अनुक्रम
अर्थात् आयुर्वेद का निर्माण धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिए ही किया गया है। यह कहा जा सकता है कि योग और आयुर्वेद दोनों मानव जीवन के समान सिद्धान्त पर आधारित है।
कुछ विद्वानों का मत है आयुर्वेद, योग तथा व्याकरणशास्त्र ये तीनों विद्याएं क्रमश: शरीर, मन एवं वाणी की शुद्धि के लिए अलग-अलग एक ही आचार्य द्वारा विकसित की गयी। आयुर्वेद का प्रमुख आदि ग्रन्थ चरक संहिता, पातंजल योगसूत्र तथा व्याकरण महाभाष्य ये तीनों एक ही व्यक्ति या सम्प्रदाय द्वारा लिखे गये हो, ऐसी कुछ लोगों की मान्यता है।
चरकसंहिता-सूत्रस्थान के प्रथम श्लोक की व्याख्या करते समय टीकाकारों की निम्नलिखित उक्ति ध्यान देने योग्य है-
आयुर्वेद के मूल ग्रन्थों विशेषत: चरकसंहिता के अध्ययन से प्रतीत होता है कि योगविद्या का सिद्धान्त तथा सारांश आयुर्वेद में पहले से ही उपलब्ध है। चरकसंहिता के शरीरस्थान में नैष्ठिकी चिकित्सा के प्रसंग में तत्त्वज्ञान तथा तत्त्वानुभूति मूलक योग विद्या तथा ‘प्रज्ञा का सत्याबुद्धि के रूप में सुस्पष्ट वर्णन है। इन्हीं विषयों का और क्रमबद्ध विकसित वर्णन पतंजलि के योगसूत्र में मिलता है।
इस प्रकार योग और आयुर्वेद की संहिताएॅ भी शारीरिक रोगों के लक्षण एवं उनकी चिकित्सा के साथ-साथ व्यक्ति के मानसिक तथा आध्यात्मिक भावों का भी विवेचन करती है।
योग का लक्षण करते हुए चरक कहते हैं कि आत्मा, इन्द्रिय, मन तथा अर्थों के सन्निकर्ष से सुख-दु:ख की उत्पत्ति होती है। जब मन आत्मा के साथ स्थित होकर निश्चल हो जाता है तब सुख-दु:ख का आरम्भ नहीं होता। तब आत्मा वशी कहलाता है। आत्मा के साथ शरीर भी वश में हो जाता है। उस योग सिद्धि योगी का शरीर इस लोक में रहते हुए भी उसके धर्मां से वशीभूत नहीं होता। यदि योगी शरीर जन्य वेदनाओं को न भोगना चाहे तो नहीं भोगता।
आयुर्वेद में योग के प्रकार
चरक संहिता में चार प्रकार के योग निर्दिष्ट किये गये हैं-
1. सम्यक् योग अथवा समयोग –
उचित समय पर मलादि वेग की प्रवृत्ति का होना, सामान्य कष्ट की अनुभूति का होना, क्रमश: वात-पित्त-कफ दोषों का निकलना तथा स्वयं रुक जाना अर्थात् दोषों के निरुद्ध होने पर वेगों की समाप्ति होना ये सब वमन के सम्यक् योग के लक्षण होते हैं। दोषों के प्रभाव भेद से यही सम्यक् योग तीक्ष्ण, मृदु, मध्य तीन प्रकार का समझा जाता है।
2. अयोग-
किसी कारण विशेष से वमन का होना अर्थात् वमन न होना, केवल वमन कराने के लिए जो औषधि दी गयी हो, उसी का निकल जाना अथवा वमन के वेगों का बीच मे टूट जाना या रुक जाना अयोग कहलाता है।
3. अतियोग-
इसमें लारयुक्त लालरक्त की कणिकाओं से युक्त वमन होता है अथवा रक्त भी निकल जाता है तो अतियोग कहलाता है।
4. हीनयोग या मिथ्यायोग –
दोषयुक्त, सड़ी-गली, अधिक समय तक रखी गयी, जली, सुखी, अधिक आदर््र वस्तु आहार आदि का सेवन अथवा स्नान, वस्त्र आदि का ऋतु के विपरीत सेवन करने से रोग या व्याधि की सम्भावना रहती है। अब यहाँ आयुर्वेद में योग के स्वरूप का वर्णन किया जा रहा है। चरक संहिता में अष्टांग योग की भॉति अष्ट स्थानों मे विभाजन कर आयुर्वेद का क्रमिकज्ञान अवश्य कराया गया है। चतुष्पाद वैदिक शैली पणिनि कृत अष्टाध्यायी में भी उपलब्ध होती है, चरकसंहिता में भी इस शैली की छाया प्रतीत होती है। सूत्र स्थान और चिकित्सा स्थान में अधिकतम 30-30 अध्याय, इन्द्रिय, काय व सिद्धि स्थान में 12-12 तथा निदान, विमान एवं शारीर स्थान में 8-8 अध्यायों का समावेश किया गया है। सूत्र स्थान में 4-4 अध्यायों के सात चतुष्क तथा अन्तिम दो अध्याय संग्रहाध्याय कहे गये हैं। यथा- 1. औषधचतुष्क. 2. स्वास्थ्यचतुष्क. 3. निर्देश चतुष्क. 4. कल्पना चतुष्क. 5. रोगचतुष्क. 6 योजनाचतुष्क. 7. अनुपान चतुष्क तथा 8. अष्टम में संग्रहाध्यायद्वय का समावेश है।
चरक ने मौलिकसिद्धान्त तथा कायचिकित्सा का विशिष्ट प्रतिपादन किया है। संसोधन चिकित्सा पर भी विशेष बल दिया है। जिसका वर्णन दो स्वतन्त्र स्थानों (कल्प और सिद्धि) में किया गया है। इन्द्रिय स्थान में अरिष्टक्षणों का भी शरीर स्थान में प्रमुख रूप से दर्शन का प्रतिपादन किया गया है तथा शरीर रचना गौण विषय हो गयी है। इससे स्पष्ट होता है कि चरकसंहिता आयुर्वेद का मौलिकसिद्धान्त और कायचिकित्सा का प्रमुख उपजीव्य ग्रन्थ है।
आयुर्वेद की संहिताएॅ शारीरिक रोगों के लक्षण एवं उनकी चिकित्सा के साथ-साथ मनो-आध्यात्मिक भावों का भी विवेचन करती है।
आयुर्वेद में वर्णित सद्वृत्त एवं आचाररसायन
यम-नियम निरुपण – सद्वृत्त –
मन, वाणी और शरीर से किसी भी प्राणी को किसी प्रकार का दु:ख न देना अहिंसा कहलाता है। हिंसा तम का द्योतक है, यह अभिघात और प्रतिरोध को उत्पन्न करने वाला होता है। आयुर्वेद में उसे पापकर्म बताकर त्यागने के लिए कहा गया है। इसे सद्वृत्त के रूप में वर्णित किया गया है तथा रसायन सेवन से पूर्व भी एवं आचाररसायन के अन्तर्गत अहिंसा का वर्णन किया गया है।
आयुर्वेद में आचार रसायन में सर्वप्रथम सत्यवादिनम् ही कहा गया है अर्थात् सर्वदा सत्य बोलना चाहिए। सद्वृत्त में झूठ न बोलने के लिए कहा गया है।
अस्तेय का अर्थ होता है- चोरी न करना। जब व्यक्ति में चोरी के अभाव अर्थात् चोरी न करने की प्रवृत्ति जागृत हो जाती है तब उसके सामने समस्त रत्न स्वयं प्रकट होने लगते हैं।
आचार्य वाग्भट् ने स्तेय को दशविध पापकर्म के अन्तर्गत बताया है और शरीर, मन एवं वाणी से त्यागने के लिए कहा गया है। जीवन के तीन उपस्तम्भों में ब्रह्मचर्य की गणना की गर्इ है। आचाररसायन में मद्य एवं मैथुन से निवृत्त रहने के लिए बताया गया है। ज्वरचिकित्सा में आचार्य चरक ने कहा है कि ब्रह्मचर्य के द्वारा ज्वर से छुटकारा मिलता है। “ब्रह्मचर्येण ज्वरात् प्रमुच्यते।” (च0 चि0 3)। योगसूत्र में कहा गया है कि ब्रह्मचर्य पर दृढ़ होने पर वीर्य लाभ एवं अपूर्व शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। “ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभ:।” (यो0 सू0 2/38)। जीवन में सदैव स्वस्थ रहने के लिए मनुष्य को मन, वचन तथा कर्म की पवित्रता आवश्यक होती है। अत: प्रत्येक मनुष्य के लिए स्वस्थ वृत्त के पालन का उपदेश चरक ने किया है। चरक का वचन है कि सौम्य बुद्धि, मधुर वचन, सुखकारक कर्म, निर्मल तथा पापरहित बुद्धि, विवेक, तप तथा यम-नियम प्राणायाम आदि योग का सदैव सेवन करने वाले मनुष्य को कोर्इ भी शारीरिक तथा मानसिक रोग से कष्ट नहीं होता।
चिकित्सा चतुष्पाद के सन्दर्भ में आचार्य चरक ने उत्तम वैद्य के चार गुणों में शौच को एक प्रधान गुण माना है। शौच से कायिक, वाचिक एवं मानसिक शुद्धता का अभिप्राय है। आयुर्वेदशास्त्र में भी दो प्रकार के शुद्धि का वर्णन किया गया है। इन्हें योगी जन बाह्य शौच एवं आन्तरिक शौच के नाम से ग्रहण करते हैं।
आयुर्वेद में बाह्य शुद्धि के लिए अंग प्रक्षालन, स्नान, दन्तधावन कवलग्रह, गण्डुष आदि कर्म बताए गए हैं और आभ्यन्तर शुद्धि सामाजिक एवं मानसिक स्तर, धी-स्मृति का ज्ञान, व्यवहार आदि से लेते हैं। चरकसूत्र संहिता में शरीर में उपस्थित वात-पित्त-कफ दोषों को संतुलन बनाए रखने तथा शोधन के लिए पंचकर्म (स्नेहन-स्वेदन-वमन- विरेचन-वस्ति) का विवेचन किया गया है।
लोल्य को कष्ट उत्पन्न करने वालों में श्रेष्ठ कहा गया है। “लोल्यं क्लेशकराणां श्रेष्ठम्।” (च0 सू0 25)। यह सन्तोषवृत्ति का विपरीतार्थक है। उसे धारणीय वेगों की गणन में भी गिना गया है। योगसूत्र में लोल्य के विपरीत भाव सन्तोष को सर्वोत्तम सुख की संज्ञा दी गर्इ है। “सन्तोषादनुत्तमसुखलाभ:।” (यो0 सू0 2/43)
आयुर्वेद में आचाररसायन के अन्तर्गत कहा गया है कि प्रतिदिन जप, शौच, दान एवं तपस्या करनी चाहिए तथा देवता, गौ, ब्राह्मण, आचार्य एवं गुरु की सेवा में रत रहना चाहिए।
सुसाहित्य एवं आध्यात्मिक ग्रन्थों का अध्ययन स्वाध्याय है। र्इश्वर की शरणागति से योग साधन में आने वाले विघ्नों का नाश होकर शीघ्र ही समाधि निष्पन्न हो जाती है। “समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्।” (यो0 सू0 2/45)। आयुर्वेद में मानस दोष चिकित्सा के रूप में र्इश्वर का ध्यान-पूजा-पाठ बताया गया है। ज्वरादि की चिकित्सा में विष्णुसहस्रनाम जप आदि बताया गया है।
1. सामयिक सद्वृत्त –
देवता, गौ, वृद्ध, ब्राह्मण, गुरु, सिद्धाचार्यों को नमस्कार , अग्निहोत्र सेवन, पशस्त एवं अनुभूत औषध सेवन, दोनों समय स्नान, नेत्रादि इन्द्रियों की प्रतिदिन प्रात: सायं शुद्धि, केश, नख, दाढ़ी आदि का समयानुसार संमार्जन, प्रतिदिन धुले हुए सुगन्धित वस्त्रों को धारण करना, सुगन्धित पदार्थों का अनुलेपन, केशों का प्रसाधन, सिर, कान, नाक, पाद आदि में तैल मर्दन, दीनदु:खी की सहायता, निश्चिन्त, निडर, बुद्धिमान्, लज्जाशील, चतुर, धर्मपरायण, आस्तिक, सर्वप्राणियों को बन्धुतुल्य मानना, क्रुद्ध व्यक्तियों को नम्रता से शान्त करना, भयभीतों को आश्वासन देना, दीनों का उद्धार करना, सत्यवादी, शान्त, दूसरों के कठोर वचनों को सहन करने वाला, क्रोध को नाश करने वाला, शान्ति को गुण समझने वाला, राग-द्वेष के मानसिक विकारों का विनाश करने वाला होना चाहिए।
2. व्यहारिक सद्वृत्त –
बुद्धिमान् पुरुषों की सम्मति द्वारा निर्धारित नियमों का त्याग न करे, नियमों का उल्लंघन न करे, रात्रि में या अपरिचित स्थान में भ्रमण न करे, प्रात: एवं सायं सन्ध्याकाल में भोजन, अध्ययन, शयन या स्त्री सहवास न करे, बालक, वृद्ध, रोगी , मूर्ख, क्लेशयुक्त जीवनयापन करने वालों तथा नपुंसकों के साथ मित्रता न करे, मद्यसेवन, जुआ खेलना, वेश्यागमन आदि की इच्छा न करे, किसी की गुप्तवार्ता की व्याख्या न करें, किसी का अपमान न करे, अभिमान का त्याग करे, कार्यकुशल, उदार, असूयारहित ब्राह्मणों का सम्मान करने वाला होवे, वृद्ध, गुरुजन, गण, राजा आदि का अपमान या आक्षेप न करे, बन्धुबान्धव, मित्र वर्ग, आपत्तिकाल में सहायक तथा गोपनीय रहस्यों को जानने वाले लोगों को सदा सम्पर्क में रखें।
आयुर्वेद में वर्णित प्राणायाम
आयुर्वेद में वायु को प्राण संज्ञा प्रदान की गर्इ है।प्राणवायुु का शरीर में प्रविष्ट होना श्वास ओर बाहर निकलना प्रश्वास है। इन दोनों का विच्छेद होना अर्थात् श्वास-प्रश्वास क्रिया का बन्द होना प्राणायाम का सामान्य लक्षण है।
आयुर्वेद में वायु को आयु कहा गया है तथा वायु के द्वारा ही प्राणायाम निमेषादि क्रियाएं सम्पन्न होती हैं।
वायु प्राणायाम क्रिया का सम्पादन कराता है परन्तु योगोक्त प्राणायाम इस वायु की क्रिया से भिन्न है, वहाँ इस वायु की क्रिया पर नियन्त्रण प्राणायाम कहा गया है। आयुर्वेद में वायु को यन्त्र-तन्त्र को धारण करने वाली कही गयी है। प्राण, उदान, व्यान, समान और अपान को आत्मा का रूप कहा गया है तथा यही शरीर की सभी चेष्टाओं को नियन्त्रण एवं प्रणयन करती है। सभी इन्द्रिय को अपने विषयों में प्रवृत्त करने वाली भी यही है।
इस प्रकार वायु को शरीर एवं शरीरावयव को धारण करने वाला, चेष्टा-गति आदि का नियन्त्रण एवं प्रणयन करने वाला कहा गया है और इसी वायु की गति पर नियन्त्रण प्राणायाम शब्द से जाना जाता है।
आयुर्वेद में वर्णित ध्यान एवं समाधि
आयुर्वेद में मानस दोष की चिकित्सा के लिए धारणा, ध्यान एवं समाधि को दूसरे रूप में कहा है। आचार्य चरक ने मानस रोगों का चिकित्सासूत्र बताते समय समाधि का उल्लेख किया है। समाधि के पहले आचार्य ने ज्ञान-विज्ञान-धैर्य एवं स्मृति का उल्लेख किया है।
दूसरे स्थान पर आचार्य चरक ने कहा है कि मानस रोग उपस्थित होने पर धर्म-अर्थ एवं काम का ध्यान करना चाहिए तथा आत्मा आदि का ज्ञान अर्थात् धारणा करना चाहिए।
दूसरे आचार्यों ने भी धी-धृति एवं आत्मा का ज्ञान मानस दोष की चिकित्सा के लिए उत्कृष्ट औषधि बताया है। इस प्रकार आयुर्वेद में धारणा-ध्यान का धी-धृति आत्मा में चित्त को लगाने के रूप में इनका ज्ञान करने के रूप में कहा गया है तथा समाधि को उसी रूप में उसी शब्द से ग्रहण किया है।
आयुर्वेद में कर्म निरूपण
योग का एक महत्त्वपूर्ण एवं अनिवार्य अंग कर्म है। महर्षि पतंजलि जी ने योगदर्शन में इसकी पर्याप्त चर्चा की है। योगियों के कर्म अशुक्ल-अकृष्ण अर्थात् निष्काम शुभ कर्म होते है और अन्यों के सकाम शुभ, अशुभ एवं मिश्रित तीन प्रकार के होते हैं।
चरक शास्त्र के अनुसार इहलौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के कर्मों के तीन भेद हैं जो इस प्रकार है-
- सत्प्रत्यय :- जो कर्म ज्ञानपूर्वक चेष्टा द्वारा किया जाए वह सत्प्रत्यय कहलाता है, जैसे- हाथ हिलाना, ऊपर-नीचे करना होता है।
- असत्प्रत्यय :- जो कर्म बिना ज्ञानपूर्वक होता है, वह असत्प्रत्यय कर्म कहलाता है। जैसे- नेत्र की पलकों को उठाना, गिराना, शरीर में रोमांच होना, हृदय की धड़कन आदि।
- अप्रत्यय :- अचेतन पदार्थों वृक्षादि में ऋतु-अनुसार नये पत्तों का निकलना, पुष्पोद्गम, फल बीज की प्राप्ति, पतझड़ आदि। नोदन, गुुरुत्व और वेग ये तीन अप्रत्यय है। पारलौकिक कर्म के तीन भेद हैं-
- हीनकर्म – अधोगति में ले जाने वाले अशुभ कर्मों को हीन कर्म कहते हैं। यथा- असत्यभाषण, परस्त्री गमन आदि।
- उत्तमकर्म :- उत्तम लोकों में ले जाने वाले शुभ कर्मों को उत्तम कर्म कहते हैं। यथा- सत्यभाषण, परोपकार आदि उत्तम कर्म हैं।
- मध्यमकर्म :- मिश्रित फल वाले कर्म को मध्यम कर्म कहते हैं। यथा- कर्मकाण्ड, अग्निहोत्र, धन लेकर विद्याध्ययन करना, स्वास्थ्य लाभ के लिए औषधि निर्माण करना मध्यम कर्म है क्योंकि यह कर्म करने से देवता संतुष्ट होते हैं। इसलिए उत्तम लोकों की प्राप्ति कराने के कारण अग्निहोत्र भी सुख देता है।
आयुर्वेद में पंचकर्म वमन, विरेचन, स्वेदन, निरुहण और नस्य हैं। दूसरे प्रकार से तीन कर्म 1.पूर्वकर्म, 2.प्रधानकर्म तथा 3. पश्चात् कर्म हैं। चरक संिहता में विमानस्थान में कर्म का स्वरूप इस प्रकार स्पष्ट किया है।
भूमि आदि द्रव्यों का अपने गुणों के साथ अपृथक् भाव ही समवाय है। यह समवाय नित्य है। क्योंकि जहॉ द्रव्य रहता है वहॉ गुण की अनिश्चितता नहीं रहती। अर्थात् समवायिकारण रूप द्रव्य के आश्रित तथा गुणों से सम्बद्ध क्रिया, चेष्टा कर्म कहलाता है। कर्म का लक्षण चरक ने इस प्रकार किया है-
द्रव्यों के संयोग और विभाग में कर्म ही कारण है, वह कर्म द्रव्य में आश्रित रहता है। कर्त्तव्य की क्रिया को ही कर्म कहा जाता है। संयोग और विभाग के लिए कर्म के सिवा किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं रह जाती।
आयुर्वेद में प्रमाण
चरक शास्त्र में चार प्रकार के प्रमाणों का वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है-
आप्तोदेश, 2.प्रत्यक्ष, 3. अनुमान, 4.युक्तिप्रमाण।
चरक ने पुन: रोग विशेष ज्ञान हेतु आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष तथा अनुमान का स्मरण किया है।
आयुुर्वेद में पुरूष, आत्मतत्व एवं र्इश्वर निरूपण
1. पुरुष निरूपण-
पुरुष निरुपण –आयुर्वेद में चतुर्विंशति तत्त्वात्मक पुरुष को मानव की इकार्इ स्वीकार किया गया है ओर इसी को चिकित्साशास्त्र का कर्मक्षेत्र माना गया है। मन, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच इन्द्रियार्थ, अव्यक्त महत् तत्त्व, अहंकार और पंचमहाभूत- ये चौबीस तत्त्व मिलकर पुरुष की सृष्टि करते हैं। इसके अतिरिक्त पुरुष की “ाड्धात्वात्मक (पंचमहाभूत+अव्यक्त ब्रह्म) तथा धात्वात्मक (केवल एक मात्र चैतन्य युक्त अर्थात् परमात्म तत्त्व पुरुष) अवधारणा भी संदर्भ भेद से उपस्थित की जाती है।
परन्तु आयुर्वेद में सर्वात्मना मान्य पुरुष चतुर्विंशति तत्त्वात्मक राशिपुरुष ही है।
सांख्यकारिका में भी पुरुष के इसके स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है।
2. आत्मा
महर्षि पतंजलि जी के अनुसार प्राकृतिक पदार्थों के सम्मिश्रण तथा अज्ञान, अधर्म, विकारादि दोषों से रहित होता हुआ भी चित्त की वृत्तियों के अनुसार देखने वाला चेतन पदार्थ ‘जीवात्मा’ है। “दृष्टा दृशिमात्र: शुद्धोSपि प्रत्ययानुपश्य:।” (यो0 सू0 2/20)। आयुर्वेद के प्रकाण्ड मनिषी महिर्र्ष चरक ने आत्मा को अव्यक्त, क्षेत्रज्ञ, शाश्वत, विभु तथा अव्यय बताया है। यह आत्मतत्त्व निर्विकार है, परन्तु चेतन है, नित्य है, दर्शक, क्षेत्रज्ञ एवं कर्त्ता है। यही साक्षी, चेतन, पुद्गल आदि नामों से जाना जाता है।
इस प्रकार जीव में परमतत्त्व आत्मा का निवास है जिसका साक्षात्कार योग साधना द्वारा सम्भव है।
आत्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुए श्रीमद्भगवद् गीता के दूसरे अध्याय में कहा है कि यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है। क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी नहीं मारा जाता।
यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और नि:सन्देह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है।
3. र्इश्वर निरूपण
चरकसंहिता चिकित्साशास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें र्इश्वर शब्द का केवल दो स्थानों पर प्रयोग हुआ है, वह भी परमात्मा या जगत् नियन्ता के रूप में र्इश्वर शब्द का प्रयोग न होकर राजा, समर्थ या ऐश्वर्यशाली के रूप में किया गया है।
चरकसंहिता के अन्य स्थानों में भी ब्रह्म शब्द का प्रयोग जगत् नियन्ता के रूप में उपलब्ध होता है। वहाँ भी तुलनात्मक दृष्टि से कहा गया है कि जिस प्रकार लोक में ब्रह्मव्याप्त है उसी प्रकार शरीर में अन्तरात्मा की विभूति विराजमान है।
आयुर्वेद केा अथर्ववेद के उपवेद के रूप में उल्लेख किया गया है। महर्षि चरक द्वारा प्रार्थना, उपासना, नमन, भगवत्दर्शन तथा प्रभुनाम कीर्तन आदि परमात्मा सम्बन्धी कुछ नियमों के विधान का उल्लेख करने में र्इश्वर संबन्धी निष्ठा का स्वयमेव प्रदर्शन हो जाता है। वेदों में रोगनिवारण हेतु र्इश्वर प्रार्थना, यज्ञ तथा प्रभु चिंन्तन आदि का निर्देश युक्ति संगत है। इसी कारण आयुर्वेद के ग्रन्थों में र्इश्वराराधना को गम्भीरता के साथ स्वीकार किया गया है।
चरक ने अव्यक्त के रूप में कर्त्ता, विश्वकर्त्ता, ब्रह्मा आदि शब्द का प्रयोग र्इश्वर वाची रूप में प्रयोग किया है। उसने निर्विकार परमात्मा का भी वर्णन किया है। “निर्विकार: परस्त्वात्मा।” (च0 सू0 1/56) चरक का पुरुष शब्द व्यापक अर्थ वाला प्रतीत होता है, जिसने कुछ सीमा तक र्इश्वर को भी इसमें समेट लिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि चरक के समय में र्इश्वर शब्द का प्रयोग परमेश्वर या जगत् नियन्ता अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता था। योगसूत्र में र्इश्वर के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा है कि अविद्यादि पाँचों क्लेश, शुभाशुभमिश्रित विविध कर्म, कर्मों के फल सुख-दु:ख, इनके भोगों के संस्कार-वासनाएँ इन सबके सम्बन्ध से रहित जीवों से भिन्न स्वभाव वाला चेतन विशेष ‘र्इश्वर’ है।
मोक्ष निरूपण
आयुर्वेद के प्रमुख आचार्य चरक ने मोक्ष के स्वरूप का वर्णन करते हुए लिखा है कि मन में जब रज और तमोगुण का अभाव होता है तथा बलवान् कर्मों का क्षय हो जाता है तब कर्मजन्य बन्धनों से वियोग हो जाता है। उसे “अपुनर्भव” या ‘मोक्ष’ कहते हैं।
इसी प्रकार एक अन्य स्थान में इसका वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है कि महात्मापुरुषों की सेवा, यमनियमों का पालन, चान्द्रायण आदि व्रतों का सेवन, आत्मशुद्धि हेतु उपवास, धर्मशास्त्रों का अध्ययन, कामक्रोधादि का त्याग, दुष्टजनों की उपेक्षा, पुनर्जन्म या इस जन्म में किये गये कर्मों का क्षय, आश्रमों से दूर रहकर कर्मफल हेतु कर्मों का त्याग, आत्मा और शरीर के संयोग से भयभीत होना तथा बुद्धि को समाधिस्थ करने का प्रयास आदि से मोक्षप्राप्ति संभव है।
चरक का मत है कि सभी कारण बाह्यकार्य दु:खहेतु है, ये आत्मा से सम्बद्ध कार्य नहीं है, यह कार्य शून्य है और अनित्य है, आत्मा उदासीन है, अत: वे कार्य आत्मा द्वारा सम्पन्न न होकर प्रकृति के स्वभावश स्वत: होते रहते हैं। सत्यबुद्धि की उत्पत्ति तक यह भ्रम बना रहता है। ‘यह मैं’ ऐसी अहंकार बुद्धि और ‘मेरा’ यह ममत्वबुद्धि प्रकृति (माया) का प्रपंच है, जब इसका नाश नहीं होता, तब तक जीवात्मा बन्धन में फॅसा रहता है। तथा जब आत्मा सभी तत्त्वों को स्मृति द्वारा जान लेता अर्थात् सांसारिक प्रपंचों को उसे यथार्थ ज्ञान हो जाता है।
स्मृति: सत्सम्बन्धाद्यैश्च धृत्यन्ते रूप जायते।
स्मृत्वास्वाभावं भावानां विस्मरणं दु:खात् प्रमुच्यते।। च0 सं0 शा0 1/147
वही जीवात्मा तत्त्वज्ञान द्वारा कर्मबन्धन तथा क्लेशादि से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि आयुर्वेद में भी योग तत्त्वों का वणन अवश्य किया गया है। आयुर्वेद और योग दोनों का एक ही लक्ष्य मनुष्य के वर्तमान जीवन को सुखमय बनाते हुए उसे मोक्ष की प्राप्ति तक ले जाना है।