भारतीय सिनेमा का इतिहास और विकास

सिनेमा का बीज रोपण हुआ माइव्रिज द्वारा आविष्कृत फोटोग्राफ
और इलेक्ट्रॉनिक बल्ब से। इसके बाद विलियम डिक्सन ने एक कैमरा बनाया,
जो चल-चित्रों को कैद करने में सफल सिद्ध हुआ। ‘‘सन् 1980 में बैल्जियम
निवासी जोसेफ प्लेटो और ऑस्ट्रेलिया निवासी साइमन वान स्टेम्फर ने
लगभग एक ही समय में सिनेमास्कोप नामक यंत्र का आविष्कार किया। इस
यंत्र की विशेषता यह थी कि यह घूमते हुए चल-चित्रों का प्रभाव पैदा कर
सकता था।’’ चल-चित्रों के आभास की अनुभूति ही नवीन प्रयोग में सहायक
सिद्ध हुई। चलचित्रों के चलायमान स्वरूप ने नवीन आविष्कारों के लिए
वैज्ञानिकों को प्रेरित किया। सिनेमा के उत्थान में जैट्रॉप नामक यंत्र की अहम
भूमिका रही। सिनेमा के आविष्कार में बहुत बड़ा योगदान फोटोग्राफी के
आविष्कार का रहा है।

भारतीय सिनेमा का इतिहास

सिनेमा का आगमन मानवीय चेतना, वैज्ञानिक सफलता और
निर्देशकीय हुनर की देन है। लेखक विमल ने इस संदर्भ में अपने लेख में
उल्लेख करते हुए लिखा है कि सन् 1877 में सेनफ्रांसिसकों के फोटोग्राफर
एडवर्ड मेब्रिज ने एक प्रयोग किया, जिसमें उन्होंने एक पंक्ति में पच्चीस
कैमरों की सहायता से दौड़ते हुए घोड़े की तस्वीर ली। उन चित्रों को आपस
में जोड़कर देखने से ऐसा आभास हुआ कि घोड़ा दौड़ रहा हैं उन्होंने अपने
इस अविष्कार का पंजीयन करवाया और बाद में उन्हें उसी रूप में प्रदर्शित
किया। जिस उपकरण की सहायता से उसने दौड़ते घोड़े की तस्वीरें प्रदर्शित
की उसका नाम दिया ‘प्रेमिसनोस्कोप’। इस उपकरण को विस्तार दिया चाल्र्स
एमिलो ने सन् 1877 में और नया नाम दिया ‘जूत्रेविसस्कोप’।

इस तरह चित्रपट निर्माण की विकास-यात्रा निरंतर गतिमान रही
और अनेक प्रयोग होते रहे। सन् 1893 में विश्व का पहला स्टुडियो न्यूजर्सी
में स्थापित हुआ। स्टुडियो के निर्माण से फिल्म निर्माण का शुभारंभ हुआ। सन्
1895 में ल्युमियर बंधुओं (लुई ल्युमियर, अगस्ट ल्युमियर) ने चलचित्रों का
निर्माण किया। सन् 1895 में ल्युमियर बंधुओं ने पेरिस सभा भवन में ‘इंजन
इन’ नामक पहली फिल्म बनाई, जिसके लिए विलियम डिक्सन के बनाए हुए
उपकरण में सुधार किया।

फ्रांस की धरती पर प्रथम सिनेमा का प्रदर्शन हुआ और फ्रांसीसी
ही वे सौभाग्यशाली दर्शक थे, जिन्होंने सेल्युलाइट पर चलचित्रों को साकार
होते देखा। भारतीय भूमि पर चलचित्रों के प्रदर्शन का श्रेय ल्युमियर बंधुओं
को ही प्राप्त है। भारतीय भूमि पर सिनेमा का प्रथम प्रदर्शन 7 जुलाई 1896
को हुआ, जिसका प्रीमियर देखने के लिए दो सौ लोग एकत्र हुए, उस समय
टिकट की दर दो रुपए थी जो उस समय बड़ी राशि थी।

यह वर्ष सिने निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण वर्ष रहा, सिनेमा ने
अपनी प्रगति की ओर पग भरना आरंभ किया। लुईस और आगस्ट ल्युमियर
बंधुओं ने भारतीय दर्शकों के मध्य चित्रपट के प्रदर्शन से सिनेमा के
चमत्कारिक रूप के साथ एक अनूठा रिश्ता जोड़ दिया। सिनेमा का प्रदर्शन
मुम्बई के जिस थिएटर में हुआ, उसे एक लम्बे समय तक एक्सेलियर नाम से
जाना गया। प्रतिदिन इस थिएटर में 12 लघु फिल्मों के दो से तीन शो होते
थे, जिनमें प्रमुख चित्रपट थे ‘अराइवल ऑफ इन’, ‘द सी बाथ’, ‘लेडीज़ एंड
सोल्जर्स ऑन व्हील’।

‘‘मुम्बई के बाद सन् 1898 में एक लघु मूक फिल्म ‘दि फ्लावर
ऑफ पर्सिया’ का प्रदर्शन हुआ, इसी वर्ष कोलकाता के दो व्यसायी बंधु
हीरालाल सेन और मोतीलाल सेन ने लंदन से एक बाइस्कोप सिनेमाटोग्राफिक
मशीन खरीदी। 4 अप्रेल को इसी वर्ष छोटी-छोटी आयातीत फिल्मों का
प्रदर्शन उन्होंने आरंभ किया।’’ लेखक कृष्ण मोहन मिश्र ने अपने लेख में इस
बात का उल्लेख किया है। इस तरह सेन बंधुओं ने भारतीय दर्शकों के मन में
टुरिंग सिनेमा के प्रदर्शन से सिनेमा का आकर्षण उत्पन्न किया।

सिने-निर्माण की दिशा में हुए प्रयासों का उल्लेख हमें विभिन्न
पत्र-पत्रिकाओं में मिलता है। श्री कृष्णमोहन मिश्र ने अपने एक लेख में लिखा
है कि- ‘‘सन् 1899 में हरिश्चंद्र सखाराम भटवाडेकर उर्फ सावेदादा ने इंग्लैंड
से एक कैमरा मंगवाया और अखाड़ों में दो पहलवानों की कुश्ती का
फिल्मांकन किया। मुम्बई के हैंगिंग गॉर्डन में कुश्ती का आयोजन कृष्ण नहवी
और पुण्डलीक नामक पहलवानों के बीच किया गया था।’’ पर इस फिल्मांकन
को भी लघुचित्र ही स्वीकारा गया।

इसी तरह कोलकाता के क्लासिक थिएटर में एक पूर्णकालिक
बांग्ला नाटक के फिल्मांकन का सफल प्रदर्शन हुआ। बांग्ला के चर्चित
साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय कृत सीताराम, अलीबाबा, हरिराज, सरला
और बुद्धदेव जैसे नाटकों का चित्रांकन कर सेन बंधुओं ने मूक सिनेमा निर्माण
के द्वार खोले ।

चित्रपट
निर्माण की दिशा में सिने-निर्देशकों ने अपने प्रयास जारी रखे।
वर्ष 1902 के आस-पास जार्ज मेलीस जो कि फ्रांस के प्रसिद्ध
निर्देशकों में गिने जाते रहे हैं, उन्होंने ‘बोयाज़ द मून’ नामक चित्रपट का
निर्माण किया। सिनेमा निर्माण की दृष्टि से यह चित्रपट हर तरह से उत्कृष्ट
सिनेमा सिद्ध हुआ। विज्ञान कथा पर केन्द्रित यह पहला चित्रपट था, जिसमें
विशेष प्रभाव (जिसे कम्प्यूटर संचालित इमेजनरी) कहते हैं, प्रयोग किया
गया।’’ इस तरह सिनेमा ने एक नई दिशा में अपने कदम बढ़ाए। इधर भारत
में टूरिंग सिनेमा अर्थात् घुमंतू सिनेमा तीव्रता से अपना विस्तार कर रहा था।
ओड़िसा, बंगाल और बिहार के आस-पास के क्षेत्रों में सिनेमा का प्रदर्शन
इसी तरह प्रारंभ हुआ। सिनेमा के बढ़ते प्रदर्शन और भारतीय दर्शकों के मन
में सिनेमा के आकर्षण ने कला-प्रेमियों को सिनेमा निर्माण के लिए प्रोत्साहित
किया। परिणामस्वरूप भारतीय सिने-प्रेमियों ने सिनेमा निर्माण की दिशा में
अपने प्रयास की शुरूआत की। भारत में सिनेमा निर्माण की पहली सफलता
का श्रेय किसे दिया जाए इस विषय में कुछ तथ्य संशय उत्पन्न करने वाले
हैं।

इस संदर्भ में ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित संजय सहाय के एक
लेख में कुछ अलग तथ्य दृष्टव्य होते हैं- ‘‘हिंदुस्तानी सिनेमा की पैदाइश को
लेकर संशय है कि जन्मदाता रामचंद्र गोपाल दादा साहेब तोरणे (13.4.
1890-19.01.1966) थे, जिनकी फिल्म ‘श्री पुंडलिक’ 18 मई 1912 को मुम्बई
के कोरोनेशन सिनेमेटोग्राफ थिएटर में रिलीज हुई थी या कि धुंडिराज गोविंद
दादा साहब फाल्के जिनकी ‘राजा हरिश्चंद्र’ उसी थिएटर में 3 मई 1913 को
प्रदर्शित हुई थी।

हाँलाकि सिनेमा से पूर्व भारत में नाटकों ने ही दर्शकों का
मनोरंजन किया, विशेषकर पारसी थिएटर ने। जब सिनेमा निर्माण के प्रयास
प्रारंभ हुआ उस समय भारत में पारसी थिएटर की लोकप्रियता अधिक थी।
नाटकों के चित्रण के लिए भी सिनेमा निर्माण में प्रयास हुए पर केवल लघुचित्र
ही बन पाए। चित्रपट के भारत में सफल प्रयास के रूप में हम दादा साहेब
धुंडिराज गोविंद फाल्के के चित्रपट ‘राजा हरिश्चंद्र’ को ले सकते हैं। ‘श्री
पुंडलिक’ जो कि वर्ष 1912 में प्रदर्शित हुई इसके संदर्भ में कुछ मतभेद
उभरे- कई समीक्षकों का मत था कि कोलकाता के श्री ज्योतिष सरकार ने
सन् 1905 में बंगाल विभाजन के संदर्भ में ‘बंग-भंग’ नाम से एक लघु चित्र
प्रदर्शित किया, किंतु गोरी सरकार के खिलाफ होने के कारण इस पर प्रतिबंध
लगा दिया गया।

सिने-लेखक रितेश सुरभि ने भी अपने लेख में इस बात का
उल्लेख किया है कि 18 मई 1912 को पहली भारतीय कथा-फिल्म ‘पुंडलिक’
का प्रदर्शन बम्बई के कोरोनेशन थिएटर में किया गया। ‘राजा हरिश्चंद्र’ का
प्रदर्शन इसके ठीक एक वर्ष बाद हुआ।

अनेक मतभेदों और दावों के बाद ‘राजा हरिश्चंद्र’ को भारत का
प्रथम सिनेमा स्वीकार किया गया। इसके पूर्व प्रदर्शित ‘श्री पुंडलिक’ को
स्वीकार न करने के कई तर्क और हुए उससे ये बात सामने आई कि ‘श्री
पुंडलिक’ के निर्माण में पूर्णत: भारतीय सहयोगी शामिल नहीं थे, बल्कि कुछ
विदेशी सहयोगी (कैमरामैन) की मदद ली गई थी, जबकि दादा साहेब फाल्के
द्वारा निर्मित चित्रपट ‘राजा हरिश्चंद्र’ स्वदेशी कलाकारों एवं चित्रपट के दस
सहयोगियों से पूर्ण हुई थी। संभवत: इसी आधार पर ‘राजा हरिश्चंद्र’ को
भारत के प्रथम सिनेमा का गौरव और दादा साहेब फाल्के को भारतीय सिनेमा
के जनक का गौरव प्राप्त हुआ।

‘राजा हरिश्चंद्र’ चित्रपट के निर्माता-निर्देशक एवं पटकथा-
लेखक स्वयं दादा साहेब फाल्के थे। चालीस मिनट के इस चित्रपट में दत्त्ाात्रेय
दामोदर दाबके ने ‘राजा हरिश्चंद्र’ की भूमिका निभाई। अभिनेता सालुके ने
रानी तारामती की भूमिका अदा की और विश्वामित्र की भूमिका जी.वी. साने ने
निभाई। मूक होने के बावजूद यह चलचित्र पात्रों के भाव-भंगिमाओं और
वेशभूषा के लिए चर्चित रही। भारतीय चित्रकला के जनक राजा रवि वर्मा का
चित्रपट ‘राजा हरिश्चंद्र’ में महत्वपूर्ण योगदान रहा। चित्रपट की शुरूआत
राजा हरिश्चंद्र, उनकी पत्नी और पुत्र के चित्रों की प्रतिलिपियों की झाँकी से
आरंभ होती है। 

इस संदर्भ में कृष्ण्मोहन मिश्र ने अपने लेख में उद्धृत किया
है- ‘‘राजा हरिश्चंद्र के चरित्रों की वेशभूषा और भंगिमाओं पर तत्कालीन
विश्व-विख्यात चित्रकार राजा रवि वर्मा द्वारा सृजित छवियों का प्रयोग किया
गया, जिसमें पौराणिक चरित्रों के चित्रांकन का गहरा प्रभाव था।’’ चलचित्रों
को सेल्युलाइड पर देखना भारतीय दर्शकों के लिए चमत्कार जैसा था। ‘राजा
हरिश्चंद्र’ के सफल प्रदर्शन ने भारतीय सिने-जगत की नींव रखी और इस
तरह भारत में फिल्म-निर्माण के द्वार खुले। 
दादा साहेब फाल्के कला के
विशेषज्ञ थे, उन्होंने भारत के दो प्रसिद्ध कला-संस्थानों (जे.जे. स्कूल ऑफ
आट्र्स बम्बई और कला भवन बड़ोदा) से शिक्षा ग्रहण की थी।

‘राजा हरिश्चंद्र’ चित्रपट को प्रथम भारतीय सिनेमा के रूप में
स्वीकारने के कुछ प्रमुख तर्क हैं, जिसमें पहला तर्क यह है कि यह परंपरागत
लोककला पर आधारित नाटक की कथा थी। दूसरा यह कि मूक होते हुए भी
यह प्रभावशाली सम्प्रेषण में सफल सिद्ध हुई। तीसरा तर्क यह है कि धार्मिक
कथानक होने के कारण जन-मानस की रुचि इस चित्रपट में अधिक हुई।
उपर्युक्त तर्कों ने इस चित्रपट को प्रथम भारतीय चित्रपट को ख्याति दिलाई।
‘राजा हरिश्चंद्र’ की सफलता से उत्साहित होकर रघुपति वेंकैया नायडू ने
मद्रास में स्थाई सिनेमाघर बनवाया, इसके पूर्व रघुपति वेंकैया नायडू घुमंतू
सिनेमा का प्रदर्शन किया करते थे।

इसी वर्ष दादा साहेब फाल्के की दूसरी फिल्म ‘भस्मासुर मोहिनी’
का प्रदर्शन 27 दिसंबर 1913 को हुआ। यह चित्रपट भी धार्मिक कथाओं के
कारण दर्शकों को रास आई और सफल सिद्ध हुई। सिनेमा की सफलता से
चलचित्रों के निर्माण में नित नए प्रयास होते रहे। भारत में निर्मित मूक फिल्मों
के अधिकांश चित्रपट की कहानी धार्मिक आख्यानों पर केन्द्रित थी। ‘कीचक
वध’ (1917), ‘बिल्वामंगल’ (1919), ‘सैरन्ध्री’ (1919), ‘सिंहगद’ (1923),
‘सीतापद्मिनी’ (1924), ‘अछूत’ (1924), ‘बाजीराव मस्तानी’ (1925) प्रमुख
चित्रपट थे। 

बाबूराव पेंटर ने सन् 1917 में कोल्हापुर में ‘महाराष्ट्र कंपनी’
स्थापित की थी। महाभारत में पांडव के अज्ञातवास के प्रकरण पर ‘सैरन्ध्री’
नामक फिल्म बनाई। इस चित्रपट से बाबूराव पेंटर को काफी प्रसिद्धि मिली।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने उनके इस अभिनव प्रयास के लिए उन्हें
‘सिनेमा केसरी’ की उपाधि और स्वर्ण पदक से सम्मानित किया। इस चित्रपट
से पात्रों के वास्तविक नाम बदलकर फिल्मी नाम रखने की शुरूआत हुई।

संवाद-विहीन मूक चित्रपट में अनुपम दृश्यात्मक शक्ति थी,
जिसके दृश्य ही दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट करने में समर्थ थे। सिनेमा
जहाँ अपने नन्हें कदमों से पग भर रहा था, वहीं सिनेमा सर्जक नवीन प्रयोगों
में प्रयासरत थे। बाइस्कोप (टूरिंग) सिनेमा के माध्यम से सिनेमा का प्रदर्शन
निरंतर जारी रहा। भारतीय दर्शक धार्मिक कथाओं से परिचित थे, अत: ऐसे
विषयों का चयन निर्देशकों के लिए उपयोगी सिद्ध हुआ। संवाद विहीन होने
के बाद भी दर्शक चलचित्रों को भली-भाँति समझ पा रहे थे। सन् 1920 में
हिंदुस्तान सिनेमा फिल्म कंपनी के नासिक स्थित स्टूडियो की स्थापना हुई,
इसमें कृत्रिम प्रकाश-व्यवस्था थी।

अभिनेताओं के सशक्त अभिनय और चलचित्रों के आकर्षण ने
ललित साहित्य की इस नवीन विधा को दर्शकों के मध्य लोकप्रिय बना दिया।
सिनेमा के दस्तक ने अभी दर्शकों के मन में हलचल शुरू कर दी। इस संदर्भ
में लेखक उज्ज्वल अग्रवाल ने अपनी किताब में पहली सवाक चित्रपट का
उल्लेख करते हुए लिखा है कि उधर ‘‘सन् 1927 में ‘द जॉज सिंगर’ नामक
पहली सवाक फिल्म अमेरिका के वार्नर बंधुओं द्वारा बनाई गई। वार्नर बंधुओं
ने जिस प्रणाली का प्रयोग ध्वनि रिकार्ड में किया। आज भी उसी पद्धति का
प्रयोग हो रहा है।

भारत में निर्मित लगभग कुल तेरह सौ मूक सिनेमा भारतीय
सिने-जगत की अमोल धरोहर है। भारतीय सिनेमा का विकास भी
विश्व-सिनेमा के समकक्ष ही जारी रहा। विश्व के पहले सवाक् चित्रपट के
ठीक दो वर्ष बाद भारत की पहली सवाक् चलचित्र ‘आलमआरा’ प्रदर्शित हुई।
14 मार्च सन् 1931 को बम्बई के मैजिस्टिक सिनेमाघर में आर्देशिर ईरानी
द्वारा निर्देशित इम्पीरियल मूवीटोन के बैनर पर निर्मित ‘आलमआरा’ प्रदर्शित
हुई।

‘आलमआरा’ से पूर्व सिनेमाघरों में दर्शक कौतूहलवश सेल्युलाइड
पर प्रदर्शित नायक-नायिकाओं की भाव-भंगिमाओं, उनकी गतिविधियों और
उनकी मौन अभिव्यक्ति के सम्प्रेषण से उत्साहित और अभिभूत थे। सवाक
फिल्मों के आगमन से सिनेमा में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। सिनेमा ने
सामाजिक बुराइयों एवं समकालीन ज्वलंत मुद्दों को समाज के समक्ष प्रस्तुत
करने में अहम भूमिका निभाई। मूक फिल्मों के प्रभाव को सवाक फिल्मों से
कमतर नहीं आंका जा सकता। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई भी मूक सिनेमा का
विषय बनी, जिसमें राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने नायक की भूमिका निभाई। इस
चित्रपट में ‘विदेशी वस्त्रों की होली’ के माध्यम से देशभक्ति से परिपूर्ण
चित्रपट का प्रारंभ हुआ यह चित्रपट लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (देश के
महानायक) को श्रद्धांजली देने के उद्देश्य से बनाई गई थी। इस बात का
उल्लेख लेखिका गीता झुनझुनवाला ने भी अपने एक लेख में किया है।

भारत में चित्रपट निर्माण में ‘मुम्बई’ प्रारंभ से केन्द्र रहा। धार्मिक,
पौराणिक, ऐतिहासिक, मार-धाड़ और देशभक्ति से ओत-प्रोत विषयों पर मूक
चित्रपट का निर्माण होता रहा। सती पद्मिनी (1924, बाबूराव पेंटर), पृथ्वी
वल्लभ (1924, मनीलाल जोशी), बाजीराव मस्तानी (1925, भालजी पेंढारकर),
उदयकाल (1930, व्ही. शांताराम) श्रेष्ठ मूक फिल्मों में गिनी जाती रही है।
भारतीय सिने-निर्देशकों ने नए कलारूपों के इस तकनीकी माध्यम को कला
साधने के उद्देश्य से उपयोग किया और अल्प अवधि में ही अन्य कलारूपों
के समकक्ष खड़ा कर दिया। निरंतर प्रयास व विज्ञान के नित नए आविष्कारों
ने भारतीय सिनेमा को मूक से सवाक तक की यात्रा के लिए प्रेरित किया।
सवाक फिल्मों के निर्माण के साथ ही भारतीय सिनेमा की भाषागत विभाजन
की शुरूआत हुई।

सन् 1931 में भारतीय सिनेमा ने बोलना प्रारंभ किया और 1931
से 1935 तक अर्थात् इन पाँच सालों में 612 सवाक फिल्मों का निर्माण हुआ।
जिसमें से कुल 434 हिंदी भाषा में और 178 फिल्में ग्यारह अन्य भाषाओं में
बनाई गई। साथ-ही-साथ वर्ष 1931 में कुल दो सौ मूक सिनेमा का निर्माण
हुआ, जो अपने-आप में भारतीय सिनेमा की एक बड़ी उपलब्धि है।
बहरहाल भारत की पहली सवाक् फिल्म ‘आलमआरा’ जिसे हम
हिंदी सिनेमा का प्रथम चित्रपट मानते हैं, इस चित्रपट के साथ एक सुखद
संयोग और जुड़ा है, वह है फिल्मों में गीतों का संयोजन। ऐसा नहीं है कि
भारतीय फिल्मों में गीत-संगीत का प्रारंभ सवाक फिल्मों से जुड़ा है। 

वास्तव
में भारतीय मूक सिनेमा के प्रदर्शन के समय संगीतकारों का दल पर्दे के पीछे
बैठकर सिनेमा को प्रभावशाली बनाने के लिए ध्वनि और संगीत प्रस्तुत करते
थे। यह परम्परा पारसी थिएटर से ही सिनेमा में आया, जिससे सिनेमा को
लोकप्रिय होने में अधिक समय नहीं लगा। पहली सवाक चित्रपट ‘आलमआरा’
में कुल सात गीत थे।

इस फिल्म के निर्माता वज़ीर मोहम्मद खान ने अपनी आवाज़ में
गीत गाया’ दे-दे खुदा के नाम’ जिस गीत को भारतीय चित्रपट का पहला
गीत होने का गौरव प्राप्त है। इस गीत को संगीत निर्देशक फिरोजशाह एममिस्त्र
ी ने संगीतबद्ध किया। आर्देशिर इ्ररानी ने जो स्वयं पारसी थिएटर के
मालिक थे, नए कलारूप चित्रपट के माध्यम से अपने नाटकों को प्रस्तुत करने
का सार्थक प्रयास करते रहे। उनकी दूसरी सवाक सिनेमा ‘किसान कन्या’ को
अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ख्याति प्राप्त हुई।

भारतीय सिनेमा की इस सतत स्वर्णिम यात्रा में अनेक अनमोल
हिंदी चित्रपट का निर्माण हुआ। अनेक अभिनेता अपने अभिनय के दम पर
नायक से महानायक बने। निर्माता-निर्देशक, पटकथा-लेखक, कोरियाग्राफर,
गीतकार, संगीतकार, नायक-नायिका, कैमरामैन, स्पॉटबॉय, प्रचारक सभी के
सहयोग और समर्पण के दम पर ही हिंदी सिनेमा ने भारतीय दर्शकों के दिलों
पर राज किया। तकनीकी विकास के साथ सिनेमा निर्माण की विकास-यात्रा
अब भी निरंतर जारी है।

हिंदी सिनेमा के आरंभ में फिल्मों में कलाकार खुद ही गीत गाते
थे और उन्हीं कलाकारों को अभिनय में प्राथमिकता दी जाती थी, जिन्हें गाना
आता था। ‘‘धूप-छाँव (1935) फिल्म से यह समस्या भी दूर हो गई। हिंदी
सिनेमा का यह टर्निंग पाइंट है, पाश्र्व-गायन की शुरूआत इसी फिल्म से हुई
थी। इस प्रयोग को निर्देशकों ने बड़ी ही सादगी से साधा। श्वेत-श्याम
फिल्मों में कुछ प्रयोग और हुए, जिनका प्रचलन आज भी सिनेमा में हैं।
डुप्लीकेट से जोखिम भरे दृश्यों को करवाने का प्रचलन भी श्वेत-श्याम
सिनेमा के दौर में प्रारंभ हुआ, सिनेमा में ग्लैमर का रंग भी श्वेत-श्याम
सिनेमा के दौर में शुरू हुआ। हाँलाकि उस समय बरसात में भीगना ही ग्लैमर
का उपाय था।

‘चित्रलेखा’ अपनी अलग कथा, सर्वश्रेष्ठ निर्देशन, सर्वश्रेष्ठ
अभिनय के कारण सफल हुई। चित्रपट ‘चित्रलेखा’ की सफलता का एक
कारण ग्लैमर भी बना। केदार शर्मा के चित्रपट ‘चित्रलेखा’ (1941) की
अभिनेत्री का एक स्नान-दृश्य था। यह फिल्म सफल हुई और उस दृश्य की
चर्चा ने इसे ग्लैमर का रूप दिया। खतरनाक और हैरतअंगेज़ दृश्यों का
प्रदर्शन भी उसी दौर में आरंभ हुआ। ‘‘अभिनेत्रियों में नादिया और
अभिनेताओं में रंजन, श्याम, जयराज ऐसे सितारे थे, जिन्होंने कई खतरनाक
सीन स्वयं ही किए। नादिया तो स्टंट क्वीन के नाम से खतरनाक शॉट देने
के कारण ही जानी गई और अभिनेता श्याम की स्टंट करते हुए घोड़े से
गिरने से ही मृत्यु हुई। इसका विवरण ‘हिंदी सिनेमा के संक्षिप्त इतिहास’ में
निहित है।

चालीस का दशक हिंदी सिनेमा जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखता
है। यही वह दशक है जिसमें भारत में आजादी की मांग जोरों से बुलंद हुई।
हिंदी सिनेमा भी उन उतार-चढ़ाव का सामना कर रहा था। समसामयिक
विषयों को आधार बनाकर हिंदी सिनेमा-निर्माता अपने चित्रपट के निर्माण में
लगे थे। इसी दशक में किशोर साहू द्वारा निर्मित चित्रपट प्रदर्शित हुआ। सन्
1942 में प्रदर्शित फिल्म ‘कुँआरा बाप’ दर्शकों को बहुत अधिक पसंद आई।
किशोर साहू सुशील, सुशिक्षित तथा कुलीन व्यक्ति थे। किशोर साहू की
फिल्मों में सौंदर्य-बोध और सामाजिकता का समन्वय होता था। 40 से 50 के
दशक में उन्होंने अनेक चित्रपट का निर्माण किया। जहाँ एक ओर अन्य
निर्देशकों ने देशभक्ति से सराबोर विषय को अपने चित्रपट का आधार चुना,
वहीं बदलते सामाजिक परिदृश्य के अनुरूप सामाजिक समस्याओं को किशोर
साहू ने अपने चित्रपट में उभारा। ‘राजा’ (1943), ‘वीर कुणाल’ (1945),
‘सिंदूर’ (1947), ‘साजन’ (1947), ‘सावन आया रे’ (1949), ‘काली घटा’
(1951) जैसे चित्रपट के निर्माण से किशोर साहू ने अपार सफलता अर्जित
की।

पचास के दशक में सिनेमा में कई परिवर्तन हुए। तकनीकी
विकास ने सिनेमा को नवीन स्वरूप प्रदान किया। सिनेमा ने धीरे-धीरे
जनमानस पर अपनी गहरी पैठ स्थापित की। सिनेमा का प्रभाव समाज पर
परिलक्षित होने लगा। दृश्य-श्रव्य माध्यम होने के नाते सिनेमा ने जनमानस
को अत्यधिक प्रभावित किया। सिनेमा का प्रभाव मानव-जीवन के रहन-सहन,
संवाद और दृष्टिकोण पर भी पड़ा। आज भी सिनेमा इस दृष्टि से सशक्त है।
सिनेमा ने विषय पर सोचने-समझने और उस पर विचार करने का अवसर भी
दर्शकों को दिया।

हिंदी सिनेमा का आरंभिक दौर रंगविहीन व ध्वनिविहीन भले ही
रहा हो, पर सिनेमा का यह दौर मील का पत्थर सिद्ध हुआ। हिंदी चित्रपट के
सशक्त नींव से सिनेमा को बल मिला।

1947 में आजादी के पश्चात् ‘सिनेमेटोग्राफ्ट एक्ट 1950’ के तहत
‘केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड सेंसर बोर्ड’ की स्थापना 15 जनवरी सन् 1951
को की गई। सेंसर बोर्ड में एक अध्यक्ष तथा 25 सदस्य होते हैं। मुम्बई में
इसका मुख्यालय स्थापित है। इसी तरह फिल्मों के विकास में एक विधा जुड़ी
और सिनेमा में पुरस्कारों एवं सम्मान की शुरूवात हुई, जिससे चित्रपट के
स्तर में सुधार हुआ और श्रेष्ठ कृतियाँ उभरकर सामने आई। वर्ष 1953 में
भारत सरकार की ओर से फिल्म पुरस्कार की शुरूआत हुई। ‘‘प्रथम सरकारी
फिल्म पुरस्कार मराठी भाषा की फिल्म ‘श्यामची आई’ (1953) को एवं उनके
निर्देशक पी.के. आत्रे को दिया गया।’’10 हिंदी सिनेमा जगत में आगे चलकर
यह पुरस्कार ‘राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार’ नाम से जाना गया। सर्वप्रथम सर्वश्रेष्ठ
अभिनेता-अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार उत्त्ाम कुमार और नरगिस को प्राप्त
हुआ।

सिनेमा निर्माता-निर्देशकों ने अपनी अप्रतिम प्रतिभा से हिंदी
सिनेमा के नए आयाम गढ़े। पुरस्कारों की शुरूआत ने सिनेमा जगत से जुड़े
लोगों का संबल बढ़ाया। ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ प्रकाशन समूह की अंग्रेजी में
प्रकाशित होने वाली ‘फिल्म फेअर’ पत्रिका ने सन् 1953 में ही ‘फिल्म फेअर
अवार्ड’ आरंभ किया। पुरस्कार एवं सम्मान की श्रेणी में प्रारंभ इस तरह के
पहल की भी हिंदी सिनेमा के विकास में अहम भूमिका रही है। पुरस्कारों की
Üाृंखला समय के अनुरूप बढ़ती चली गई, जिसकी यात्रा आज भी निरंतर
जारी है और हिंदी सिनेमा अपने विकास की सतत यात्रा में चलायमान है।
सिने-प्रदर्शन के पूर्व अखबार वालों के लिए प्राइवेट प्रिव्यू रखे जाते थे, यह
प्रथा आज भी जारी है। अखबार के प्रचार-प्रसार ने सिनेमा की लोकप्रियता में
अपनी अहम भूमिका निभाई।

संदर्भ-

  1. पालीवाल, रीतारानी. रंगमंच नया परिदृश्य. नई दिल्ली : लिपि प्रकाशन,
    द्वितीय संस्करण, पृ. …..
  2. विमल. हिंदी चित्रपट एवं संगीत का इतिहास चित्रपट का उद्भव एवं
    विकास. नई दिल्ली : संजय प्रकाशन, पृ. 3.
  3. मिश्र, कृष्ण्मोहन. मूक फिल्मों से शुरू हुआ भारतीय सिनेमा का इतिहाससमसामयि
    क सृजन. संपादक : महेन्द्र प्रजापति, नई दिल्ली : स्वामी
    प्रकाशन, अक्टूबर-मार्च 2012-13, पृ.
  4. मिश्र, कृष्ण्मोहन. मूक फिल्मों से शुरू हुआ भारतीय सिनेमा का इतिहाससमसामयि
    क सृजन. नई दिल्ली : स्वामी प्रकाशन, अक्टूबर-मार्च
    2012-13, पृ. 8.
  5. रितेश, सुरभि. मौन की अभिव्यंजना है. नई दिल्ली : स्वामी प्रकाशक,
    सामसायिक सृजन, संपादक : महेन्द्र प्रजापति 2012-13, पृ. 11.
  6. अग्रवाल, उज्ज्ववल. कथाकार कमलेश्वर और हिंदी सिनेमा चलचित्र का
    आविष्कार. नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, पृ. 62.
  7. दिलचस्प. हिंदी फिल्मों का संक्षिप्त इतिहास खट्टे-मीठे रोचक वाकयेनई
    दिल्ली : भारतीय पुस्तक परिषद, पृ. 69.
  8. दिलचस्प. हिंदी फिल्मों का संक्षिप्त इतिहास खट्टे-मीठे रोचक वाकयेनई
    दिल्ली : भारतीय पुस्तक परिषद, पृ. 63.

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