अनुक्रम
कृषि विपणन से तात्पर्य उन सभी क्रियाओं से लगाया जाता है,
जिनका सम्बन्ध कृषि उत्पादन का किसान के यहां से अन्तिम उपभोक्ता तक पहुंचाने में
किया जाता है।
जाता है जिनके द्वारा खाद्य पदार्थ एवं कच्चा माल फार्म से उपभोक्ता तक पहुंचता है।’’
पी0 गुप्ता के शब्दों में ‘‘विपणन कार्य से तात्पर्य उन कार्यों क्रियाओं और सेवाओं को करने
से हैं। जिनके द्वारा मूल उत्पादक तथा अन्तिम उपभोक्ता के मध्य वस्तुओं के लेन-देन का
सम्बन्ध स्थापित हेाता है।’’
प्रमुख विशिष्ट क्रियाओं को करने से हैं, जो विपणन कार्य, वस्तुओं की विपणन प्रक्रिया की
प्रमुख आर्थिक क्रिया है। कृषि उपज के विपणन में निम्न महत्वपूर्ण क्रियाएं सम्मिलित की
जा सकती हैं-
- कृषि उपज का एकत्रीकरण
- कृषि उपज का प्रमाणीकरण तथा श्रेणी विभाजन
- कृषि उपज का प्रसंस्करण
- उपज को गोदामों में रखना
- उपज का उत्पाद केन्द्र (खेत) से उपभोग केन्द्र तक परिवहन
- उपज का थोक व्यापार
- उपज का फुटकर व्यापार
- उपर्युक्त कार्यों के लिए वित्त व्यवस्था
- सभी कार्यों में निहित जोखिम उठाना
कृषि विपणन का अर्थ
सामान्यतः कृषि विपणन से तात्पर्य उन समस्त क्रियाओं से लगाया जाता है, जिनके द्वारा कृषि उपज, उपभोक्ताओं तक पहुंचती है, अन्य शब्दों में, कृषि विपणन से आशय उन सभी क्रियाओं से लगाया जाता है, जिनका संबंध कृषि उत्पादन का, कृषक के घर से अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने में किया जाता है । इन सभी क्रियाओं में कृषि उपज को एकत्रित करना, उनका श्रेणीकरण तथा प्रमाणीकरण करना, पैकेजिंग, विज्ञापन करना और उन्हें बेचने हेतु मंडियों व बाजारों तक ले जाना, और उनकी बिक्री करना आदि शामिल है।
कृषि विपणन की परिभाषा
प्रो0 जोल एवं प्रो0 खुसरो के अनुसार ‘‘खाद्यान्न विपणन के अन्तर्गत उन क्रियाओं को शामिल किया जाता है जो खाद्यान्नों को उत्पादकों से उपभोक्ताओं तक पहुँचाने के लिए समय (भण्डारण), स्थान (परिवहन), स्वरूप (परिनिर्माण) एवं स्वामित्व परिवर्तन आदि विपणन प्रक्रिया के विभिन्न स्तरों पर की जाती है” कृषि पदार्थों की बिक्री में शामिल होने वाली मुख्य क्रियाएं – एकत्रीकरण उनका श्रेणीकरण तथा प्रमाणीकरण परिष्करण संग्रहण एवं भण्डारण।
एफ. एल. थामसन के अनुसार – “कृषि विपणन अध्ययन के अंतर्गत उन समस्त क्रियाकलापों एवं संस्थाओं को शामिल किया जाता है, जिनके द्वारा कृषकों के कार्य पर उत्पादित खाद्यान्न, कच्चा माल एवं उनसे निर्मित माल का फार्म से उपभोक्ताओं तक संचालन होता है। विपणन क्रियाओं का उपभोक्ताओं, कृषकों तथा मध्यस्थों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन भी कृषि विपणन के अंतर्गत किया जाता है । “
आर.एल. काल्स एवं जे.एल. उल के अनुसार “खाद्य विपणन से अर्थ, उन समस्त व्यापारिक क्रियाओं को संपन्न करने से है, जिनके द्वारा खाद्य उत्पादों तथा सेवाओं का प्रवाह, कृषि उत्पादों के प्रारंभिक बिन्दु ( कृषक का फार्म) से उपभोक्ताओं तक होता है । “
अच्छी कृषि विपणन व्यवस्था की विशेषताएं
महत्वपूर्ण अंग है। और किसानों के विकास के साथ देश का आर्थिक विकास भी इस पर
निर्भर करता है। इसलिए एक विपणन व्यवस्था में निम्न विशेषताओं का होना आवश्यक हैं-
- मध्यस्थ विक्रेताओं की संख्या कम से कम होनी चाहिए।
- कृषि उत्पाद को संग्रह करने के लिए भण्ड़ारगृहों का उचित प्रबन्ध होना चाहिए।
- विपणन प्रणाली में किसानों के हित के साथ उपभोक्ताओं के हितों की भी सुरक्षा
होनी चाहिए। - उचित और सस्ती परिवहन व्यवस्था होनी चाहिए ताकि किसान नियमित मण्डियों
या शहरी मण्डियों में अपना उत्पाद बेच सकें। - किसानों को अपनी उपज को विलम्ब से बेचने की क्षमता अर्जित करनी चाहिए,
जिससे उचित मूल्य पर वस्तु को बेचने जा सकें। - किसानों को बाजार मूल्य के बारे में पूर्ण सूचना प्रदान की जानी चाहिए ताकि वे
आढ़तियों, दलालों तथा बिचैलियों के चक्र में न फसें। - विपणन का कार्य ऐसी संस्थाओं, एवं एजेन्सियों को सौंप दिया जाना चाहिए, जो
किसानों को उचित मूल्य दिला सके। - सरकार को समय-समय पर किसान गोष्ठियां, सम्मेलनों, सेमिनारों का आयोजन
करना चाहिए, जिससे किसान अपनी समस्या सरकार के समक्ष रख सकें। - बाजार भाव को स्थानीय समाचार पत्रों में छपवाना चाहिए। साथ ही दूरदर्शन
केन्द्रों, कृषि समाचार व रेडि़यों द्वारा भी बाजार भाव का प्रचार व प्रसार करना
चाहिए।
कृषि विपणन के उद्देश्य
उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना है। लेकिन इसके साथ ही इससे उपभोक्ताओं सहित
देश के विकास भी प्रभावित होते है मुख्य रूप से कृषि विपणन के निम्न उद्देश्य है –
को उजप का अधिकाधिक मूल्य दिलाकर उनके लाभ को अधिकतम् करना है। क्योंकि
किसानों की आय उनकी उत्पादन नीति तथा उत्पादन क्षमता को प्रभावित करती है। अपने
उत्पादन का लाभकारी मूल्य प्राप्त करने पर वह अपने उत्पादन की मात्रा में वृद्धि करने के
लिए प्रोत्साहित होता है। जो देश को खाद्यान्न की दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाने में सहायक
हैं।
की रक्षा ही जा सकती है क्योंकि उन्हे इससे आवश्यक खाद्यान्न व अन्य वस्तुएं अच्छी
किस्म एक उचित मूल्य में मिल जाती है। जिससे उपभोक्ता अपनी सीमित आय से
अधिकतम् सन्तुष्टि प्राप्त कर लेता है।
अपनी उपज का अधिकाधिक मूल्य प्राप्त करते है तो वह अधिक उत्पादन करने के लिए
प्रेरित होते है। जिससे देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्म निर्भरता प्राप्त करने के मार्ग पर
अग्रसर होता है। उचित विपणन व्यवस्था के कारण किसानों तथा उपभोकताओं को तो
लाभ होता है साथ ही विपणन क्रिया से जुझे सभी पथ पर ले जाकर सरकार के विपणन
उद्देश्य की पूर्ति करण है।
व्यवस्था उद्देश्य महत्वपूर्ण है। इससे उन्हें उनकी सेवाओं के लिए अधिकतम् आय
उपलब्ध कराती है। कुछ विपणन – मध्यस्थ अल्पकाल में अधिकतम् लाभ की अपेक्षा नहीं
रखते, परन्तु वे दीर्घकाल में निरन्तर एक निश्चित लाभ की प्राप्ति ही इच्छा रखते है।
कृषि विपणन के दोष
भारत में कृषि विपणन व्यवस्था अनेक प्रकार से सन्तोषजनक स्थिति में नहीं है किसानों को अपने फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। कृषि विपणन व्यवस्था के मुख्य दोष
हैं:-
भारतीय कृषकों के पास
ऐसी भण्डारण सुविधाओं का अभाव है जहां किसान अपनी उपज को कुछ समय के
लिए सुरक्षित रख सके।
भारतीय मण्डियों में जो कृषि उपज बिकने को आती है वे प्राय: प्रमाणित एवं श्रेणीकरण
नहीं होता जो कि कृषक की अज्ञानता एवं उपज थोड़ी होने का परिणाम होता है।
इसके फलस्वरूप किसान जान-बूझकर मिलावट करते हैं और उन्हें उपज का कम
मूल्य मिलता है।
ग्रामीण कृषि में परिवहन व्यवस्था असंतोषजनक है। गाँव व शहरों को जोड़नेवाली
अधिकांश सड़के कच्ची हैं जिन पर बरसात के मौसम में चलना बहुत ही कठिनाई पूर्ण
होता है इन साधनों के अभाव में यातायात की लागत कृषि उपज के
मूल्य का 20% हो जाती है, कई परिस्थितियों में कृषकों को गांवों में फसल कम कीमत
पर बेचने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
भारत में कृषि उपज
के विपणन में कृषकों एवं उपभोक्ताओं के बीच मध्यस्थों की एक लम्बी श्रृंखला है
जिसमें साहूकार, फुटकर व्यापारी, आदि शामिल हैं।
और दलाल किसान की अज्ञानता का लाभ उठाकर उसके साथ विविध प्रकार से कपट
करते हैं। तराजू और बाटों की गड़बड़ी, प्रामाणिक वजनों का प्रयोग न करना, उपज
का एक अंश नमूने के रूप में लेकर वापिस न करना, कपड़े के नीचे से हाथ के इशारों
से मूल्य निर्धारित करना, तुलाई, आढ़त, बोराबन्दी प्याऊ आदि के लिए अनुचित कटौती
करना मण्डियों की कुछ प्रचलित कपटपूर्ण रीतियाँ हैं।
किसानों के लिए
विभिन्न मण्डियों में समय-समय पर प्रचलित मूल्यों के विषय में सही सूचना प्राप्त
कर पाना सम्भव नहीं होता क्योंकि गाँवों में समाचार पत्र व पत्रिकाएँ नहीं पहुँच पाती।
साथ ही अधिकांश किसान अनपढ़ भी होते हैं। अत: किसान को अपनी उपज का
वही मूल्य स्वीकार करना पड़ता है जो मूल्य उसे स्थानीय व्यापारी बताते हैं।
विपणन क्रिया के
लिए वित्त की आवश्यकता होती है सहकारी समितियों से उपलब्ध वित्त का लाभ बड़े
किसानों को ही हो सकता है। छोटा किसान अब भी वित्त के लिए व्यापारी-महाजन
के पास जब पहुँचता है तो वह किसान को मंडी में अपना अनाज बेचने के लिए
हतोत्साहित करता है और स्वयं ही उसे खरीद लेता है।
भारत का औसत किसान इतना गरीब और
ऋणग्रस्त है कि उसमें अच्छी कीमतों के लिए प्रतीक्षा करने की क्षमता ही नहीं है।
उसे ऋण-भार से मुक्ति पाने के लिए फसल तैयार होते ही अपनी फालतू उपज ग्रामीण
साहूकार या व्यापारी के हाथों बेचनी पड़ती है।
आर्थिक विकास में कृषि विपणन का महत्व
विकासशील देश की अर्थव्यवस्था में कृषि विपणन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आर्थिक
विकास के लिए विपणन व्यवस्था द्वारा ही किसान अधिक उत्पादन हेतु प्रोत्सहित होते है
जो देश की राष्ट्रीय आय बढ़ाने के साथ -साथ अन्य उद्योगों के विकास में भी सहयक
होती है। आर्थिक विकास में कृषि विपणन की निम्न भूमिका है –
अतिरेक्त बढ़ता है। जिस कारण आर्थिक विकास के लिए आवश्यक पॅूजी एवं संसाधन
सुलभ होते है। यही कारण है कि जापान , जर्मनी , अमेरिका तथा आस्टेªलिया जैसे देशों में
पहले कृषि का विकास किया गया, फिर उससे प्राप्त आय का उपयोग औद्योगीकरण हेतु
किया । कृषि उत्पादन की वृद्धि राष्ट्रीय आय में बढोत्तरी कर आर्थिक विकास को गाति
प्रदान करती है।
नगरों की ओर पलायन करती है। इस कारण अच्छी विपणन व्यवस्था के द्वारा ही नगरों में
खाद्यान्न की आपूर्ति की जाती हैं। यदि किसान अपनी उपज बाजार में न बेचे, तो शहरों
की जनसंख्या का जीवन-निर्वाह संकट में पड़ जायेगा , देश में उतिच विपणन व्यवस्था
द्वारा ही उचित कीमत पर प्रचुर मात्रा में खाद्यान्नों को जनता तक पहुंचाया जाता है।
माल प्राप्त होता है यदि कृषि विपणन व्यवस्था न होती तो किसानों द्वारा उत्पादित कच्चा
माल उद्योगों तक नहीं पहुंच पाता । सूती वस्त्र, पटसन , जूट ,चानी , वनस्पति तेल आदि
, उद्योग अपने उत्पाद के लिए कच्चा माल कृषि क्षेत्र से प्राप्त करते है। उचित विपणन
व्यवस्था द्वारा ही उद्योग को कम कीमत पर उचित मात्रा में कच्चा माल उपलब्ध होता है।
उपभोक्ता सम्बन्धित है , बल्कि बड़ी मात्रा में विपणन व्यवस्था से जुडे़ कर्मचारी भी
सम्मिलित है। उचित विपणन व्यवस्था के कारण इनके जीवन स्तर में सुधार होता है। और
उनकी आय में वृद्धि होती है। परिणामस्वरूप आर्थिक विकास में गति आती है।
, विपणन व्यवस्था पर ही निर्भर करती है। ग्रामीण क्षेत्रों की गरीबी को कम करने ,
आवश्यक वस्तुओं को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने बढ़ाती कीमतों को रोकने कृषि उत्पादों के निर्यात से विदेशी मुदा आर्जित करने आदि के लिए देश में कृषि वस्तुओं के लिए उपयुक्त
एवं कुशल विपणन व्यवस्था का होना आवश्यक होता है।
प्राप्ति के लिए किसानों को आवश्यक कृषि आगतों कृषि यन्त्रों तथा उपयुक्त तकनीकी
की आवश्यकता होती है जिसके लिए उन्हें बडी़ मात्रा में धन की आवश्यकता होती है।
इस धन व्यवस्था विपणन व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।