अनुक्रम
मानव प्रकृति के संबंध में पूर्वकल्पनायें-
प्राय: प्रत्येक मनोवैज्ञानिक ने मानव स्वभाव के संबंध में अपनी कुछ धारणाओं, मान्यताओं का प्रतिपादन किया है। अत: मानव प्रकृति के संबंध में एरिक्सन की भी कतिपय (कुछ) पूर्वकल्पनाये अर्थात् मान्यतायें है। जिनसे हमें उनके व्यक्तित्व सिद्धान्त को समझने में काफी हद तक सहायता मिलती है। तो आइये, जाने कि एरिक्सन की मानव स्वभाव के संबंध में क्या-क्या धारणायें है? इनका विवेचन है-
- एरिक्सन ने मानवीय प्रकृति में तीन तत्वों को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना हैं, जो है-
- पूर्णतावाद
- पर्यावरणीयता
- परिवर्तनशीलता
- एरिक्सन ने मानव प्रवृति के कुछ अन्य पक्षों जैसे कि वस्तुनिष्ठता अग्रलक्षता निर्धार्यता ज्ञेयता विषम स्थिति को अपने सिद्धान्त में अन्य पहलुओं की अपेक्षा कम महत्व प्रदान किया है। ने अपना ध्यान मूल रूप् से इस बात पर केन्द्रित किया है कि अहं का विकास किस प्रकार से होता है तथा इसके कार्य क्या-क्या है? अहं के विकास एवं कार्यों से उपाहं (id) तथा पराहं (Super igo) के विकास कार्यों के संबंध न के बराबर है। वस्तुत: के सिद्धान्त की मूल मान्यता यह है कि मानव मानवीय व्यक्तित्व कर्इ अवस्थाओं से गुजरकर विकसित होता है और ये अवस्थायें शाश्वत एवं पहले से निश्चित होती है। इतना ही नहीं विकास की ये अवस्थायें विशिष्ट नियम द्वारा संचालित एवं नियंत्रित होती है जिसे पश्चजात नियम (Epigenetic puincipte) कहते है।
मनोसामाजिक अहं विकास की अवस्थाओं की विशेषतायें-
- मनोसामाजिक विकास की अवस्था की प्रथम महत्त्वपूर्ण विशेषता “संक्रान्ति” है। संक्रान्ति का अर्थ है- प्राणी के जीवन का एक ऐसा टर्निंग पाइन्ट (Turning paint) जो उस स्थिति में व्यक्ति की जैविक परिपक्वता एवं सामाजिक माँग दोनों के बीच अन्त: क्रिया होने के कारण उत्पन्न होता है।
- प्रत्येक मनोसामाजिक संक्रान्ति में सकारात्मक (धनात्म) तथा नकारात्मक (ऋणात्मक) तत्व दोनों ही विद्यमान होते है। प्रत्येक अवस्था में जैविक परिपक्वता एवं नयी-नयी सामाजिक माँगों के कारण द्वन्द्व होना स्वाभाविक ही है यदि व्यक्ति इस द्वन्द्व से बाहर निकल आता है तो उसका व्यक्तित्व स्वस्थ रूप से विकसित होता जाता है और इसके विपरीत यदि वह इस समस्या का समाधान नही कर पाता है तो व्यक्तित्व का विकास अवरूद्ध हो जाता है तथा व्यक्तित्व संबंधी कर्इ विकार उत्पन्न हो जाते है।
- व्यक्ति को प्रत्येक मनोसामाजिक विकास की अवस्था की संक्रान्ति का समाधान करना चाहिये क्योंकि ऐसा न होने पर अगली अवस्था में व्यक्ति के व्यक्तित्व का सुनियोजित एवं उत्त्म तरीके से विकास नहीं हो पाता है। जब व्यक्ति संक्रान्ति का समाधान कर लेता है तो उसमें एक विशिष्ट मनोसामाजिक शक्ति उत्पन्न होती है। इस शक्ति को ने सदाचार कहा है।
- मनोसामाजिक विकास की प्रत्येक अवस्था में तीन आर होते है है जिन्हें तीन आर (Eripson three R’s) की संज्ञा दी गर्इ है। ये तीन आर (R) हैं- अ. कर्मकांडता (Ritualization) ब. कर्मकांड (Ritual) स. कर्मकांडवाद (Ritualism)
- कर्मकांडता (Ritualization)- एरिक्सन के अनुसार कर्मकांडता का अर्थ है- “ समाज के व्यक्तियों के साथ सांस्कृतिक रूप से स्वीकार किये गये तरीके से व्यवहार या अन्त: क्रिया करना।”
- कर्मकांड (Ritual) – कर्मकांड का अर्थ है-” वयस्क लोगों के समूह द्वारा आवृत्ति स्वरूप की मुख्य घटनाओं को दिखाने के लिये किये गये कार्य।”
- कर्मकांडवाद (Ritualism) – कर्मकांडता में जो विकार उत्पन्न होता है उसे एरिक्सन ने कर्मकांडवाद का नाम दिया है। इसमें प्राणी स्वयं अपने ऊपर ध्यान केन्द्रित करता है।
- प्रत्येक मनोसामाजिक अवस्था का निर्माण उससे पूर्व की स्थिति में हुये विकासों से संबंध रखता है। इस प्रकार, आपने जाना कि मनोसामाजिक विकास की अवस्थाओं की कुछ महत्त्वपूर्ण विशेषतायें है, जिनको समझने के बाद हम एरिक्सन ने व्यक्तितव के विकास की जो अवस्थायें बतायी है, उनको आसानी से समझ सकते हैं।
मनोसामाजिक विकास की अवस्थायें-
- शौशवावस्था: विश्वास बनाम अविश्वास (infancy: trust versus mistrust)
- प्रारंभिक बाल्यावस्था: स्वतंत्रता बनाम लज्जाशीलता (Early childhood: Autonomy versus shame)
- खेल अवस्था: पहल शक्ति बनाम दोषिता (play age: initiative versus gailt)
- स्कूल अवस्था: परिश्रम बनाम हीनता (school age: indurtriy versus injerioritg)
- किशोरवस्था: अहं पहचान बनाम भूमिका संभ्रान्ति (Adolescence: Ego identity versus role canfusion)
- तरूण वयस्कावस्था: घनिष्ठ बनाम विलगन (Early adulthood: intimacy versus isolation)
- मध्यवयस्कावस्था: जननात्मक्ता बनाम स्थिरता (middle adulthood: Genetatility versus stagnation)
- परिपक्वतारू अहं सम्पूर्णता बनाम निराशा (maturity: Ego integlity versus despair)
1. शौशवावस्था: विश्वास बनाम अविश्वास-
एरिक्सन के अनुसार मनोसामाजिक विकास की यह प्रथम अवस्था है, जो क्रायड के मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त की व्यक्तित्व विकास की प्रथम अवस्था मुख्यावस्था से बहुत समानता रखती है। एरिक्सन की मान्यता है कि शौशवावस्था की आयु जन्म से लेकर लगभग 1 साल तक ही होती है। इस उम्र में माँ के द्वारा जब बच्चे का पर्याप्त देखभाल की जाती है, उसे भरपूर प्यार दिया जाता है तो एरिक्सन के अनुसार बच्चे में सर्वप्रथम धनात्मक गुण विकसित होता है। यह गुण है- बच्चे का स्वयं तथा दूसरों में विश्वास तथा आस्था की भावना का विकसित होना। यह गुण आगे चलकर उस बच्चे के स्वस्थ व्यक्तित्व के विकास में योगदान देता है, किन्तु इसके विपरीत यदि माँ द्वारा बच्चे का समुचित ढंग से पालन-पोषण नहीं होता है, माँ बच्चे की तुलना में दूसरे कार्यों तथा व्यक्तियों को प्राथमिकता देती है तो इससे उस बच्चे में अविश्वास, हीनता, डर , आशंका, र्इष्र्या इत्यादि ऋणात्मक अहं गुण विकसति हो जाते हैं, जो आगे चलकर उसके व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करते है। एरिक्सन का मत है कि जब शैशवास्था में बच्चा विश्वास बनाम अविश्वास के द्वन्द्व का समाधान ठीक-ठीक ढंग से कर लेता है तो इससे उसमें “आशा” नामक एक विशेष मनोसामाजिक शक्ति विकसित होती है।
2.प्रारंभि बाल्यावस्था: स्वतंत्रता बनाम लज्जाशीलता-
3. खेल अवस्था: पहलशक्ति बनाम दोषिता-
मनोसामाजिक विकास की यह तीसरी अवस्था क्रायड के मनोलैंगिक विकास की लिंगप्रधानवस्था से मिलती है। यह स्थिति 4 से 6 साल तक की आयु की होती है। इस उम्र तक बच्चे ठीक ढंग से बोलना, चलना, दोड़ना इत्यादि सीख जाते है। इसलिये उन्हें खेलने-कूदने नये कार्य करने, घर से बाहर अपने साथियों के साथ मिलकर नयी-नयी जिम्मेदारियों को निभाने में उनकी रूचि होती है। इस प्रकार के कार्य उन्हें खुशी प्रदान करते है। और उन्हें इस स्थिति में पहली बार इस बात का अहसास होता हघ्ै कि उनकी जिन्दगी का भी कोर्इ खास मकसद या लक्ष्य है, जिसे उन्हें प्राप्त करना ही चाहिये किन्तु इसके विपरीत जब अभिभावकों द्वारा बच्चों को सामाजिक कार्यों में भाग लेने से रोक दिया जाता है अथवा बच्चे द्वारा इस प्रकार के कार्य की इच्छा व्यक्त किये जाने पर उसे दंडित किया जाता है तो इससे उसमें अपराध बोध की भावना का जन्म होने लगती है।
4. स्कूल अवस्था: परिश्रम बनाम हीनता-
5. किषोरावस्था: अहं पहचान बनाम भूमिका संभ्रान्ति-
6. तरूण वयास्कावस्था: घनिष्ठ बनाम विकृति-
7. मध्य वयास्कावस्था जननात्मका बनाम स्थिरता-
8. परिपक्वता: अहं सम्पूर्णता बनाम निराशा-
एरिक्सन के सिद्धान्त का मूल्यांकन-
गुण-
- समाज एवं व्यक्ति की भूमिका पर बल- एरिक्सन के व्यक्तित्व सिद्धान्त की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इन्होंने व्यक्तित्व के विकास एवं संगठन को स्वस्थ करने में सामाजिक कारकों एवं स्वयं व्यक्ति की भूमिका को समान रूप से स्वीकार किया है।
- किशोरवस्था को महत्त्वपूर्ण स्थान- एरिक्सन ने मनोसामाजिक विकास की जो आठ अवस्थायें बतायी है उनमें किशोरावस्था को अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। एरिक्सन के अनुसार किशोरावस्था व्यक्तित्व के विकास की अत्यन्त संवंदनशीलत अवस्था होती है। इस दौरान अनेक महत्त्वपूर्ण शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक परिवर्तन होते हैं जबकि क्रायड ने अपने मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त में इस अवस्था को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया था।
- आशावादी दृष्टिकोण- एरिक्सन के व्यक्तित्व सिद्धान्त की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इनके सिद्धान्त में आशावादी दृष्टिकोण की झलक मिलती है। एरिक्सन का मानना है कि प्रत्येक अवस्था में व्यक्ति की कुछ कमियाँ एवं सामथ्र्य होती है। अत: व्यक्ति यदि एक अवस्था में असफल हो गया तो इसका आशय यह नहीं है कि वह दूसरी अवस्था में भी असफल ही होगा, क्योंकि खामियों के साथ-साथ सामथ्र्य भी विद्यमान है, जो प्राणी को निरन्तर आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करती है।
- जन्म से लेकर मृत्यु तक की मनोसामाजिक घटनाओं को शामिल करना- एरिक्सन ने अपने सिद्धान्त में व्यक्तित्व के विकास एवं समन्वय की व्याख्या करने में व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक की मनोसामाजिक घटनाओं को शामिल किया है, जो इसे अन्य सिद्धान्तों से अत्यधिक विशिष्ट बना देता है।
दोष-
आलोचकों ने एरिक्सन के व्यक्तित्व सिद्धान्त की कुछ बिन्दुओं के आधार पर आलोचना की है, जिन्हें हम निम्न प्रकार से समझ सकते है-
- आवश्यक्ता से अधिक आशावादी दृष्टिकोण- कुछ आलोचकों का कहना है कि एरिक्सन ने अपने सिद्धान्त में जरूरत से ज्यादा आशावादी दृष्टिकोण अपनाया है।
- क्रायड के सिद्धान्त को मात्र सरल करना- कुछ आलोचक यह भी मानते है कि एरिक्सन कोर्इ नया सिद्धान्त नहीं दिया वरन् उन्होंने क्रायड के मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त को मात्र सरल कर दिया है।
- प्रयोगात्मक समर्थन का अभाव- कुछ आलोचकों का यह भी मानना है कि एरिक्सन ने अपने व्यक्तित्व सिद्धान्त में जिन तथ्यों एवं सप्रत्ययों का प्रतिपादन किया है, उनका आधार प्रयोग नहीं है, मात्र उनके व्यक्तिगत निरीक्षण ही हैं। अत: उनमें व्यक्तिगत पक्षपात होने की अधिक संभावना है। इन तथ्यों में वैज्ञानिका एवं वस्तुनिष्ठता का अभाव है।
- सामाजिक परिवेश से प्रभाविक हुये बिना भी व्यक्तित्व विकास संभव- कुछ आलोचकों का मानना है कि एरिक्सन की यह धारणा गलत है कि बदलते हुये सामाजिक परिवेश के साथ जब व्यक्ति समायोजन करता है, तब ही एक स्वस्थ व्यक्तित्व का विकास संभव है। आलोचकों के अनुसार कुछ ऐसे उदाहरण भी उपलब्ध है, जब व्यक्ति स्वयं सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित नहीं हुये और उन्होंने अपने विचारों से समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दिये और उन्होंने अपने व्यिक्त्त्व का उत्तम एवं अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ तरीके से विकास किया।
- अंतिम मनोसामजिक अवस्था की व्याख्या अधूरी एवं असन्तोष प्रद- शुल्ज का मानना है कि एरिक्सन के व्यक्तित्व सिद्धान्त की अंतिम आठवीं अवस्था परिपक्वता :अहं सम्पूर्णता बनाम निराशा अधूरी एवं असन्तोषप्रद है। इस अवस्था में व्यक्तित्व में उतना संतोषजनक विकास नहीं होता है, जितना एरिक्सन ने बताया है।