस्कृति अपनाकर किशोर स्वयं को माता-पिता से भिन्न महसूस करते है।
यही समय किशोर के सामाजिक विकास पर अपना प्रभाव डालता है परंतु यह अत्यंत आवश्यक है कि माता पिता बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखें क्योंकि कर्इ बार ऐंसी गतिविधियां असामाजिक भी हो सकती है।
3. विद्यालय व शिक्षकों की भूमिका –
किशोरों के विकास पर विद्यालय व शिक्षकों का अत्यंत प्रभाव पड़ता है। विद्यालय में यदि स्कूल का अनुशासन बहुत सख्त नही है और विद्याथ्र्ाी की भावनाओं का आदर किया जाता है तो विद्याथ्र्ाी को पढ़ार्इ करने में आनंद आता है। शिक्षक उचित रूप से प्रशिक्षित, है हँसमुख एवं उत्साहित हो तों बच्चों में छिपी प्रतिभा को जागृत कर सकते है। किशोर अपने बारे में सकारात्मक सोंच बना सकते है। अप्रशिक्षित, अयोग्य अध्यापक व छात्रों की अधिक संख्या, अधिक कार्यभार, सख्त पाठ्यक्रम तथा नियम बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव डालते है। विद्यालय जाने से कतराते हैं। पढ़ार्इ में रूचि कम हो जाती है तथा अच्छे परिणाम नहीं ला पाते।
शैक्षणिक व सामाजिक कौशल देने की भूमिका के अतिरिक्त विद्यालय अभिभावकों तथा किशोरों के मध्य ‘पीढ़ी अंतराल’ को कम करने का दायित्व भी निभा सकते हैं। अत: विद्यालय में समय-समय पर अभिभावकों की बैठक भी लेना चाहिए जिससे अध्यापक अभिभावकों के विचारों को उनके बच्चों तक मित्रवत् ढंग से पहुॅंचाने में मददकर सकें।
किशोरों की समस्यायें-
किशोरों में तीव्र गति से शारीरिक परिवर्तन होता है। माता-पिता तथा समाज के अन्य वयस्कों की अपेक्षायें बदल जाती हैं। इससे किशोर भ्रमित हो जाते हैं। अपने माता-पिता, हम उम्र मित्र, विद्यालय व शिक्षकों की मदद से किशोर इस अवधि में परिपक्व हो जाते हैं लेकिन कुछ किशोरों को समुचित वातावरण न मिलने से उनके व्यवहार में विकार आ जाते हैं तथा वे समस्याग्रस्त बालक बन जाते हैं। ये समस्यायें निम्नलिखित हो सकती हैं :-
- भोजन संबंधी परेशानी :-किशोर अपने आपको अकेला व उपेक्षित समझने लगता है तो दूसरों का ध्यान आपनी ओर आकर्षित करने के लिए अत्यधिक मात्रा में खाने लगता है और मोटा होने लगता है। कुछ किशोर ज्यादा भावुक होते हैं तथा डॉंटे जाने पर तनाव की स्थिति में आ जाते हैं तथा उल्टियॉं करने लगते हैं।
- व्यक्तिगत समस्याएॅं :-किशोर किशोरियों में अपने रंग, रूप, मोटापा, कद, नाक, कपड़े इत्यादि को लेकर नाना प्रकार के नकारात्मक भाव पाये जाते हैं जिससे वे चितिंत हो जाते हैं।
- आत्मघाती प्रवृत्तियॉं :- कर्इ किशोर का सामाजिक विकास ठीक से नहीं हो पाता, वे अपने हम उम्रों से दोस्ती करने में अक्षम होते हैं। ऐसी स्थिति में वे स्वयं को उपेक्षित व अकेला समझते हैं और सोचते हैं कि कोर्इ उन्हें प्यार नहीं करता तथा अवसाद एवं नकारात्मक सोच की स्थिति में वे आत्मघात कर बैठते हैं।
- सामाजिक समस्यायें :- किशोर पारिवारिक व सामाजिक उत्सवों में भाग लेना पसंद नहीं करते। वे विपरीत लिंगी लोगों के साथ रहने में हिचकते हैं कि कोर्इ उनका मजाक न उड़ाये।
- शारीरिक समस्यायें :- किशोरोवास्था में तीव्र गति से शारीरिक परिवर्तन होता है। किशोरियॉं अपने शरीर के साथ सामन्जस्य करने में असमर्थ रहती है, वे अपनी समस्या बताने में हिचकिचाती है। शारीरिक परिवर्तनों से कर्इ बार वे शर्म महसूस करती हैं तथा उन्हें छिपाने का अधिकाधिक प्रयास करती हैं। धार्मिक रीतिरिवाज और अंधविश्वास लड़कियों के लिए यौवनारंभ के समय विशेषकर मासिक धर्म के समय गलत व्यवहार प्रस्तावित करते हैं जिससे लड़कियों पर बुरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है अतएव बच्चों को उपयुक्त ज्ञान प्रदान करना चाहिए तथा उनमें होने वाले शारीरिक परिवर्तनों को स्वाभाविक बताकर उन्हें चिंतामुक्त करना चाहिए।