अनुक्रम
आदि शंकराचार्य का जन्म केरल के कालरी गांव में सन् 684 ई. में हुआ था, उनके पिता का नाम शिवगुरू तथा माता का नाम सती था। शंकराचार्य ने बाल्यकाल से ही सन्यास ले लिया था और वेदान्त की शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे महात्मा गोविन्दाचार्य के पास चले गए थे। शिक्षा प्राप्त करने के बाद गुरू के आदेश पर उन्होंने काशी की यात्रा की और वहां के विद्वानों को अपने ज्ञान से प्रभावित किया।
बालक शंकर बचपन से ही संसारिक जीवन से विरक्त थे और सन्यास
ग्रहण करना चाहते थे। पर माता उन्हें इसकी आज्ञा नहीं देती थी। किंवदन्ती
के अनुसार एक बार शंकर जब नदी में स्नान कर रहे थे तो एक मगर ने
उनका पैर पकड़ लिया। माता विलाप करने लगी। शंकर के यह कहने पर कि
अगर वह उन्हें सन्यास लेने की अनुमति देंगी तो मगर से उनकी प्राण-रक्षा
हो जायेगी। विवश माता ने शंकर को सन्यास की अनुमति दे दी। मगर से
शंकर ने अपने को मुक्त कर लिया।
बालक शंकर ने प्रकाण्ड वेदान्ती गोविन्दपाद या गोविन्दाचार्य का
शिष्यत्व ग्रहण कर उनसे सन्यास की दीक्षा ली। शंकर की मेधा, जिज्ञासा एवं
सेवा से संतुष्ट होकर गोविन्दपाद ने अपने प्रिय शिष्य को उपनिषदों का अर्थ
एवं भाव तथा ब्रह्म का गूढ़ रहस्य समझाया।
आत्मा, परमात्मा एवं सृष्टि के सत्य को समझने के उपरांत शंकराचार्य
वेदान्त के प्रचार-प्रसार के लिए निकल पड़े। बनारस नगरी में एक दिन प्रात:
वेला में गंगा के किनारे चार श्वानों के साथ एक चाण्डाल मिला। स्पर्श होने
के भय से शंकर ने चाण्डाल को मार्ग से हटने के लिए कहा। चाण्डाल ने
प्रश्न किया ‘‘आप किसे हटने के लिए कह रहे हैं- मेरे शरीर को या मेरी
आत्मा को? शरीर नश्वर एवं नाशवान है, आत्मा तो उसी ब्रह्म को अंश है जो
सर्वशक्तिमान है।’’ शंकर को भेद रहित ब्रह्म में भेद देखने का अहसास हुआ।
शंकर ने चाण्डाल को अपना गुरू स्वीकार किया।
शंकराचार्य में विलक्षण तर्कशक्ति थी। वे वाद-विवाद में अपने समस्त
विरोधियों को परास्त करते गए। बौद्धों एवं अन्य मतावलम्बियों को शंकर के
तर्कों के सामने टिकना कठिन हो रहा था। वे परास्त होकर उनके शिष्य बन
गए। सोलह वर्ष की उम्र तक काशी में रहने के उपरांत वे आध्यात्मिक
दिग्विजय के लिए निकल पड़े- अब वे शास्त्रार्थ और लेखन कार्य के द्वारा
अद्वैत दर्शन की श्रेष्ठता स्थापित करने में लग गए।
काशी से शंकराचार्य अपने समर्थकों के साथ बद्रीनाथ गए और वहां पुनः मूर्ति
स्थापित कर बद्रीनाथ की मान्यता को प्रतिष्ठित किया। यहीं पास के क्षेत्र में शंकराचार्य ने जोशी मठ
की स्थापना की, और बद्रीनाथ के पास की व्यास गुफा में रहकर उन्होंने उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रों पर
भाष्य लिखे। शंकराचार्य के समय में वेदों और उपनिषदों के ज्ञान को कम महत्व दिया जाने लगा
था। परन्तु उन्होंने अपनी विद्वता और गंभीर प्रयासों से पुनः हिन्दू धर्म की मान्यताओं को स्थापित्य
किया। वेदों के ज्ञान के प्रचार और हिन्दू जनता में पुनः चेतना जागृत करने के उद्देश्य से शंकराचार्य
ने उत्तराखण्ड, अयोध्या, काशी, प्रयाग, दिल्ली, उज्जैन, कांची, कामरूप, गया, कोणार्क, जगन्नाथ,
द्वारिका, मथुरा, रामेश्वरम आदि चारों दिशाओं के तीर्थ स्थानों की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान
उन्होंने लगातार विद्वानों से संपर्क स्थापित कर, उनसे वाद-विवाद कर अपनी विद्वता की छाप
समस्त लोगों पर छोड़ी थी।
मठों की स्थापना की थी। ये मठ हैं जगन्नाथ पुरी, जोशीमठ, द्वारकापुरी और श्रंगेरीमठ, आज भी आम
हिन्दू इन चार धामों की यात्रा कर मोक्ष प्राप्त करने की कामना करता है।
शंकराचार्य ने देश के संयासियों को एक सूत्र में पिरोने के लिए ‘‘ दसनामी संप्रदाय’’
की स्थापना की थी। शंकराचार्य द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 240 के आस पास है। आज आदि
शंकराचार्य को भगवान और जगतगुरू के रूप में माना जाता है। बत्तीस वर्ष की अल्पायु में ही, सन् 820 ई0, में उनका देहावसान हो गया।
यात्रा कर सांस्कृतिक-धार्मिक एकता को बढ़ाया वरन् वे लगातार लिखते भी
रहे। वे एक महान लेखक एवं विचारक थे- उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों पर
भाष्य लिखे। सनातन धर्म की परम्परा में गीता, उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र को
प्रस्थानत्रयी के नाम से पुकारा जाता है। इन तीनों ही ग्रन्थों पर सर्वप्रथम भाष्य
लिखने वाले शंकराचार्य ही थे। इन्होंने अनेक महत्वपूर्ण उपनिषदों, जैसे-
ऐतरेय, ईश केन, छान्दोग्य मुण्डक, माण्डुक्य, तैत्तिरीय, वृहदारण्यक, श्वेताश्वतर
आदि पर भाष्य लिखे। ऐसा माना जाता है कि शंकराचार्य ने लगभग दो सौ
ग्रन्थों की रचना की थी- जिनमें से अनेक ग्रन्थ अब उपलब्ध नहीं है।
विष्णुसहस्त्रनामभाष्य, सनत्सुजातीयभाष्य, सौन्दर्यलहरी, उपदेशसाहस्त्री आदि।
इनकी रचना शैली इतनी रोचक है, गंभीर विषयों को सरल शब्द में अभिव्यक्त
करने में इनकी कला इतनी मनोरम है कि इनके ‘प्रसन्नगम्भीरभाष्य’ साहित्यिक
दृष्टि से भी अनुपम है। वेदान्त की जैसी सरल एवं रोचक व्याख्या शंकर के
ग्रन्थों में मिलती है वैसी अन्यत्र कहीं नहीं। गीता पर शंकराचार्य का भाष्य
अत्यधिक प्रतिष्ठित है।
आदि शंकराचार्य के चार मठ
की। हर भारतीय की इच्छा इन धामों के दर्शन की होती है- ये मठ जन सामान्य की शिक्षा के केन्द्र रहे हैं। शंकराचार्य के द्वारा रचित
‘मठाम्नाय’ ग्रंथ में इन मठों का विस्तृत वर्णन है। ये मठ हैं-
- ज्योतिर्मठ- यह मठ उत्तर भारत में बदरीनाथ में अवस्थित है।
इस मठ के अन्तर्गत वर्तमान दिल्ली, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश,
हरियाणा आदि प्रांत आते हैं। - श्रृंगेरी मठ- यह मठ दक्षिण में स्थित है। आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु,
कर्नाटक, केरल आदि प्रांत इसके अन्तर्गत आते हैं। - गोवर्धन मठ- पूरब में वर्तमान उड़ीसा प्रांत के जगन्नाथ पुरी में
यह मठ स्थापित किया गया। उड़ीसा, बंगाल, झारखंड इसके
प्रभाव-क्षेत्र में आते हैं। - शारदा मठ- यह मठ पश्चिम भारत में द्वारिकापुरी में स्थित है।
इसके अन्तर्गत सिन्धु, गुजरात, महाराष्ट्र आदि क्षेत्र आते हैं।
शंकराचार्य स्वंय किसी पीठ के अधिपति नहीं बने। उन्होंने अपने
चार प्रिय शिष्यों- तोटक, सुरेश्वराचार्य, पद्मपाद, एवं हस्तमालक
को क्रमश: ज्योतिर्मठ, श्रश्ंगेरी मठ, गोवर्धन मठ और शारदा मठ
में अधिपति के रूप में आसीन कर दिया। इन पीठों में परम्परा से
एक-एक पीठाधीश होता है जिन्हें हम शंकराचार्य के नाम से
पुकारते हैं।
कि वे एक स्थल पर वास न कर निर्धारित क्षेत्र में लगातार भ्रमण करते रहें
तथा धर्म, संस्कृति और ज्ञान के संरक्षण और विकास को सुनिश्चित करें।
आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा स्थापित ये मठ आज भी अपने उत्तरदायित्व का
निर्वहन कर रहे हैं।
आदि शंकराचार्य की रचनाएं एवं भाष्य
- विवेक चूड़ामणि-अद्वैत वेदान्त पर लिखी गई इनकी श्रेष्ठ कृति है।
- ब्रह्म सूत्र भाष्य
- उपनिषद भाष्य- आचार्य शंकर के उपनिषद भाष्य अत्यन्त सटीक व उच्च कोटि के हैं। जिनमें वृहद्आरण्यक, माण्डुक्य, तेत्रैय, केन, कण्ठ आदि प्रसिद्ध हैं।
- भगवद्गीता पर भाष्य
- भजगोविंदम् रचना
- शिवानंदलहरी- भगवान शिव को समर्पित
- सौन्दर्य लहरी- आदि शक्ति की प्रार्थना
- विष्णु सहस्रनाम पर भाष्य
9माण्डुक्य उपनिषद पर परमगुरू गोणपादाचार्य की ‘कारिका’ पर भाष्य
आदि शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त दर्शन
अद्वैत वेदान्त की मुख्य विशेषताएं
- निखिल सृष्टि में एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है।
- यह दृश्यमान जगत माया का कार्य होने के कारण मिथ्या है।
- जीव (आत्मा) तथा ब्रह्म में कोई भेद नहीं है।