अनुक्रम
उद्यमिता की परिभाषा
एक सफल उद्यमी की विशेषताएँ
1. पहल क्षमता-एक उद्यमी में नवप्रवर्तन की प्रवृति, अवसर पकडने तथा पहल शुरू करने
की क्षमता होनी चाहिए। यदि वह सही समय पर उचित पहल नही करेगा/करेगी
तो अवसर हाथ से निकल जायेगा। अत: उद्यमी की पहल करने की क्षमता ही
काफी हद तक उद्यम की सफलता की कुँजी है।
बाजार, उपभोक्ता की रूचि, तकनीक आदि का विस्तृत ज्ञान होना चाहिए। यदि
इस सबका उचित ज्ञान नही है तो उसने जो निर्णय लिये हैं वह घटिया स्तर के
होंगें तथा आगे भविष्य में व्यवसाय की लाभ प्रदता में उनका योगदान नही होगा।
होता है। विभिन्न प्रकार के जोखिम एवं अनिश्चितताओ से कुशलता पूर्वक निपटने
के लिए उद्यमी में जोखिम उठाने की तत्परता एवं आवश्यक दूरदर्शिता होनी
चाहिए।
आशावादी सोंच होनी चाहिए जिसमे कि वह व्यवसायिक पर्यावरण में परिवर्तनों का
पूर्वानूमान लगा सके तथा बिना समय खोए कार्यवाही कर सके।
चाहिए। उसे व्यवस्था में आ रहे परिवर्तनो के अनुरूप ढालने के लिए स्वयं तैयर
रहना चाहिए। यदि वह परिवर्तन का विरोध करता है और उसकी प्रतिक्रिया में
देरी होती है तो वह अवसरों के लाभ उठाने के अवसर खो देगा।
चाहिए। तभी व ह सफल उद्यमी बन सकता है ।
अन्दर आत्म-अनुशासन, बुध्दिमता, न्यायप्रियता, सम्मान एवं गौरव आदि विशिष्टताओ
के साथ उसमे इन सबके उपर उच्च स्तर की नैतिकता का होना आवश्यक है।
न कोई समस्या आती ही रहती है। व्यवसायी को इनके प्रति सचेत रहना होता है
तथा अतिशीघ्र उनका समाधान भी ढूँढना होता है। इसके लिए उद्यमी को कड़ा
परिश्रम करना होगा।
उद्यमिता के सिद्धांत
1. उद्यमिता के आर्थिक सिद्धांत
2. उद्यमिता के समाजशास्त्रीय सिद्धांत
3. उद्यमिता के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत
4. उद्यमिता के एकीकृत सिद्धांत
- टी0वी0 राव के सिद्धांत
- बी0एस0 वैन्कट राव के सिद्धांत
उद्यमी के कार्य
1. विचार सृजन-उद्यमी में सृजनात्मक मस्तिष्क होता है। उसमें व्ययवसायिक अवसरों की पहचान करने, उन्हे एक सफल व्यावसायिक उद्यमी में परिवर्तित करने तथा उन्हे मूर्त रूप प्रदान करने की योग्यता होती हैं।
छोटे व्यवसाय की स्थापना का ही जोखिम उठाता है। लेकिन वर्तमान में कई
उद्यमी ऐसे हैं जिन्होने बडी-बडी कम्पनियो के प्रवर्तन का कार्य किया है। वास्तव
में नयें व्यवसाय की स्थापना, वर्तमान व्यवसाय का छोटे अथवा बडे पैमाने पर
विस्तार अथवा दो या दो से अधिक इकाइयों के समिश्रण में भी प्रवर्तन किया जा
सकता है। एक पव्रतर्क के रूप में उद्यमी सम्भावनाओ का अध्ययन करता है, सगंठन
के प्रारूप के सम्बन्ध में निर्णय लेता है, आवश्यक कोष एवं मानव संसाधन जुटाता
है, तथा व्यवसाय के प्रस्ताव को मूर्तरूप प्रदान करता है।
उत्पादों एवं बाजारों को विकसित करने की कोशिश करता है। उद्यमी अपनी
सृजनात्मक योग्यताओं का प्रयोग कर कुछ नया करता है तथा बाजार में
उपलब्ध अवसरों का लाभ उठाता है।
होती है। यह उद्यमी ही होता है जो जोखिम को उठाता है तथा भविष्य की अदृश्य
स्थितियों के कारण होने वाली हानियों को वहन करने के लिए तैयार रहता है।
उद्यमी ही किसी व्यवसाय को प्रारंभ करने के लिए प्रारम्भिक पूंजी की व्यवस्था
करता है जिसे जोखिम पूंजी अथवा मूल पूंजी भी कहते है ।
पदों के लिए उपयुक्त व्यक्तियों की भर्ती करनी होती है।
उद्यमियों के समक्ष आने वाली समस्याएं
1. व्यवसाय का चयन-व्यवसाय चयन के लिए सर्वप्रथम बाजार का अध्ययन करना होता है कि क्या उसके उत्पाद अथवा सेवा को बाजार में ग्राहक पसंद करेगा, कितनी मांग होगी, लागत क्या होगी, लाभप्रद होगा अथवा नहीं। इसे संभाव्यता अध्ययन कहते है तथा इसे संभाव्यता रिपोर्ट अथवा परियोजना रिपोर्ट के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसी के आधार पर सर्वाधिक लाभ देने वाली व्यवसाय का चयन किया जाता है।
इस प्रकार से एक नये व्यवसाय को प्रारंभ करने से पहले उद्यमी को अनेकों समस्याओं का समाधान ढूंढना होता है। उचित चयन एवं व्यवस्था की जाये तो सफलता सुनिश्चित है ।
उद्यमिता के महत्वपूर्ण उद्देश्य
- उद्यमिता की गुणवत्ता को विकसित एवं सुदृढ़ करना;
- उपयुक्त उत्पादों का चयन एवं सुसाध्य परियोजनाओं को तैयार करना;
- व्यक्तियों को छोटे व्यवसायों की स्थापना एवं परिचालन में निहित प्रक्रिया
एवं कार्यवाही से परिचित कराना; - रोजगार के अवसरों में वृद्धि करना;
- व्यावसायिक जोखिम की चुनौतियों का सामना करने के लिए उद्यमियों को
प्रशिक्षित करना एवं तैयार करना; - व्यवसाय के बारे में उद्यमी के दृष्टिकोण को व्यापक बनाना एवं कानून की
सीमाओं के भीतर उसके विकास में सहायता करना। - देश के प्रत्येक राज्य एवं क्षेत्र का विकास करने हेतु।
उद्यमिता की आवश्यकता एवं महत्व
- सफल इकाई की स्थापना-सफल इकाई की स्थापना केवल सफल उद्यमी ही कर सकते हैं। सफल इकाइयों की स्थापना के लिए उद्यमिता का प्रशिक्षण एवं विकास आवश्यक है।
- संतुलित आर्थिक विकास-उद्यमिता देश में संतुलित आर्थिक विकास एवं पिछड़े क्षेत्रों का विकास को बढ़ावा देती है ।
- उपलब्ध संसाधनों का सर्वोतम उपयोग-उद्यमी ही कर सकता है। इससे बहुमूल्य धातुओं का भण्डारों का उचित विदोहन होगा व लोगों को रोजगार की प्राप्ति होगी ।
- आत्मनिर्भरता के लिए-उद्यमिता से उत्पादन, व्यापार, व विपणन को बढ़ावा मिलता हैं इससे व्यक्ति, समाज व राष्ट्र की आय में वृद्धि होती हैं। जिससे आत्मनिर्भरता बढ़ती है।
- आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं को कम करने के लिए-उद्यमिता से लोगों की आय व शिक्षा का स्तर बढ़ती है जिसमे सामाजिक अपराध एवं गरीबी में विराम लगने से सामाजिक समस्याएँ कम होती है।
- औद्योगिक वातावरण विकसित करने के लिए-देश में औद्योगिक वातावरण विकसित करने के लिए उद्यमिता विकास आवश्यक है ।
- ग्लोबल महत्व-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का पहचान बढ़ावा के लिए देश में उद्यमिता को प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है ।
- अन्य- 1. उद्यमी प्रवृतियाँ विकसित करने के लिए 2. नवप्रर्वतन के लिए 3. रोजगार के अवसरो में वृद्धि के लिए
उद्यमियों के प्रकार
1. व्यवसाय के प्रकार के अनुसार –
- व्यापारी उद्यमी
- औद्योगिक उद्यमी
- कृषि उद्यमी
- सेवा उद्यमी
2. तकनीकी उपयोग के अनुसार –
- तकनीकी उद्यमी
- गैर-तकनीकी उद्यमी
3. क्षेत्र के अनुसार –
- शहरी उद्यमी
- ग्रामीण उद्यमी
4. लिंगानुसार –
- पुरूष उद्यमी
- महिला उद्यमी
