अनुशासन का अर्थ एवं परिभाषा

अनुशासन शब्द अंग्रेजी के ‘डिसीप्लीन’ शब्द का पर्याय है कि जो कि ‘डिसाइपल’ शब्द से बना है। जिसका अर्थ है- ‘शिष्य’’ शिष्य से आाज्ञानुसरण की अपेक्षा की जाती है। हिन्दी ने संस्कृत की ‘शास्’ धातु से यह शब्द बना है। इसका अभिप्राय है नियमों का पालन, आज्ञानुसरण नियंत्रण। शाब्दिक अर्थ की दृष्टि से अनुशासन की प्रक्रिया में नियमों का पालन, नियंत्रण आज्ञाकारिता आदि अर्थ निहित है।

रायबर्न के अनुसार- ‘‘एक विद्यालय में अनुशासन का अर्थ सामान्यत: व्यवस्था तथा कार्यों के सम्पादन में विधि नियमितता तथा आदेशों का अनुपालन होता है।’’ यह परिभाषा अनुशासन के बाह्य स्वरूप को ही व्याख्यायित करती है। अनुशासन की एक-दूसरी परिभाषा सर पर्सीनन ने निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया है- ‘‘अनुशासन एक नियम के प्रति किसी भी भावनाओं और शक्ति के आत्मसपर्ण में निहित हेाता है। यह अव्यवस्था पर आरोपित किया जाता है, तथा अकौशल एवं निरथर्कता के स्थान पर कौशल एव मितव्ययता उत्पन्न करता है, हो सकता है हमारे स्वभाव का अंश इस नियंत्रण को प्रतिनियंत्रित करे किन्तु इसकी मान्यता अन्तत: ऐच्छिक स्वीकृति पर हेाती है।’’

जॉन डी0वी0 के अनुुसार –’’विद्यालय में प्रदत्त सूचनाओं एवं छात्र चरित्र के विकास के मध्य की दूरी वस्तुत: इसलिये है कि विद्यालय एक सामाजिक संस्था नहीं बना पाया है।’’

उनके अनुसार – ‘‘जिन कार्यो को करने से परिणाम या निष्कर्ष निकलते हैं उनको सामाजिक एवं सहयोगी ढंग से करने पर अपने ही रूप का अनुशासन उत्पन्न होता है।’’

डी0वी0 के अनुशासन – की अवधारणा सामाजिक स्वीकृत पर आधारित है। यह आत्मानुशासन की ऐसी अवधारणा है जिस पर विद्यालयी वातावरण का प्रभाव स्पष्ट झलकता है। दार्शनिक दृष्टिकोण मे अनुशासन

    विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदायों ने अनुशासन को अपने अपने दृष्टिकोण से देखा है क्योंकि अनुशासन का प्रभाव सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था के कर्इ पक्षों पर परिलक्षित होता है, जैसे कि विद्यार्थी एवं शिक्षकों की संकल्पना एवं गुण, इनके सम्बंध, विद्यालय वातावरण तथा शिक्षण विधियां इत्यादि। इस रूप में हम सबसे पहले आदर्शवाद को उद्धृत करे जिसमें कठोर अनुशासन की संकल्पना की गयी है। इनके अनुसर बालक का पूर्ण विकास अनुशासन में रहने पर ही होगा। अनुशासन में रहकर ही वह आत्मानुभूति या आध्यात्मिकता को प्राप्त कर सकता है। फ्राबेल ने लिखा है-’’बालक की रूचि का ज्ञान प्राप्त कर प्रेम व समानुभूति व्यक्ति करके उस पर नियंत्रण रखा जाना चाहिये।’’ आदर्शवादी उचित प्रकार से निर्देशित स्वतंत्रता के वातावरण में कठोर अनुशासन के पक्षधर है।

    प्रकृतिवादी वाह्य शक्ति पर आधारित अनुशासन विश्वास नहीं करते। रूसो ने स्पष्ट कहा है कि -’’बच्चों को कभी दण्ड नहीं दिया जाना चाहिये स्वतंत्रता न कि शक्ति सबसे अच्छी चीज है और अनुशासन सदैव बालकों की त्रुटियाों के प्राकृतिक परिणामों द्वारा ही होना चाहिये।’’ यदि अनुशासन स्वीकृति और अनुभूति में होती है, तो निश्चय ही यह अन्त:प्रेरित और आत्मप्रेरित होगी। यथार्थवादी मानते हैं कि प्रकृति के नियमानुसार प्रत्येक प्राणी को अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करके जीवन का सुख प्राप्त करना चाहिये परन्तु सामाजिक नियंत्रण आवश्यक है। यथार्थवादी प्रभावात्मक अनुशासन के सिद्धान्त को भी स्वीकार करता है। इसके अनुसार सामाजिक सम्पर्क के प्रभाव से न कि प्राकृतिक परिणामों से अनुशासन स्थापित होता है। वहीं दूसरे ओर प्रयोगवादी इस बात पर बल देता है कि यदि समुदाय के लोग किसी आदर्श व तथ्य की परीक्षण उपयुक्त पाते हैं तो अवश्य ग्रहण करें और पालन करें और यह उन्हें स्वयं अनुशासित कर देगा इसका तात्पर्य यह है कि वे भी प्रभावात्मक अनुशासन को मानते हैं, परन्तु उनका कुछ झुकाव मुक्तिवादी भी है।

    अगर हम सम्वेत रूप से देखें तो रस्क ने लिखा है- ‘‘प्रकृतिवादी दर्शनशास्त्र में नैतिक मानदण्डों की प्रमाणिकता को अस्वीकार करके, बालक की जन्मजात शक्तियों को मनमाने ढंग से प्रकट होने के लिये अवसर प्रदान करना है। प्रयोजनवादी ऐसे मानदण्डों को सामान्य रूप से अस्वीकार करते हुये छात्रों के आचरण को सामाजिक स्वीकृति पर ही नियंत्रित करने में आस्था रखता है वहीं दूसरी ओर आदर्शवादी मानव व्यवहार को नैतिक आदर्शो के अभाव में अपूर्ण मानता है और बालकों को नैतिक मानदण्डों को स्वीकार करता है और धीरे-धीरे आचरण के अंग बनाने के लिये प्रशिक्षण प्रदान करना कर्तव्य मानता है।’’

    दार्शनिक दृष्टिकोण में अनुशासन

    विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदायों ने अनुशासन को अपने अपने दृण्टिकोण से देखा है क्योंकि अनुशासन का प्रभाव सम्पूर्श शिक्षा व्यवस्था के कर्इ पक्षों पर परिलक्षित होता है, जैसे कि विद्याथ्र्ाी एवं शिक्षकों की संकल्पना एवं गुण, इनके सम्बंध, विद्यालय वातावरण तथा शिक्षण विधियां इत्यादि। इस रूप में हम सबसे पहले आदर्शवाद को उद्धृत करे जिसमें कठोर अनुशासन की संकल्पना की गयी है। इनके अनुसर बालक का पूर्श विकास अनुशासन में रहने पर ही होगा। अनुशासन में रहकर ही वह आत्मानुभूति या आध्यात्मिकता को प्राप्त कर सकता है। फ्राबेल ने लिखा है-’’बालक की रूचि का ज्ञान प्राप्त कर प्रेम व समानुभूति व्यक्ति करके उस पर नियंत्रण रखा जाना चाहिये।’’ आदर्शवादी उचित प्रकार से निर्देशित स्वतंत्रता के वातावरण में कठोर अनुशासन के पक्षध् ार है।

    प्रकृतिवादी वाह्य णक्ति पर आधारित अनुशासन विण्वास नहीं करते। रूसो ने स्पष्ट कहा है कि -’’बच्चों को कभी दण्ड नहीं दिया जाना चाहिये स्वतंत्रता न कि णक्ति सबसे अच्छी चीज है और अनुशासन सदैव बालकों की त्रुटियाों के प्राकण्तिक प्रिणामों द्वारा ही होना चाहिये।’’ यदि अनुशासन स्वीकृति और अनुभूति में होती है, तो निण्चय ही यह अन्त:प्रेरित और आत्मप्रेरित होगी।

    यथार्थवादी मानते हैं कि प्रकृति के नियमानुसार प्रत्येक प्राणी को अपनी इच्छाओं को संतुण्ट करके जीवन का सुख प्राप्त करना चाहिये परन्तु सामाजिक नियंत्रण आवश्यक है। यथार्थवादी प्रभावात्मक अनुशासन के सिद्धान्त को भी स्वीकार करता है। इसके अनुसार सामाजिक सम्पर्क के प्रभाव से न कि प्राकण्तिक परिशामों से अनुशासन स्थापित होता है।

    वहीं दूसरे ओर प्रयोगवादी इस बात पर बल देता है कि यदि समुदाय के लोग किसी आदर्श व तथ्य की परीक्षण उपयुक्त पाते हैं तो अवण्य ग्रहण करें और पालन करें और यह उन्हें स्वयं अनुशासित कर देगा इसका तात्पर्य यह है कि वे भी प्रभावात्मक अनुशासन को मानते हैं, परन्तु उनका कुछ झुकाव मुक्तिवादी भी है।

    अगर हम सम्वेत रूप से देखें तो रस्क ने लिखा है- ‘‘प्रकृतिवादी दर्शनशास्त्र में नैतिक मानदण्डों की प्रमाशिकता को अस्वीकार करके, बालक की जन्मजात णक्तियों को मनमाने ढंग से प्रकट होने के लिये अवसर प्रदान करना है। प्रयोजनवादी ऐसे मानदण्डों को सामान्य रूप से अस्वीकार करते हुये छात्रों के आचरण को सामाजिक स्वीकृति पर ही नियंत्रित करने में आस्था रखता है वहीं दूसरी ओर आदर्शवादी मानव व्यवहार को नैतिक आदर्शों के अभाव में अपूर्श मानता है और बालकों को नैतिक मानदण्डों को स्वीकार करता है और धीरे-धीरे आचरण के अंग बनाने के लिये प्रशिक्षण प्रदान करना कर्तव्य मानता है।’’

    अनुशासन सम्बन्धी सिद्धान्त

    स्वतंत्रता तभी तक सफलता प्रदान करती है, जब तक यह सुनियंत्रित हो। अनुशासन स्वतंत्रता केा सार्थकता प्रदान करता है। विद्यालय तथा कक्षा में अध्यापक का कार्य अनुशासन स्थापित करना समझा जाता है। इसको स्थापित करना समझा जाता है। इसको स्थापित करने के तीन सिद्धान्त है। नारमन, मैकमन एवं एडम्स महोदय के अनुसार- दमनात्मक, प्रभावात्मक एवं मुख्यात्मक तीन सिद्धान्त है-

    1. दमनात्मक सिद्धान्त
    2. प्रभावात्मक सिद्धान्त
    3. मुक्त्यात्मक सिद्धान्त

        1. दमनात्मक सिद्धान्त – 

        इसका तात्पर्य है कि अनुशासन स्थापित करने के लिये अध्यापक को पिटार्इ एवं शारीरिक दण्ड तथा बल आदि का प्रयोग करना चाहिये। इस सिद्धान्त के मानने वाले यह मानते हैं कि डण्डा हटाने पर बच्चा बिगड़ता है। अत: वे बच्चों पर अध्यापक को सब अधिकार देते हैं। इसमें कठोर व निर्मम दण्ड भी सम्मिलित है। यह सिद्धान्त बालक की स्वाभाविक प्रवृत्ति का परवाह नहीं करता परन्तु प्रकृतिवादी व यथार्थवादी शिक्षा दर्शन ने इस प्रकार के अनुशासन का विरोध किया है। कमेनियम में ऐसे स्कूलों को कसार्इखाना कहा और ऐसे ढंग से अनुशासन स्थापित करना अमनोवैज्ञानिक ठहराया। यह सिद्धान्त लोकतन्त्रात्मक शिक्षा व्यवस्था के विपरीत है। इस सिद्धान्त से अध्यापक की असफलता परिलक्षित हेाती है, क्येांकि शिक्षक अपनी शिक्षण एवं व्यवहार से विद्यार्थियों को प्रभावित कर अनुशासित नहीं कर पाता है। यह सिद्धान्त अब पुरातनयुगीन मानी जा रही है।

        2. प्रभावात्मक सिद्धान्त – 

        इस सिद्धान्त को शिक्षक के व्यक्तित्व के पभ््र ााव पर आधारित किया है। अध्यापक एवं विद्यार्थियों के मध्य एक आदर्श नैतिक सम्बंध स्थापित किया जाता है। इसमें शिक्षकों से उच्च कोटि का आचरण एवं व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। हमारे देश में वैदिकालीन शिक्षा में शिक्षक (गुरू) अपने आचरण एवं क्रियकलापों से ही छात्रों केा अनुशासित रखकर अनुकरण करवाते थे। इससे गुरू-शिष्य के मध्य मधुर सम्बंध स्थापित हेाते थे। इसे मध्यमार्ग माना जाता है, परन्तु यह सत्य है कि शिक्षक प्रभाव का विद्यार्थियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा है यह कहा नहीं जा सकता कभी-कभी विद्याथ्र्ाी अपनी निजता खो देते हैं। इन बातों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

        3मुक्त्यात्मक सिद्धान्त – 

        इस सिद्धान्त आधार बालक की स्वतत्रं पकृति है। प्रकृतिवादी शिक्षाशास्त्री इसके प्रबल समर्थक है। रूसो बर्डस्वर्थ, हक्सले, माण्डेसरी और फ्राबेल भी इसके प्रयोग के लिये समर्थन देते हैं। बर्डस्वर्थ ने माना है कि बालक में अपने पर नियंत्रण रखने के सभी गुण है और हमें उसको स्वाभाविक वातावरण में प्रतिक्रिया करने के लिये अभिप्रेरित करना चाहिये। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से शारीरिक दण्ड पर प्रतिबंध इस दर्शन का ही परिणाम है। यह माना जाता है कि-

        1.  स्वतत्रंता बालक को स्वाभाविक उन्नति का अवसर देती है।
        2. स्वतंत्रता संवेगों एवं भावनाओं को सुदृढ़ बनाकर मानसिक विकृति को रोकता है।
        3. स्वतंत्रता से बच्चों को संतुलित मानसिक स्वास्थ्य मिलता है।
        4. यह बच्चों में आत्मविश्वास एवं आत्मनिर्भरता उत्पन्न करता है।
        5. यह बच्चों में सही एंव गलत का अन्तर देखने का दृष्टिकोण उत्पन्न करता है, क्येांकि गलत उसे कष्ट देता है, जिससे वह सीख जाता है।

                इस सिद्धान्त से कुछ कमियां आयी जैसे- अधिक स्वतंतत्रा से स्वच्छन्दता, स्वेच्छाचारिता एवं नियम उल्लंघन को अभिवृत्ति अनुभव की कमी, अपरिपक्वता से उचित आदर्शों के निर्माण में कठिनार्इ देखने को मिली।

                इन तीनों आर्दशों का अपना – अपना महत्व परिलक्षित होता है। अति से बात बिगड़ती हैं। हम केार्इ मध्यम भाग निकाले जिससे कि उसमें अनुशासन के साथ स्वतंत्रता के उचित प्रयोग की प्रवृत्ति उत्पन्न हो सके। रॉस ने इस सम्बंध में अपने विचार देते हुये लिखा है-’’सच्ची स्वतंत्रता के लिये नैतिक एवं सामाजिक नियंत्रण की आवश्यकता है इसके लिये प्रभाव की विधि सर्वाधिक उपर्युक्त है एवं वांछनीय है इससे सच्चा अनुशासन स्थापित होता है।’’ इस प्रकार हम प्रभावात्मक अनुशासन को मूल मानकर मुक्त्यात्मक अनुशासन को क्रियशीलत करें और दमनात्मक अनुशासन की मात्र छाया ही दिखयी दे।

                अनुशासनहीनता का कारण

                अनुशासन स्वतंत्रता को सार्थता प्रदान करती है और विद्यालीय वातावरण को अराजकता के स्थान पर सुव्यवस्था देती है जो पूर्व में यह जानने की आवश्यकता है कि अनुशासनहीनता के कारक कौन से है। हम इनको समवेत रूप से विशेष विन्दुओं के अन्तर्गत देखेंगे-

                1. विद्यालयों का अनुपयुक्त वातावरण – 

                वहुधा विद्यालयों का वातावरण भी अनुशासनहीनता का प्रमुख कारक है।

                1. शिक्षा प्रणाली का उद्देश्यपरक न होना।
                2. विद्यालयों/महाविद्यालयों/विश्वविद्यालयों की शिथिलता व उदासीनता।
                3. अध्यापकों की उदासीनता व रूचि व प्रेरणा में कमी।
                4. शिक्षण विधियों का स्तरानुकुल, रोचक, उपयोगी व प्रभावी न होना।
                5. कक्षाओं में अत्यधिक छात्रों की संख्या के कारण शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का प्रभावी न होना।
                6. विद्यार्थियों के विभिन्न शैक्षिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं पर उचित निर्देशन न दिया जाना।
                7.  समय-सारिणी के निर्धारण में विद्यार्थियों की आवश्यकता, रूचि थकान एवं मनोरंजन जैसे तथ्यों को ध्यान न दिया जाना।
                8. परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की कमी के कारण उचित मूल्यांकन न कर पाने के कारण छात्रों में असन्तोष।
                9. शिक्षण संस्थाओं में सामुदायिक क्रियाकलापों को महत्व नहीं दिये जाने से विद्यार्थियों का समाज से अलगाव।
                10. विद्यार्थियों में नैतिक शिक्षा का अभाव होने के कारण उचित नैतिकता का अभाव।

                  2. दूषित सामाजिक वातावरण – 

                  सामाजिक वातावरण बालक के सम्पूर्ण क्रियाकलाप को प्रभावित करते हैं और यह भी विद्यार्थियो में अनुशासन की भावना को प्रभावित करते हैं।

                  1. समाज में व्याप्त दोष (जातिगत भेदभाव, धार्मिक कट्टरता एवं क्षेत्रवाद)।
                  2. अश्लील साहित्य एंव चित्र का प्रचार-प्रसार।
                  3. बढ़ती जनसंख्या के कारण बिलगाव।
                  4. सामाजिक आदर्शों के प्रति विरक्तता।
                  5. आदर्श, पड़ोस, साथियों का अभाव।

                    3-अनुपयुक्त पारिवारिक वातावरण – 

                    बच्चे अपने परिवार से वंशानुक्रम के गुण तथा पारिवारिक वातावरण के प्रभाव की उपज हेाते हैं। परिवार का वातावरण अनुपयुक्त हो तो उनका सम्पूर्ण जीवन प्रभावित होता है। परिवार के निम्न कारण अनुशासनहीनता को जन्म देता है।

                    1. पारिवारिक कलह (माता-पिता, दादा-दादी, बच्चों एवं अन्य) सम्बन्धों के मध्यम मधुर सम्बधं का अभाव।
                    2. माता-पिता के द्वारा अपने बच्चों को पूरा ध्यान न दिया जाना, उपेक्षा करना। 
                    3. परिवार की आर्थिक व सामाजिक स्थिति सम्मान जनक न होना।
                    4. विद्यार्थियों के प्रत्येक व्यवहार के प्रति अधिक उदारता का नकारात्मक प्रभाव। 
                    5. बच्चों पर अनावश्यक नियंत्रण से कुण्ठा की उपज।
                    6. परिवार में लैंगिक भेदभाव।
                    7. घर में स्थान की उचित व्यवस्था की कमी।

                      4- शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक कारण- 

                      विशिष्ठ आयु में निम्न शारीरिक व मनोवैज्ञानिक स्थितिया अनुशासनहीनता का कारण हेाती है।

                      1. किशोरावस्था का असंतुलित विकास।
                      2. शारीरिक कमजोरी (लम्बी बिमारी, जन्मजात)।
                      3.  जन्मजात गलत व्यवहार की आदत।
                      4. व्यवहार के शोधन एवं मागान्र्तीकरण एवं परिमार्जन हेतु उपयुक्त परिस्थितियों का अभाव।
                      5. भावनाओं एवं विचारों को उचित प्रश्रय न मिलने से कुण्ठा की उत्पत्ति।

                      अनुशासन स्थापन के उपाय

                      शिक्षण संस्थाओं में अनुशासन स्थापन एक चुनौतीपूर्श कार्य है। अनुशासन किसी भी संस्था के सकारात्मक उन्नति हेतु आवश्यक है। सर्वप्रथम यह जाना जाये कि आखिर अनुशासन की आवश्यकता शिक्षण संस्था में क्यों होती है इस पर भी विचार किया जाये-

                      1. अनुशासन स्वतंत्रता को सार्थकता प्रदान करता है।
                      2. यह शिक्षण संस्थाओं में आवाजकता के स्थान पर सुव्यवस्थ लाता है। 
                      3. अनुशासन से संस्थाओं का वातावरण आकर्शक एवं प्रभावी बनाता है। 
                      4. अनुशासन शिक्षण सम्बंधी उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक होता है। 
                      5. यह विद्यार्थियों केा नियमों एवं परिनियमों की पालन करते रहने प्रवण्त्त करता है।
                      6. अनुशासन विद्यार्थियों के मध्य एवं शिक्षकों के मध्य सम्बंधों को व्यवस्थित करता है।
                      7. अनुशासन विद्यालय के जीवन को सुसंस्कण्त बनाता है। 
                      8. अनुशासन से विद्यालय केार्स समय में ही समाप्त करने में सहायता मिलती है, और समस्त शिक्षण प्रक्रिया सहज हो जाती हैं।
                      9. अनुशासन से विद्यालय वातावरण में स्वत: सण्जन की णक्तियां प्रस्फुटित होती है।

                      अनुशासन स्थापन के उपाय

                      1- सकारात्मक साधन 2- नकारात्मक साधन

                      सकारात्मक साधन- इन साधनों के अन्तर्गत पुरस्कार वितरण खे लकदू का आयोजन, पाठ्य सहगामी, क्रिया कलापों का आयोजन, स्वस्थ विद्यालयी वातावरण, छात्र स्वानुशासन, नैतिक शिक्षा, अवकाश के क्षशो का सदुपयोग।

                      अ-पुरस्कार वितरण अच्छे कार्य को सम्मानित करने और बुरे कार्यों एवं प्रवण्त्तियों को रोकने का कार्य करता है। इसीलिये विद्यालयों में अधिक अनुशासन में रहने वाले अधिक उपस्थित वाले, अच्छे आचरण, स्वच्छ रहने वाले, साहस पूर्श कार्य करने वाले और विद्यालय के क्रियाकलापों में सहयोग करने वाले विद्यार्थियों को प्रोत्साहन दिया जाये तो अन्य विद्याथ्र्ाी भी सद्कार्यों की ओर प्रवृत्त होगे। राबिन्स के अनुसार- वास्तविक समस्या कृत्रिम पुरस्कारों को समाप्त करने की नहीं, अपितु उन्हें इस प्रकार साधन बनाने एवं प्रदान करने का है जिसमें कि पुरस्कार प्राप्त करने के लिये छात्रों के उच्च उद्देश्यों को प्रोत्साहित किया जा सके।

                      ब- पाठ्यसहगामी क्रियाकलापों का आयोजन- शिक्षण सस्ंथाओं में शिक्षण क्रियाकलापों के अतिरिक्त शिक्षणेत्तर क्रियाकलापों का आयोजन भी करना चाहिये। शिक्षणेत्तर क्रियाकलापों के आयोजन के प्रभाव पड़ते हैं और वे विद्यालयी वातावरण को अनुशासित रखते हैं।

                      शिक्षण संस्थाओं के वातावरण को रोचक एवं सरस बनाते हैं, तथा शिक्षण वातावरण के नीरसता को कम करते हैं।

                      इन क्रियाकलापों में प्रतिभाग से विद्यार्थियों में आपसकी समझ, सहयोग, परिश्रम, धैर्य, स्वस्थ प्रतियोगिता, अनुशासन, नियमबद्धता का विकास होता है। जिससे सामाजिक जागरूकता एवं बोध उत्पन्न होता है।

                      इन क्रियाकलापों के माध्यम से विद्यार्थियों को अपनी इच्छाओं एवं दबे संवेगों को प्रदर्शित करने का अवसर मिलता है। यह उनके मन को कुछ समय के लिये स्वच्छ व निर्मल बना देते हैं।

                      1. ये क्रियाकलाप वातावरण को आनन्दित, और वातावरण की कठोरता समाप्त होने से विद्याथ्र्ाी कुछ समय तक मन लगाकर अध्ययन कार्य करते हैं, जिससे अनुशासन स्थापित होता है। 
                      2. ये क्रियाकलाप विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के मध्य सम्पर्क बढ़ा अच्छी समझ विकसित करते हैं। 

                      स-स्वस्थ वातावरण का निर्माण – विद्यालय में शिक्षकों एवं शैक्षिक प्रशासन को स्वरूप वातावरण का निर्माण करना चाहिये इसके लिये आवश्यक होगा कि –

                      1. सभी शिक्षकों को मध्य दायित्वों का बंटवारा समान रूप से किया जाये। 
                      2. विद्यार्थियों एवं अध्यापकों को संस्था के नीतियों में आवश्यक भागीदार बनाया जाये। 
                      3. विद्यार्थियों एवं अध्यापकों की समस्याओं का यथोचित समाधान किया जाये।
                      4. शिक्षण संस्थाओं में आदेशानुपालन की उचित परम्परा का विकास किया जाना चाहिये जिससे कि अनुशासन की उचित व्यवस्था हो। 
                      5. संस्था के शिक्षकों कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुये शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति को ही मुख्य केन्द्र बिन्दु माना जाये।
                      6. विद्यालयीय पाठ्यक्रम व्यवस्थित एवं रोचक बनाया जाये जिससे कि संस्था म अशान्ति न फैले।

                      द- प्रभावी नैतिक शिक्षा- अनुशासन की पृवण्त्ति की उत्पत्ति का मलू आधार नैतिकता की भावना का उद्भव होती है। अत: यह आवश्यक है कि विद्यालय में ऐसे वातावरण का सण्जन हो जिसमें नैतिकता एवं मूल्यों की उत्पत्ति विद्यार्थियों में एवं शिक्षकों में हो सके इसके लिये सभी धर्मों की अच्छे आदर्शों को विद्यार्थियों के समक्ष रखे जाये। शैक्षिक मूल्यों के विकास हेतु नैतिक शिक्षा का एक या दो घण्टे सप्ताह में रखे जाये। पुस्तकालयों में आदर्श एवं नैतिक मूल्यों से सम्बंधित पुस्तकें रखी जाये। प्रतिदिन प्रार्थना प्रात: करवायी जाये। शिक्षकों में उच्च आदर्श चरित्र की प्रस्तुति की प्रवण्त्ति हो जिसका छात्र अनुकरण करे।

                      क. शिक्षक अभिभावक सहयोग- शिक्षकों एव अभिभावकों के मध्य सहयागे भी विद्यालय अनुशासन स्थापन में आवश्यक भूमिका निभाता है। शिक्षण संस्थाओं में प्रभावी शिक्षक अभिभावक संघ बनाया जाना चाहिये जो कि विद्याथ्र्ाी एवं शिक्षण संस्थाओं के उचित विकास हेतु समवेत रूप से कार्य कर सके। शिक्षक अभिभावक संघ विद्यार्थियों के शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, व्यवहारगत, उपलब्धि एवं आचरण सम्बंधी समस्याओं का तत्काल हल मिलजुलकर निकाल लेते है। जिससे कि विद्यार्थियों का संतुलित विकास हो सके।

                      ख. छात्र स्वानुशासन – छात्र अनुशासन एक ऐसी परम्परा है जिसमें कि विद्याथ्र्ाी कुछ क्षेत्रों में विद्यालयी क्रियाओं में भागीदारी निभाकर संचालन करते है, जिससे कि विद्याथ्र्ाी अनुशासन की प्रवण्त्ति को उत्पन्न करने के लिये स्वयं प्रेरित हो और अन्य को भी प्रवण्त्त करें। इससे विद्यार्थियों में आत्म नियंत्रण एवं आत्म निर्शय की योग्यता उत्पन्न होती है, यह नेतृत्व के गुशों केा प्रस्फुटित करता है, यह नैतिकता का व्यावहारिक प्रशिक्षण है। विद्याथ्र्ाी विद्यालय में विकास हेतु स्वाभाविक परिस्थितियों के निर्माण में सहायक हेाते हैं। यह विद्यार्थियों में सामाजिक के गुणों का विकास करता है।

                      ग. नकारात्मक साधन के रूप में दण्ड – दण्ड दमनात्मक अनुशासन को स्थापित करने का साधन के रूप में है। दमनात्मक अनुशासन को अमनोवैज्ञानिक कहा गया है। इसका प्रभाव तात्कालिक होता है परन्तु अधिकांणत: दीर्घकालिक नहीं हेाता है। दण्ड का प्रयोग अधिकांण नियम सिद्धान्तों पर किया जाता है।

                      1. प्रतिकारात्मक सिद्धान्त- इस सिद्धान्त का अथर् है, जैसा किया है उसके साथ वैसा ही किया जाये। जिससे कि वह ऐसा फिर न करें।
                      2. प्रतिरक्षात्मक सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अन्तगर्त यह बात का ध्यान रखा जाये कि वह पुन: उस कार्य की पुनरावण्त्ति न करे। 
                      3. सुधारात्मक सिद्धान्त- इस सिद्धान्त का आशय है कि न केवल अपराध बोध हो वरन् वह अपराधी पुन: इस ओर प्रवण्त्त न हो इस आणय से दण्ड देना कि वह सुधर जाये। 
                      4. उदाहरशात्मक सिद्धान्त- अपराध पर दण्ड देने का प्रयोजन न केवल अपराध की अनुभूति कराना वरन् दूसरों को इसके परिशामों से उदाहरण दें।
                      5. अवरोधात्मक सिद्धान्त- यह दण्ड विण्लेणशात्मक सिद्धान्त है जिसके अन्तर्गत अपराध एवं उसके द्वारा किये अपराध के कारणों की खोज कर उनका विश्लेषण का निदान खोजा जाये।

                      आधुनिक शिक्षण अनुशासन स्थापन के सकारात्मक साधनों को अधिक महत्व देता है, विद्यालयों में दण्ड के प्रयोग को प्रतिबंधित किया गया है।

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