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वृतिया को प्रेरक कहते है। यह वह अन्तवृति है जो प्राणी मेंं क्रिया उत्पन्न करती
है और उस क्रिया को तब तक जारी रखती है जब तक उद्देश्य की पूर्ति नहीं
जाती है। ‘Motivation’ शब्द लेटिन भाषा के ‘Movers’ का रूपान्तर है जिसका
अर्थ है आगे बढ़ना ‘to move’ अर्थात अभिप्रेरणा का अर्थ है किसी भी व्यक्ति में गति
उत्पन्न करना।
है। शाब्दिक अर्थ में किसी भी उत्तेजना को अभिप्रेरणा कहते है। उत्तेजना के अभाव
में किसी प्रकार की प्रतिक्रिया सम्भव नहीं होती है। यह उत्तेजना आन्तरिक एवं
ब्राहृय दोनो प्रकार की हो सकती है। मनोवैज्ञानिक अर्थ में अभिप्रेरणा का अर्थ केवल
आन्तरिक उत्तेजना से होता है। अर्थात अभिप्रेरणा वह आन्तरिक शक्ति है जो व्यक्ति
को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।
अभिप्रेरणा की परिभाषा
वर्नाड के अनुसार “ अभिप्रेरणा से तात्पर्य उन घटनाओ से है जो किसी विशेष उद्देश्य की ओर क्रिया को उत्तेजित करती है जबकि इससे पहले उस लक्ष्य की ओर कोई क्रिया या तो नही थी या बहुत कम क्रिया सम्भव थी।”
लावेल के अनुसार “अभिअभिप्रेरणा एक ऐसी मनोशारीरिक प्रक्रिया है जो किसी आवश्यकता की संतुष्टि करेगी” जैसे भूख लगने पर खाना खाना।
अभिप्रेरणा के सिद्धांत
व्यक्ति के व्यवहार को कौन – कौन सी चीजे प्रभावित करती है इसके
लिए मनोवैज्ञानिकों ने अलग – अलग विचार प्रस्तुत किये है।
नियंत्रण मूल प्रवृति की सहायता से करता है। सिग्मंड फ्रायड के अनुसार मूल
प्रवृतियां प्रेरक शक्ति के रूप में काम करते है। मूल प्रवृति का प्रमुख स्त्रोत
शारीरिक आवश्यकताए होती है। दो तरह की मूल प्रवृति व्यक्ति को कार्य करने
के लिए प्रेरित करती है – जीवन मूल प्रवृति एवं मृत्यु मूल प्रवृति। जवीन मूल
प्रवृति का तात्पर्य उससे है जिससे व्यक्ति अपने जीवन की महत्वपूर्ण क्रिया करने
के लिए प्रेरित होता है। मृत्यु मूल प्रवृति व्यक्ति को सभी तरह के विनाशात्मक
व्यवहार करने की अभिप्रेरणा देता है। यह दोनो एक साथ मिलकर व्यक्ति के व्यवहार
को प्ररित करते है।
शारीरिक आवश्यकता या बाहरी उद्दीपक से उत्पन्न होती है। हसमें वयक्ति
क्रियाशील हो जाता है और उद्देश्यपूर्ण व्यवहार करने लगता है। फ्रायड का
अभिप्रेरक सिद्धांत (मनोविश्लेषण सिद्धांत) प्रणोद सिद्धांत पर आधारित है।
फ्रायड के अनुसार यौन तथा आक्रमणशीलता दो प्रमुख प्रेरक है जिसकी बुनियाद
बचपन में ही पड़ जाती है।
प्रोत्साहन के कुछ खास गुणो के कारण होती है। इस सिद्धांत को प्रत्याशा
सिद्धांत भी कहा जाता है। जैसे भूख न होने पर भी स्वादिष्ट भोजन मिलने पर
व्यक्ति उसकी ओर खिच जाता है।
किया गया। इसके अनुसार सुख देने वाले लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हम लोग
प्रेरित रहते है। तथा जिससे हमें अप्रसन्नता होती है उससे दूर रहते है। अभिप्रेरणा के
इस सिद्धांत को संवेग का सिद्धांत भी कहते है।
व्यक्ति में जन्म से ही आत्माभि व्यक्ति की क्षमता होती है जो व्यक्ति के व्यवहार
को प्रभावित करती है। मासलो ने आवश्यकताओ या मानव अभिप्रेरको को एक
क्रम में रखा। मानवीय आवश्यकताए मुख्य रूप से पाँच होती है।
- शारीरिक आवश्यकताए – यह सबसे नीचे के क्रम मेंं आती है इसमें भूख
प्यास, काम आदि शारीरिक आवश्यकताएं आती हैं। सबसे पहले व्यक्ति इन
आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। - सुरक्षा की आवश्यकता- यह शारीरिक आवश्यकताओ के बाद आती है।
इसमें शारीरिक तथा संवेगिक दुर्घटनाओ से बचाने की आवश्यकता सम्मिलित है
इसमें व्यक्ति डर तथा असुरक्षा से बचने की कोशिश करता है। - सदस्य होने तथा स्नेह पाने व देने की आवश्यकता – इस तरह की
आवश्यकता के कारण व्यक्ति परिवार, स्कूल, धर्म, प्रजाति, धार्मिक पार्टी के साथ
तादाम्य स्थापित करता है। व्यक्ति अपने समूह के अन्य सदस्यो के साथ स्नेह
दिखाता है तथा उनसे स्नेह पाने की कोशिश करता है। - सम्मान की आवश्यकता – प्रथम तीन आवश्यकताओ की सन्तुष्टि
होने पर सम्मान की आवश्यकता की उत्पत्ति होती है। इसमें आन्तरिक सम्मान
कारक जैसे आत्मसम्मान, उपलब्धि, स्वायत्तता तथा ब्राहृय सम्मान कारक जैसे
पद, पहचान आदि सम्मलित होते है। - आत्म सिद्धि की आवश्यकता – आत्मसिद्धि सबसे उपरी स्तर की
आवश्यकता है। यह पर सभी लोग नही पहुँच पाते है। आत्मसिंिद्ध में अपने अन्दर
छिपी क्षमताओ को पहचानकर उसे ठीक तरह से विकसित करने की आवश्यकता
है।
6. अभिप्रेरणा के मर्रे का सिद्धांत – मरे ने अपने अभिपे्ररणा के सिद्धांत को आवश्यकता के रूप में बताया है।
असन्तुष्ट आवश्यकताए व्यक्ति को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है और तब
तक बनी रहती है जब तक आवश्यकताओ की सन्तुष्टि नही होती है। प्रत्येक
आवश्यकता के साथ एक विशेष प्रकार के संवेग जुड़े रहते है। 1930 में बहुत सारे
अघ्ययनो के बाद मर्रे ने आवश्यकताओ के दो प्रकार बताये।
- दैहिक आवश्यकताएँ – इस प्रकार की आवश्यकताए व्यक्ति के जीवन जीने
के लिए आवश्यक होती है जैसे भोजन, पानी, हवा इत्यादि। मर्रे ने 12 दैहिक
आवश्यकताए बतायी है। - मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ – यह आवश्यकताए शारीरिक नही होती है।
मर्रे ने 28 आवश्यकताए बतायी है यह प्राथमिक आवश्यकताओं से उत्पन्न होती
है जैसे- उपलब्धि की आवश्यकता, सम्बन्ध की आवश्यकता आदि।
मर्रे के अनुसार कभी – कभी व्यक्ति की दैहिक आवश्यकताओं की तुलना
में मनोवैज्ञानिक आवश्यकताए हावी हो जाती है।
अभिप्रेरणा के स्रोत
अभिप्रेरणा के प्रमुख 4 स्रोत होते है।
अभिप्रेरणा की विधियां
1. पुरस्कार – यह अभिप्रेरणा देने की अत्यन्त प्रमुख विधि है। क्योकि इसके द्वारा व्यक्ति को
एक स्तर प्रात्त होता है। सन्तोष मिलता है, उत्साह प्राप्त होता है, कार्य में रूचि
आती है, व्यक्ति कार्य करने के लिए अधिक लीन हो जाता है। पुरस्कार मुख्य रूप
से तीन प्रकार के होते है।
- मौखिक पुरस्कार – प्रशंसा करना।
- चिन्हित पुरस्कार – मेंडेल, गोल्ड स्टार, मानक उपधि, फिल्मफेयर अवार्ड
इत्यादि। - भौतिक पुरस्कार – टाफी देना, धन देना इत्यादि।
रेली एवं लिविस ने पुरस्कार को प्रभाव पूर्ण बनाने के लिए निम्न लिखित
सुझाव दिये है।
- पुरस्कार स्वंय का प्राप्त किया हुआ होना चाहिए।
- छोटे कार्यो के लिए पुरस्कार नही देना चाहिए।
- पुरस्कार सदैव विशिष्ट कार्य के लिए दिए जाना चाहिए, सामान्य कार्य के
लिए नही। - छात्रों को यह पता होना चाहिए कि उसका निष्पादन दूसरे से कितना
श्रेष्ठ है। प्रत्येक पुरस्कार के लिए नियम निर्धारित होने चाहिए। - पुरस्कार को तुरन्त दिया जाना चाहिए।
2. दण्ड – दण्ड के द्वारा व्यक्ति में असंतोष तथा अरूचि उत्पन्न होती है। दण्ड
मुख्य रूप से दो प्रकार के होते है।
- मौखिक दण्ड – डाँटना, आलोचना करना इत्यादि।
- शारीरिक दण्ड – सजा देना, मारना, मुर्गा बनाना इत्यादि।
जोन्स, ब्लेयर तथा सिम्पसन ने 1965 में यह पाया कि-
- दण्ड के द्वारा ईष्या तथा विद्वेष की भावना बढ़ती है।।
- इससे छात्रों में संवेगात्मकता इस हद तक बढ़ती है कि इससे सीखना
लगभग असम्भव हो जाता है। - यह विद्यार्थियों में तनाव, चिन्ता एवं थकान उत्पन्न करती है।
- इससे कक्षा मारेल निम्न हो जाता है।
3. श्रेणी अथवा अंक – श्रेणी अथवा अंक भी अच्छे प्रेरक के रूप में कार्य करते है। यह एक
प्रकार के चिन्हित पुरस्कार है। सारे विद्यार्थियो को एक आधार पर श्रेणी नही देनी
चाहिए क्योकि कुछ विद्याथ्र्ाी आसानी से उस श्रेणी को प्राप्त कर लेते है और
उनमें श्रेष्ठता की भावना विकसित हो जाती है जबकि अन्य विद्यार्थियों को उसी
श्रेणी लाने के लिए कठोर परिश्रम करना है।
4. सफलता – अभिप्रेरणा देने का प्रमुख आधार है बालक को अपने कार्य में सफल बनाना।
सफलता ही व्यक्ति को किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती है। अग्रेजी
में एक कहावत है “NothingSucceed Like Success” सफलता से व्यक्ति मेंं
आत्मविश्वास बढ़ता है यह आत्मविश्वास व्यक्ति में पाने योग्य लक्ष्य को निर्धारित
करता है
यह तीन प्रकार से कार्यगत होती है।
- छात्रो में अपने सहयोगियो के साथ अन्त:व्यक्तिगत प्रतिद्विन्द्वता होनी
चाहिए। परन्तु मनोवैज्ञानिको एवं शिक्षा शास्त्रियो से इसको बहुत अधिक
महत्व नही दिया है। - समूह प्रतिद्वन्दिता आपस में सहयोग की भावना का विकास करती है।
- अपने स्वयं से प्रतिद्वन्दिता – इस प्रकार की प्रतिद्विन्ता सबसे प्रभावशाली
होती है तथा मानसिक स्वास्थकर्त्ताओ के द्वारा इसको प्रभावशाली बताया
गया है। शिक्षा के दार्शनिक आधार के अनुसार शैक्षिक कार्यक्रम में
आवश्यकताओ को सन्तुष्ट करने का काम करता है। तथा व्यक्तियो में
संवेगात्मक संतोष पैदा करती है।
6. परिणाम का ज्ञान- अभिप्रेरणा प्रदान करने की यह सबसे ज्यादा प्रभावपूर्ण विधि है। छात्रो को इस
बात का ज्ञान करवाना अत्यन्त आवश्यक है कि वह जिस समूह का सदस्य है
उस समूह के अन्य लोग कैसा कर रहे है। छात्र को अपनी स्वयं की उन्नति की
जानकारी देनी चाहिए जिससे वह अधिक परिश्रम से कार्य कर सके।
नवीनता लाने के लिए शिक्षण की विभिन्न विधियों को प्रयोग में लाना चाहिए।
लिये क्या, कितना कठिन लक्ष्य निर्धारित किया है। कुछ विद्यार्थी अपने लिए
अपनी योग्यतानुसार लक्ष्य निर्धारित करते है जबकि अन्य विद्यार्थी या तो बहुत
उच्च या निम्न लक्ष्य निर्धारित करते है। शिक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह छात्रो
के महत्वाकांक्षा के स्तर के आधार पर लक्ष्य निर्धारित करने में उनकी सहायता
करें।
जानना चाहिए। बालक की पाठ में रूचि उत्पन्न करनी चाहिए। अत: अध्यापक
को पढ़ाए जाने वाले पाठ को बालक की रूचि से सम्बन्धित करना चाहिए।
उद्देश्यपूर्ण होता है शिक्षक को ऐसे लक्ष्यो का निर्धारण करे जो छात्रो की
आवश्यकतानुरूप हो।
अत्यन्त सहायक होती है। इसके लिए छात्रो से प्रश्न पूछना, विषय से सम्बन्धित
कहानी सुनाना, शारीरिक क्रियाओ में छात्रो की भागीदारी, प्रशंसा, छात्रो को नाम
से सम्बोधित करना आदि विधियों को अपनाया जा सकता है।