अनुक्रम
कालिदास का जन्म
सर विलियम जोन्स, डॉ0 पिटर्सन, आचार्य एस0 राय, आई0 आई0 बालसुब्रमहण्यम्, पं0 क्षेत्रेशचन्द्र चट्टोपाध्याय, राजबली पाण्डेय एवं जी0 सी0 (6) झाला आदि विद्वानों के मतानुसार कालिदास ईसा की प्रथम शताब्दी पूर्व हुए थे। फग्र्युसन एवं मैक्समूलर ने कालिदास को ईसा की छठी शताब्दी का बताया है। डॉ0 भाऊदाजि, डॉ एच0कर्न, बेवर, भण्डारकर, फ्लीट, के0 बी0 पाठक इस मत के समर्थक हैं।
कालिदास का समय ईसा की पाँचवीं शताब्दी से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता तथापि उनके काव्यों में जिस वैभव एवं ऐश्वर्य का चित्रण हुआ है वह तत्कालीन भारतीय इतिहास में उदार वृत्ति वाले गुप्त सम्राटों के शासन काल में ही संभव था। कालिदास के ग्रन्थों में धार्मिक सहिष्णुता तथा दण्डनीति की विनम्रता का प्रचुर उल्लेख हुआ है और पौराणिक परम्पराएँ सर्वत्र विकीर्ण हैं। इन सभी चित्रणों से कालिदास गुप्तकाल के कवि प्रतीत होते हैं।
‘उज्जयिनी’ को महाकवि की जन्मभूमि मानने वाले विद्वानों में श्री अरविन्द, डॉ0 वा0वि0 मिराशी, डॉ0 शिव प्रसाद भारद्वाज तथा प्रो0 झाला प्रमुख हैं। ‘मेघदूत’ में उज्जयिनी के प्रति उनका विशेष आकर्षण दृष्टिगत होता है। कवि ने इस नगरी के ऐश्वर्य, उससे सम्बन्धित लोककथाओं, प्रसिद्ध महाकाल महादेव का मन्दिर, सन्ध्या के समय होने वाली आरती में होने वाले वेश्यानृत्य, अभिसारिका स्त्रियों इत्यादि का मनोहर वर्णन किया है। इस नगरी को कालिदास ने स्वर्ग का कान्तिमान खण्ड माना है। जिसे स्वर्ग में अपने पुण्यों का फल भोगने वाले पुण्यात्मा लोग पुण्यों के समाप्त होने से पूर्व बचे हुए पुण्य के बदले अपने साथ पृथ्वी पर उतार लाए हैं।
उज्जयिनी के प्रति कवि का यह विशेश अनुराग ही है कि उन्होंने रामगिरि से अलका नगरी की ओर जाते हुए मेघ से सीधे मार्ग में न पड़ने पर भी इस नगर की ओर जाने का अनुरोध किया है, ‘‘यद्यपि उत्तर की ओर जाने से मार्ग वक्र पड़ेगा, तथापि तुम उज्जयिनी के महलों के क्रोड़ में चलने वाली प्रणय लीलाओं से विमुख मत होना।’’ इससे यह स्पष्ट होता है कि महाकवि को उज्जयिनी से अतिशय प्रेम था अत: यह माना जा सकता है कि उज्जयिनी ही कालिदास की जन्मभूमि रही हो किन्तु प्रबल प्रमाणों के अभाव में किसी एक मत को स्वीकार करना उपयुक्त नहीं होगा।
अर्थात् कमल में कमल की उत्पत्ति सुनी तो जाती है परन्तु देखी नहीं जाती।
‘‘बाले तब मुखाम्भोजे कथमिन्दीवरद्वयम्’’
अर्थात् हे देवी तुम्हारे मुख कमल पर ये दो (नयन) कमल जैसे हैं। इस प्रकार कालिदास द्वारा समस्यापूर्ति किये जाने पर उस वेश्या ने ‘स्वर्ण’ के लोभ में आकर कालिदास की हत्या कर दी। बाद में सही वृतान्त जानकर कुमारदास अत्यन्त दु:खी हुये और कालिदास की चिता में जलकर मर गये।
कालिदास की प्रमुख रचनाएँ
संस्कृत साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि कालिदास ने महाकाव्य, खण्डकाव्य एवं नाटक तीनों विधाओं में काव्य रचना की है। विद्वानों ने महाकवि कृत कुल
सात रचनाएँ स्वीकार की है जिनमें दो महकाव्य रघुवंश एवं कुमारसम्भव दो खण्डकाव्य ‘ऋतुसंहार’ एवं ‘मेघदूतम्’ तथा तीन नाटक- ‘मालविकाग्निमित्रम्’, ‘विक्रमोर्वशीयम्’ तथा ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ है।
1. कुमारसम्भव
कवि काव्य के प्रारम्भ में ही कहता है कि संसार के माता-पिता शिव और पार्वती के रूप में और उनके सौन्दर्य का वर्णन अत्यन्त मधुर ढंग से किया गया है। कुमारसम्भव में पार्वती के जन्म, भगवान शंकर की समाधि, पार्वती की साधना, मदन के पुश्प-बाण का प्रहार, शिव का नियम भंग, पार्वती के प्रति
आकर्षण, शिव और पार्वती का विवाह, शिव का पुन: आत्मनियंत्रण, कामदेव पर क्रोध, मदन दहन पर रति का विलाप, शिव का दया-भाव, मदन का पुनर्जन्म, शिव-पार्वती का परिणय आदि प्रसंग इसमें आये हैं।
कुमारसम्भव साहित्य की दृष्टि से बहुत ही सुन्दर है। इस काव्य में कालिदास की आध्यात्मिक विचारधारा छिपी मिलती है। शिव के द्वारा कामदेव का दहन करना तथा पार्वती की तपस्या के पश्चात शिव के द्वारा उन्हें स्वीकार करने की घटना, जिस आध्यात्मिक तत्त्व की ओर संकेत कर रहा है। वास्तव में वह कितना सच्चा और कितना गूढ़ है।
2. रघुवंश
कालिदास का दूसरा महाकाव्य रघुवंश है। रघुवंश महाकाव्य को कालिदास की सबसे अन्तिम काव्य रचना माना जाता है। इसके साथ ही साथ उसे उत्कृष्ट और प्रौढ़ रचना भी माना गया है। कवि कालिदास की प्रतिभा, कवित्वशक्ति, विस्तृत ज्ञान एवं प्राचीन भारतीय इतिहास का सम्यक् परिचय इस महाकाव्य के द्वारा उपलब्ध होता है। भारतीय आलोचक रघुवंश को कालिदास की सर्वश्रेष्ठ कृति मानते हैं। रघुवंश में 19 सर्ग हैं।
क्वसूर्यप्रभवो वंश: क्व चाल्पविशया मति:।
तितीश्र्ाुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम्।। रघुवंशम् 1/2
इस महाकाव्य का शुभारम्भ शिव-पार्वती की वंदना से होता है। रघुवंश के आरम्भ में त्याग-तपस्या का चित्रण तथा अन्त में भोग-विलास एवं मिथ्याबिहार का वर्णन मिलता है। रघुवंश के प्रारम्भ में दिलीप, रघु, दशरथ,
राम जैसे महान सम्राटों का चरित्र-चित्रण तथा उत्तरार्द्ध में परवर्ती राजा अग्निवर्ण को भोग-विलास की भावना में लीन होता दिखाया गया है।
इस महाकाव्य का प्रारम्भ अयोध्या के सूर्यवंशी राजा दिलीप के वर्णन से होता है। राजा दिलीप की पत्नी सुदक्षिणा जिसकी कोई सन्तान नहीं थी। अत: इससे खिन्न होकर दोनों दम्पत्ति वशिष्ठ के आश्रम गये वशिष्ठ ने उन्हें बताया कि नन्दिनी गाय की सेवा करने से तुम्हें पुत्र प्राप्त हो सकता है। नन्दिनी गाय की सेवा करने के फलस्वरूप उन्हें ‘रघु’ नामक पुत्र रत्न प्राप्त होता है। रघु ने ‘विश्वजित’ नामक यज्ञ का अनुष्ठान किया और अपनी समस्त सम्पत्ति दान कर दी। उनकी दरिद्रावस्था में ‘परतन्तु’ के शिष्य ‘कौत्स’ उनके पास धन-याचना के लिए पहुँचे। धनाभाव के कारण रघु ने कुबेर के खजाने से धन लाकर कौत्स को दे दिया। कौत्स प्रसन्न होकर राजा रघु को पुत्र की प्राप्ति का वरदान देता है। राजा रघु को ‘अज’ नामक पुत्र प्राप्त होता है। उसका विवाह विदिशा की सुन्दर राजकुमारी इन्दुमती के साथ होता है। लेकिन इन्दुमती की अकस्मात् ही मृत्यु हो जाती है और उसके वियोग में अज भी स्वर्गधाम पहुँच जाते हैं। अज के पुत्र दशरथ हुए उनके द्वारा ऋशि कुमार-श्रवण कुमार की भ्रम से हत्या हो जाने पर श्रवण कुमार के माता-पिता द्वारा दिये गये शाप से पुत्र के शोक में राजा दशरथ की भी मृत्यु हो गयी।
ग्रन्थ है। इसमें कवि ने रघुवंशी राजाओं के चरित्र-चित्रण करने में अत्यन्त निपुणता दिखायी है। राजाओं द्वारा वर्ण और आश्रम धर्म के अनुरूप कार्य करते हुए, सन्तान प्राप्ति के लिए विवाह, बाल्यकाल में विद्याध्ययन युवाकाल वृद्धावस्था में मुनियो के समान वनों में तपस्या और अन्त में ईश्वर का भजन करते हुए अपने शरीर को त्याग करते हुए दिखाया गया है।
3. ऋतुसंहार
ऋतुसंहार भी कालिदास की अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण खण्डकाव्य विहार की कृति मानी जाती है। विद्वानों का यह विचार है कि कालिदास ने इसी गीतिकाव्य से अपनी काव्य कला का प्रारम्भ किया होगा। विश्व भर में वास्तविक रूप से छ: ऋतुओं का सच्चा आनन्द भारतवर्ष के अतिरिक्त कहीं और इतना सुन्दर रूप नहीं दिखाई देता है। कवि कालिदास ने इन छ: ऋतुओं का स्वाभाविक वर्णन ऋतु संहार के छ: सर्गों में विस्तृत रूप से वर्णन किया है। प्रत्येक सर्ग में एक-एक ऋतु का वर्णन किया गया है।
यह खण्डकाव्य है। मेघदूत कवि कालिदास की विरह गाथा की सच्ची कथा और मानवीय जीवन की एक अद्वितीय रचना है। यह ग्रन्थ इतना अधिक लोकप्रिय है कि इसका प्रमाण इसकी भारतीय भाषाओं और कई विदेशी भाषाओं में की गयी टीकाओं से मिलता है। इसमें प्रिय वियोग में यक्ष मेघ के द्वारा अपने संदेश को अपने प्रिये के पास भेजता है।
अलकापुरी में कुबेर के यहाँ एक यक्ष काम करता था। वह बड़ी निष्ठा से प्रात: काल उठकर ताजे पुष्प तोड़ कर पूजा के लिये लाता था, कुछ दिन के पश्चात् उसका विवाह हो जाता है, और उसका पूरा ध्यान हमेशा अपनी यक्षिणी में ही लगा रहता था। वह रात को ही फूल तोड़कर ले आता था, परन्तु कुछ दिनों के बाद कुबेर को यह पता चल जाता है कि फूल बासी हैं क्यों कि प्राय: बासी फूलों की डठल काली पड़ जाती है। अपने कर्त्तव्य का पालन ठीक प्रकार से न करने के कारण कुबेर उससे रूश्ट हो जाते हैं, और कहते हैें कि तू एक वर्श तक अपनी पत्नी से नहीं मिल सकेगा।
विरहिणी प्रेयसी के पास अपनी मन:स्थिति को बताने के लिए संदेश भेजना चाहता था।
मेघदूत कवि कालिदास के द्वारा लिखा गया एक ऐसा काव्य है। जिसमें सरल, सुन्दर एवं आकर्शक युक्त भावों को पिरोया गया है। श्री शांतिप्रिय द्विवेदी ने ठीक ही कहा है कि ‘‘उनके काव्य शब्द प्रयोगों के लिए नहीं बल्कि शब्द काव्य के लिय है।’’ उनकी सरल सूक्तियों से ‘बाणभट्ट’ जैसे कवि भी प्रभावित हो जाते हैं। नाटक ग्रन्थ कालिदास ने तीन नाट्य ग्रन्थों की रचना की है। इनके नाटकों में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र का सूक्ष्म अवलोकन किया जा सकता है। नायक-नायिका का प्रणय, राजा का कर्त्तव्य तथा उनका पराक्रम, राज्य का वैभव एवं विलास, वर्णाश्रमधर्म के प्रति लोगों में गहरी आस्था इत्यादि का वर्णन कवि का प्रधान उद्देश्य रहा है। मालविकाग्निमित्रम्
यह महाकवि का प्रथम नाटक ग्रन्थ है। इस नाटक में 5 अंक है। इसकी कथावस्तु ऐतिहासिक एवं शृंगारिक है। इसमें शुंगवंश के संस्थापक पुश्यमित्र के पुत्र अग्निमित्र तथा विदर्भ के माधवसेन की बहन मालविका की प्रणय-कथा का वर्णन है। इसमें वह माधुर्य एवं भाव-गाम्भीर्य दृश्टिगत नहीं (20) होता जैसा कि इनकी अन्य नाट्यकृतियों में विदिशा के राजा अग्निमित्र के व्यक्तित्व में धीरोदात्त की अपेक्षा धीरललित कोटि के नायक के गुणों का आधिक्य है। रानी धारिणी की परिचायिका के रूप में रहने वाली तथा नृत्य-संगीत में कुशल मालविका को चित्र में देखकर राजा उस पर आसक्त हो जाता है। रानी धारिणी तथा इरावती मालविका को राजा से दूर रखने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहती है किन्तु अग्निमित्र विदूशक गौतम की सहायता से उसे प्राप्त करने में सफल हो जाता है।
4. विक्रमोर्वशीयम्
रचनाक्रम की दृष्टि से यह कालिदास की द्वितीय नाट्यकृति है। ‘मालविकाग्निमित्रम्’ की भाँति यह भी 5 अंकों में विभक्त तथा शृंगारश्रित है। इसमें राजा पुरूरवा तथा अप्सरा उर्वशी के प्रणय कथा का वर्णन है। इसकी कथावस्तु का आधार ‘ऋग्वेद’ है। ऋग्वेद के ‘दशवें मण्डल’ के ‘पंचवे-सूक्त’ में पुरूरवा उर्वशी की कथा संवाद रूप में वर्णित है। इसके अतिरिक्त शतपथ ब्राह्मण, विष्णु पुराण, भागवत पुराण, मत्स्य पुराण, कथासरित्सागर इत्यादि में भी पुरूरवा एवं उर्वशी की कथा परिवर्तित रूप में मिलती है। कथावस्तु के 5 अंक में विभक्त होने तथा नायक-नायिका का मानवीय एवं दैवीय कोटियों से सम्बन्ध होने के कारण शास्त्रीय शब्दावली में इसे ‘त्रोटक’ कहा जाता है। किन्तु सभी अंकों में विदूषक की उपस्थिति न होने के कारण कुछ विद्वान इसे त्रोटक नहीं मानते हैं।
राजकीय प्रेमदवन में उनका पुनर्मिलन होता है। उर्वशी द्वारा लिखे गए भोजपत्र को रानी औशनरी प्राप्त कर लेती है तथा राजा पर क्रोध करती है। उधर स्वर्गलोक में ‘लक्ष्मी स्वयंवर’ नामक नाटक में अभिनय करती हुई उर्वशी ‘पुरुशोत्तम’ के स्थान पर ‘पुरूरवा’ नाम उच्चरित करने के कारण स्वर्गलोक से निकाल दी जाती है। रानी औशनरी पुरूरवा को उर्वशी के साथ विवाह की अनुमति प्रदान करती है। कुछ समयोपरान्त गन्धमादन पर्वत पर उर्वशी एवं पुरूरवा विहार हेतु जाते हैं। पुरूरवा द्वारा गन्धर्व-कन्या को निहारने से खिन्न उर्वशी कुमारवन में प्रवेश कर लतारूप में परिणत हो जाती है। राजा प्रिया-विरह में विलाप करता है।
5. अभिज्ञानशाकुन्तलम्
यह नाटक कालिदास की समस्त रचनाओं में सर्वोत्कृष्ट है। इसके विषय में कहा गया है ‘काव्येशु नाटक’ रम्यं, तत्र रम्या शकुन्तला’। इस नाटक में सात अंक है। दुश्यन्त एवं शकुन्तला सम्बन्धी कथा ‘महाभारत’ के ‘आदिपर्व’ के ‘शाकुन्तलोपाख्यान’ में तथा ‘पद्म पुराण’ के ‘स्वर्गखण्ड’ में प्राप्त होती है। महाकवि ने महाभारत की नीरस कथावस्तु को अपनी अद्वितीय प्रतिभा के सामथ्र्य से नए रूप में प्रस्तुत कर संस्कृत साहित्य को समृद्ध किया है। इसकी कथावस्तु केवल नायक-नायिका के प्रणय एवं मिलन तक ही सीमित नहीं है। अपितु यह मानव जीवन यात्रा का सम्पूर्ण वृत्तान्त है। नाटक का आरम्भ दुश्यन्त के मृगया प्रेम से हुआ है। पुरूवंशी राजा दुश्यन्त शिकार करते हुए महर्षि कण्व
के आश्रम में प्रवेश करता है। वहाँ ऋषि कन्या शकुन्तला के रूप सौन्दर्य को देखकर मुग्ध हो जाता है। शकुन्तला अप्सरा मेनका तथा ऋषि विश्वामित्र की कन्या है इस रहस्योद्घाटन के पश्चात् राजा शकुन्तला से गान्धर्व विवाह करता है। विवाहोपरान्त राजा शकुन्तला को अपनी नामांकित अंगूठी देते हुए उसे शीघ्र बुलाने का आश्वासन देकर राजधानी लौट जाता है।
जब महर्षि कण्व को शकुन्तला के विवाहित एंव गर्भवती होने की सूचना प्राप्त होती है तब वह शकन्तला को पतिगृह भेज देते हैं किन्तु दुर्वासा के शाप के कारण राजा शकुन्तला सम्बन्धी समस्त वृत्तान्त को भूल जाता है तथा ऋशिकुमारों एवं गौतमी के साथ आयी हुई शकुन्तला का परित्याग कर देता है। तत्पश्चात् परित्यक्त शकुन्तला महर्शि मारीच के आश्रम में जीवन व्यतीत करती है। इधर हस्तिनापुर में धीवर के माध्यम से अंगूठी प्राप्त करने के पश्चात् राजा को सम्पूर्ण वृत्तान्त स्मरण हो जाता है। अन्तत: महर्षि मारीचा के आश्रम में पुत्र सर्वदमन सहित शकुन्तला के साथ राजा का पुनर्मिलन होता है।
- हरिदत्त एवं द्विवेदी, डॉ0 शास्त्री शिवबालक, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, पृ0 सं0 5 (4)
- H.C.P. Chauchari, Political History of Ancien India, Page 317
- ए0 बी0 कीथ, संस्कृत ड्रामा, पृ0 सं0 50 (7)
- एपीग्राफिया इण्डिया, भाग-7 और 18 2 रमाशकर तिवारी, पूर्वोक्त, पृ0 सं0 13-17 3 ‘अरिपुरे’ परकलत्र कामुक कामिनी वेश उदय दिति निवासी, रमाशंकर तिवारी, पूर्वोक्त, पृ0 सं0 15
- काल श्री साहसांकस्य के न संस्कृतवादिन: भोजदेव, सरस्वती कण्ठाभरण, 2/15 2 उदय नारायण गुप्तसम्राट और उनका काल, पृ0 सं0 242 3 चन्द्रबली पाण्डेय, कालिदास, पृ0 सं0 13-14 (9)
- बुद्ध प्रकाश, स्टडीज इन इण्डिया हिस्ट्री एण्ड सिविलाइजेशन, पृ0 सं0 390-94 (11)
- डॉ0 वासुदेव, गुप्त साम्राज्य का इतिहास- पृ0 सं0 4 2